
- 2020-21 में सेवा समाप्ति, 2024-25 व 2025-26 में फिर जिम्मेदारी,2025-26 में करीब 13 हजार क्विंटल कमी के आरोप से घिरी साधना कुशवाहा…
- सेवा समाप्ति से धान खरीदी प्रभारी तक,सोनपुर में साधना कुशवाहा की वापसी पर सवाल…
- 3559 क्विंटल की कमी भूली सहकारिता! फिर साधना को धान खरीदी की कमान…
- सोनपुर समिति में नियमों का खेल…कार्रवाई भी हुई…वापसी भी हुई…
- 13 हजार क्विंटल की कमी के आरोप के बीच सवाल-साधना पर विभाग इतना मेहरबान क्यों?
- कागजों में धान पूरा…सवालों में व्यवस्था…सोनपुर समिति में साधना की वापसी का राज क्या?
- सेवा समाप्ति का आदेश बेअसर? सोनपुर में फिर धान की रखवाली का जिम्मा
- सहकारिता का अजब खेल…जिसे हटाया…उसी को फिर धान खरीदी में बैठाया…
- 3559 से 13 हजार क्विंटल तक,सोनपुर धान खरीदी में कमी का बढ़ता सवाल…
- धान की कमी,निलंबन और फिर बहाली की तैयारी-सोनपुर में किसकी मेहरबानी?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,20 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग में नियम-कायदे किसके लिए हैं और किसके लिए नहीं,यह सवाल सूरजपुर जिले की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 के मामले में लगातार गहराता जा रहा है,यहां दस्तावेजों और सामने आए घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो ऐसा लगता है कि सहकारिता में कुर्सी से हटना अंतिम विदाई नहीं,बल्कि अगली बैठक तक का विराम हो सकता है,एक तरफ कर्मचारी को सेवा से पृथक करने के आदेश निकलते हैं,दूसरी तरफ समय बीतने के बाद उसी कर्मचारी को फिर संस्था में लाने की तैयारी दिखाई देती है,एक तरफ किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर आरोपों के आधार पर कार्रवाई होती है,दूसरी तरफ उसी व्यक्ति को बाद के वर्षों में फिर से धान खरीदी जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी सौंपे जाने पर सवाल उठते हैं,और इसी पूरी कहानी के बीच सबसे चर्चित नाम है साधना कुशवाहा का, उनके संबंध में उपलब्ध पुराने सेवा समाप्ति आदेश में वर्ष 2020-21 की धान खरीदी में 3559.93 क्विंटल धान की कमी का उल्लेख है,उसी दस्तावेज में पशुपालन ऋण वितरण में भी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए 71 हितग्राहियों को कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर लगभग 1 करोड़ 88 लाख 59 हजार रुपये के ऋण वितरण की जांच का जिक्र है,अब सवाल यह नहीं है कि फाइल में कार्रवाई हुई या नहीं,सवाल यह है कि कार्रवाई के बाद फिर जिम्मेदारी किसने दी?
2020-21 में 3559.93 क्विंटल की कमी, फिर भी धान खरीदी की चाबी वापस कैसे मिली?- सोनपुर समिति से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज में साधना कुशवाहा के खिलाफ सेवा समाप्ति की कार्रवाई का आधार दर्ज है,आदेश में खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में धान खरीदी के दौरान 3559.93 क्विंटल धान शॉर्टेज होने की बात कही गई और इससे समिति को गंभीर आर्थिक क्षति होने का उल्लेख किया गया,यानी मामला कोई छोटी-मोटी कार्यालयीन गलती बताकर छोड़ देने वाला नहीं था,धान खरीदी में स्टॉक का मतलब सीधे किसान और शासन के पैसे से है। एक क्विंटल धान का हिसाब भी महत्वपूर्ण है और यहां दस्तावेज में हजारों क्विंटल की कमी दर्ज है, ऐसे में सामान्य प्रशासनिक समझ यही कहती है कि जिस व्यक्ति पर धान खरीदी के दौरान गंभीर कमी का मामला सामने आया हो, उसे दोबारा उसी व्यवस्था की जिम्मेदारी देने से पहले उसकी पिछली कार्रवाई,जांच और सेवा रिकॉर्ड की गहराई से समीक्षा होनी चाहिए,लेकिन यहां कहानी यहीं खत्म नहीं हुई,आरोप है कि साधना कुशवाहा को बाद में वर्ष 2024-25 और फिर 2025-26 में धान खरीदी प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई,यही वह बिंदु है जहां सहकारिता विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है, अगर 2020-21 की कमी का मामला सही था तो दोबारा प्रभार क्यों? अगर मामला गलत था तो सेवा समाप्ति क्यों? अगर सेवा समाप्ति सही थी तो बाद में बहाली अथवा पुनर्नियुक्ति किस आदेश से? और अगर सब कुछ नियम के तहत हुआ तो वह नियम सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
