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कोरिया@नाला नहीं,पानी नहीं…फिर 10 लाख की पुलिया क्यों? सड़क से तीन फीट ऊंचा निर्माण…तकनीकी औचित्य पर सवाल

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  • कागजों में जरूरत,जमीन पर सवाल! कुशहा में 10 लाख की पुलिया की उपयोगिता कटघरे में…
  • विकास के नाम पर 10 लाख खर्च,जहां जलधारा नहीं वहां पुलिया खड़ी!
  • सड़क नीचे,पुलिया ऊपर, आखिर किसके लिए बना रहे 10 लाख का ढांचा?
  • नाला गायब,पुलिया तैयार! कुशहा में निर्माण की तकनीकी स्वीकृति पर उठे सवाल
  • जनता के 10 लाख रुपये दांव पर? कुशहा की पुलिया का औचित्य और गुणवत्ता जांच के घेरे में…
  • पानी का रास्ता नहीं,फि र पुलिया का निर्माण क्यों? कुशहा में इंजीनियरों की भूमिका पर सवाल
  • राजन पाण्डेय –
    कोरिया,07 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)।
    सरकारी धन से विकास कार्य कराने का उद्देश्य ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और उनकी समस्याओं का समाधान करना होता है,लेकिन जब किसी निर्माण की वास्तविक उपयोगिता ही सवालों के घेरे में आ जाए,तो उसकी स्वीकृति से लेकर क्रियान्वयन तक की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है,कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत कुशहा में लगभग 10 लाख रुपये की लागत से बनाई जा रही पुलिया को लेकर ऐसी ही स्थिति सामने आई है,निर्माण स्थल की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जहां स्पष्ट नाला, जलधारा अथवा पानी के बहाव का रास्ता नजर नहीं आता, वहां आखिर किस आवश्यकता के आधार पर पुलिया का निर्माण कराया जा रहा है?
    मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि निर्माणाधीन पुलिया मौजूदा सड़क के स्तर से लगभग ढाई से तीन फीट ऊंची दिखाई दे रही है,ऐसे में पुलिया की उपयोगिता,सड़क से उसका जुड़ाव और निर्माण के तकनीकी औचित्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं,यदि निर्माण का उद्देश्य आवागमन को सुगम बनाना है, तो सड़क के मौजूदा स्तर से इतनी अधिक ऊंचाई पर पुलिया बनाने का आधार क्या है? और यदि इसके दोनों ओर पहुंच मार्ग को ऊंचा किया जाना प्रस्तावित है,तो क्या इसकी व्यवस्था भी स्वीकृत योजना और बजट में शामिल है?
    नाला और जलधारा का स्पष्ट रास्ता नहीं, फिर पुलिया की जरूरत क्यों?
    पुलिया का निर्माण सामान्यतः नाले,बरसाती पानी की निकासी,प्राकृतिक जलधारा अथवा किसी अन्य अवरोध के ऊपर आवागमन बनाए रखने के लिए किया जाता है,लेकिन कुशहा में निर्माणाधीन पुलिया के स्थान पर पानी के स्पष्ट प्राकृतिक बहाव मार्ग की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं,यदि वास्तव में वहां नाला या जलनिकासी की ऐसी कोई स्थिति नहीं है,जिसके लिए पुलिया आवश्यक हो,तो यह जांच का विषय है कि निर्माण की आवश्यकता किस सर्वेक्षण और तकनीकी आकलन के आधार पर तय की गई,किसी भी सार्वजनिक निर्माण को स्वीकृति देने से पहले स्थल की भौगोलिक स्थिति,स्थानीय जरूरत,जलप्रवाह और प्रस्तावित निर्माण की उपयोगिता का आकलन किया जाना चाहिए,ऐसे में संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि कुशहा में पुलिया निर्माण का मूल उद्देश्य क्या है और उस स्थान को ही निर्माण के लिए क्यों चुना गया?
    सड़क से ढाई-तीन फीट ऊंची पुलिया,जुड़ाव कैसे होगा?