एक तरफ निलंबन,दूसरी तरफ पुरानी सेवा का रिकॉर्ड,फिर भी बार-बार वही जिम्मेदारी क्यों?– साधना कुशवाहा का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल 2025-26 की कथित कमी तक सीमित नहीं है,एक तरफ उपलब्ध सेवा समाप्ति आदेश में 2020-21 की 3559.93 क्विंटल धान कमी दर्ज है, दूसरी तरफ बाद में 2024-25 और 2025-26 में धान खरीदी प्रभारी बनाए जाने की जानकारी सामने आती है, और तीसरी तरफ 2025-26 में करीब 13 हजार क्विंटल कमी का आरोप लगने के बाद निलंबन की कार्रवाई की बात सामने आ रही है,यदि यह पूरा घटनाक्रम रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो विभाग को केवल निलंबन की कार्रवाई तक रुकने के बजाय यह भी देखना होगा कि पहले के रिकॉर्ड के बावजूद उन्हें दोबारा जिम्मेदारी देने की प्रशासनिक स्वीकृति किस स्तर से मिली,क्योंकि जिम्मेदारी केवल उस कर्मचारी की नहीं होती जो धान केंद्र पर बैठा है, जिम्मेदारी उस अधिकारी की भी होती है जो उसे वहां बैठाता है।
साधना प्रकरण में अदालत का रिकॉर्ड भी मौजूद,लेकिन विभागीय सवाल फिर भी बाकी- साधना कुशवाहा से संबंधित हाई कोर्ट के रूष्टक्रष्ट हृश. 8355/2023 सहित संबंधित मामलों के 13 दिसंबर 2023 के आदेश में उनके पक्ष की ओर से ऋण वितरण और भुगतान से संबंधित दलीलें रखे जाने का उल्लेख है, आदेश में अदालत ने संबंधित दलीलों के संबंध में अतिरिक्त शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था और मामलों को जनवरी 2024 में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया था,इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि अदालत ने सेवा समाप्ति या धान कमी के आरोपों को अंतिम रूप से सही ठहरा दिया,न्यायालयीन कार्यवाही और विभागीय कार्रवाई के अपने-अपने स्तर होते हैं, लेकिन इससे एक बात जरूर स्पष्ट होती है—मामला केवल गांव की चर्चा नहीं है; इसके पीछे दस्तावेजी और न्यायालयीन रिकॉर्ड भी मौजूद हैं,इसलिए विभाग के लिए अब सबसे उचित रास्ता यही है कि वह पूरी फाइल सार्वजनिक करे और स्पष्ट करे कि आगे क्या कार्रवाई हुई।
सहकारिता में ‘कुर्सी अमर है’ या नियम भी जिंदा हैं?-सोनपुर समिति का मामला अब साधना कुशवाहा और विवेक कुमार चौरसिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए,यह सहकारिता विभाग की उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें कर्मचारी की नियुक्ति,सेवा समाप्ति, पुनर्नियुक्ति,धान खरीदी का प्रभार, टॉक सत्यापन और परिवहन रिकॉर्ड—सभी प्रक्रियाएं नियमों से संचालित होनी चाहिए,यदि साधना कुशवाहा को 2020-21 की कार्रवाई के बावजूद 2024-25 और 2025-26 में धान खरीदी प्रभारी बनाया गया,तो उसका आदेश सार्वजनिक होना चाहिए, यदि 2025-26 में करीब 13 हजार क्विंटल कमी का आरोप लगा और निलंबन हुआ,तो जांच रिपोर्ट सामने आनी चाहिए,यदि बाद में उसी कमी को परिवहन के जरिए शून्य शॉर्टेज दिखाया गया,तो परिवहन दस्तावेज और भौतिक सत्यापन का मिलान होना चाहिए,और यदि विवेक कुमार चौरसिया को 9 जुलाई 2025 को कार्य से पृथक करने के बाद 7 अगस्त 2026 की संचालक मंडल बैठक में वापस रखने की तैयारी हुई,तो उसकी वैधानिक प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए,क्योंकि कुर्सी किसी की निजी संपत्ति नहीं है और समिति किसी अधिकारी की निजी प्रयोगशाला नहीं, किसानों का धान है,किसानों का पैसा है और सहकारी संस्था किसानों की है,इसलिए अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि साधना वापस कैसे आईं या विवेक को फिर क्यों बुलाया गया,सबसे बड़ा सवाल यह है—‘क्या सोनपुर में नियम पहले आते हैं और कर्मचारी बाद में,या कर्मचारी पहले तय होते हैं और नियम बाद में खोजे जाते हैं?’इसका जवाब विभाग को दस्तावेजों के साथ देना चाहिए।
अब 2025-26 का नया अध्याय-करीब 13 हजार क्विंटल कमी का आरोप
पुराने मामले से भी ज्यादा गंभीर सवाल अब वर्ष 2025-26 की धान खरीदी को लेकर सामने आया है, उपलब्ध जानकारी के अनुसार साधना कुशवाहा पर इस अवधि में करीब 13 हजार क्विंटल धान की कमी का आरोप लगा और इसके बाद उन्हें निलंबित किया गया,यह आंकड़ा यदि जांच में प्रमाणित होता है तो यह साधारण स्टॉक अंतर का मामला नहीं माना जा सकता,इतनी बड़ी मात्रा में धान की कमी का अर्थ है कि खरीदी,भंडारण,उठाव,परिवहन,मिलिंग और अंतिम स्टॉक—पूरी श्रृंखला की जांच आवश्यक है, लेकिन कहानी यहां भी एक और मोड़ लेती है,आरोप है कि वास्तविक कमी को परिवहन के कागजों में समायोजित करते हुए कागजों पर शॉर्टेज को शून्य दिखाने का प्रयास किया गया,यानी गोदाम में धान कम हो सकता है,लेकिन फाइल में धान पूरा! यहीं से सहकारिता का वह पुराना मजाक फिर जीवित हो जाता है…धान जमीन पर कम हो तो क्या हुआ,कागज पर पूरा होना चाहिए! बेशक यह व्यंग्य है। लेकिन यदि वास्तविक स्टॉक और सरकारी रिकॉर्ड में अंतर था और उसे परिवहन दस्तावेजों के माध्यम से समायोजित कर शून्य शॉर्टेज दिखाया गया, तो यह गंभीर जांच का विषय है।
शून्य शॉर्टेज का खेल,धान गया कहां और कागज में आया कहां से…?
धान खरीदी केंद्र में वास्तविक स्टॉक का मिलान केवल कागज देखकर नहीं हो सकता भौतिक सत्यापन,परिवहन पर्चियां,डीओ/डीसीएस, उठाव रिकॉर्ड,मिलर को भेजे गए धान की मात्रा,केंद्रवार स्टॉक रजिस्टर और बैंक/समिति के वित्तीय अभिलेखों को एक साथ देखने पर ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी,इसलिए इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि करीब 13 हजार क्विंटल की कमी थी तो वह धान किस तारीख को,किस वाहन से और किस परिवहन दस्तावेज के आधार पर उठाया गया? किस मिलर को भेजा गया? किस अधिकारी ने सत्यापन किया? किसने परिवहन रिकॉर्ड स्वीकार किया? क्या वाहनों की वास्तविक आवाजाही का सत्यापन हुआ? क्या वजन पर्चियां उपलब्ध हैं? क्या भौतिक स्टॉक से उसका मिलान हुआ? और यदि सब कुछ परिवहन में चला गया था तो फिर शुरुआती निरीक्षण में कमी कैसे सामने आई? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मामला वास्तविक परिवहन का था या कागजी समायोजन का।
साधना के बाद अब विवेक की ‘वापसी’—सोनपुर में कुर्सियां शायद खाली रहना पसंद नहीं करतीं…
सोनपुर समिति की कहानी में दूसरा नाम है विवेक कुमार चौरसिया का, उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक के रूप में रखा गया था और 9 जुलाई 2025 को समिति तथा समिति के समस्त कार्यों से पृथक किए जाने की कार्रवाई हुई,लेकिन ठीक एक वर्ष से कुछ अधिक समय बाद अचानक फिर बैठक का दौर शुरू होता है,6 अगस्त 2026 को समिति कार्यालय की ओर से संचालक मंडल की बैठक में उपस्थित रहने का नोटिस जारी होता है,बैठक की तारीख—7 अगस्त 2026, समय—दोपहर 1 बजे,स्थान—समिति कार्यालय सोनपुर,सबसे दिलचस्प बात यह है कि बैठक सूचना में विस्तृत एजेंडा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आता,फिर सवाल उठता है—बैठक किसलिए? क्या हटाए गए कर्मचारी की वापसी के लिए? क्या नियुक्ति की वैधता की समीक्षा के लिए? क्या समिति के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव के लिए? या फिर कोई और विषय? अगर बैठक के बाद विवेक कुमार चौरसिया को फिर से कार्य में रखने की रणनीति तैयार हुई है,जैसा कि आरोप लगाया जा रहा है,तो उससे भी बड़ा सवाल यह है कि 9 जुलाई 2025 को जिस आधार पर उन्हें हटाया गया था,उस आधार का क्या हुआ?
सेवा समाप्ति का मतलब क्या केवल ‘कुछ समय के लिए बाहर’ है?
सोनपुर समिति के दोनों मामलों को एक साथ रखने पर व्यंग्य का अवसर खुद-ब-खुद पैदा हो जाता हैम यहां शायद सहकारिता का नया फार्मूला कुछ ऐसा है—पहले सेवा से हटाओ, फिर फाइल को आराम दो, कुछ समय बाद बैठक बुलाओ,पुरानी कार्रवाई पर चर्चा करो,फिर वापसी का रास्ता खोजो, और यदि यह सब नियमों के तहत है तो नियम बताइए,क्योंकि नियम किसी व्यक्ति की सुविधा के अनुसार नहीं बदल सकते,यदि कोई कर्मचारी केवल अस्थायी व्यवस्था में रखा गया था तो उसकी नियुक्ति की वैधता स्पष्ट होनी चाहिए, यदि उसे हटाया गया तो हटाने का कारण स्पष्ट होना चाहिए,और यदि फिर रखा जा रहा है तो नई नियुक्ति अथवा बहाली की वैधानिक प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल की किसके आदेश पर जिम्मेदारी मिली?
साधना कुशवाहा को दोबारा धान खरीदी प्रभारी बनाए जाने का निर्णय यदि रिकॉर्ड में मौजूद है तो उसमें संबंधित आदेश,तिथि और सक्षम अधिकारी का नाम होना चाहिए,यही दस्तावेज बताएगा कि विभाग में निर्णय किस स्तर पर हुआ,क्योंकि यदि किसी व्यक्ति का पुराना रिकॉर्ड विभाग के पास मौजूद था और फिर भी उसे संवेदनशील धान खरीदी केंद्र की जिम्मेदारी दी गई,तो यह निर्णय लेने वाले अधिकारी की भूमिका की जांच भी जरूरी है, कर्मचारी पर कार्रवाई करके कहानी खत्म नहीं हो सकती,जिसने नियुक्त किया,जिसने निरीक्षण किया,जिसने स्टॉक सत्यापन किया, जिसने परिवहन रिकॉर्ड स्वीकार किया और जिसने शून्य शॉर्टेज का रिकॉर्ड तैयार या अनुमोदित किया,हर स्तर की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अब किसान पूछ रहा है की धान का हिसाब किससे मांगे?
सहकारी समितियों का सबसे बड़ा आधार किसान है,किसान धान बेचता है और उम्मीद करता है कि उसकी उपज का सही वजन होगा, सही भुगतान होगा और शासन की पूरी व्यवस्था पारदर्शी होगी,लेकिन जब एक ही नाम के आसपास बार-बार धान खरीदी से जुड़े सवाल खड़े हों तो किसान का सवाल स्वाभाविक है अगर पहले 3559.93 क्विंटल की कमी के बाद भी उसी व्यक्ति को फिर धान खरीदी की जिम्मेदारी मिल सकती है और बाद में करीब 13 हजार क्विंटल कमी का आरोप लग सकता है,तो आखिर जवाबदेही किसकी है? यह सवाल किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए है।
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