    निर्माण स्थल पर दिखाई दे रही पुलिया की ऊंचाई भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है,बताया जा रहा है कि यह मौजूदा सड़क के स्तर से करीब ढाई से तीन फीट ऊंची है, यदि सड़क और पुलिया के बीच इतना अंतर है,तो सामान्य आवागमन के लिए दोनों ओर किस तरह का पहुंच मार्ग तैयार किया जाएगा? क्या सड़क को भी ऊंचा किया जाएगा या फिर पुलिया तक पहुंचने के लिए ढलान बनाई जाएगी? यदि दोनों ओर सड़क का समतलीकरण और उचित ढलान नहीं बनाया जाता,तो यह निर्माण आवागमन को सुगम बनाने के बजाय परेशानी का कारण बन सकता है,इसलिए यह देखना जरूरी है कि स्वीकृत ड्राइंग और डिजाइन में सड़क तथा पुलिया के स्तर का निर्धारण किस आधार पर किया गया है,मौके पर निर्माण की वास्तविक स्थिति और स्वीकृत डिजाइन का मिलान किए बिना इसकी तकनीकी उपयुक्तता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
    एस्टीमेट किसने बनाया, स्थल निरीक्षण किसने किया?
    इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल तकनीकी स्वीकृति और मैदानी निरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर है, किसी भी पुलिया के निर्माण से पहले संबंधित तकनीकी अमले द्वारा स्थल का निरीक्षण किया जाता है और उसी के आधार पर एस्टीमेट, ड्राइंग तथा डिजाइन तैयार किए जाते हैं, ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कुशहा में प्रस्तावित निर्माण का सर्वेक्षण किस अधिकारी या इंजीनियर ने किया? क्या स्थल पर पहुंचकर नाले अथवा जलनिकासी की वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया था? क्या निर्माण की ऊंचाई और सड़क से उसके जुड़ाव को तकनीकी रूप से उचित पाया गया था? यदि मौके की वास्तविक स्थिति और स्वीकृत एस्टीमेट में अंतर है, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, यह भी जांचा जाना चाहिए कि निर्माण कार्य के दौरान संबंधित इंजीनियरों ने नियमित निरीक्षण किया या नहीं और अब तक कार्य की गुणवत्ता को लेकर कोई परीक्षण कराया गया है या नहीं।
    गांवों में मूलभूत जरूरतें अधूरी, निर्माण की उपयोगिता पर सवाल
    ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई स्थानों पर सड़क, नाली, पुल-पुलिया और आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है,बरसात के दिनों में अनेक गांवों के रास्ते बाधित हो जाते हैं और ग्रामीणों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी परेशानी उठानी पड़ती है, ऐसे में विकास के नाम पर खर्च होने वाली राशि का उपयोग प्राथमिकता और वास्तविक आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए,यदि किसी स्थान पर पुलिया की वास्तविक जरूरत है, तो उसका निर्माण स्वागत योग्य है,लेकिन यदि निर्माण स्थल की परिस्थितियां ही उसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े कर रही हैं,तो संबंधित विभाग का दायित्व है कि वह इन सवालों का तकनीकी तथ्यों के साथ जवाब दे,आखिरकार लगभग 10 लाख रुपये की यह राशि सार्वजनिक धन है,जिसका उपयोग जनहित में होना चाहिए।
    स्वतंत्र तकनीकी जांच से खुलेगी निर्माण की वास्तविकता
    कुशहा में उठे सवालों का समाधान केवल मौखिक जवाब या कागजी स्पष्टीकरण से नहीं होगा,इसके लिए जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्माण स्थल का स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण कराना चाहिए,जांच में स्वीकृत एस्टीमेट, तकनीकी स्वीकृति,ड्राइंग-डिजाइन,माप पुस्तिका (एमबी), निर्माण सामग्री,गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान संबंधी अभिलेखों का मिलान किया जाना चाहिए, साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पुलिया निर्माण की वास्तविक जरूरत क्या थी,स्थल का चयन किस आधार पर हुआ और सड़क से ढाई-तीन फीट ऊंचाई रखने के पीछे क्या तकनीकी कारण है। यदि जांच में निर्माण की उपयोगिता,गुणवत्ता या स्वीकृति प्रक्रिया में अनियमितता सामने आती है,तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसी की जवाबदेही तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए,फिलहाल कुशहा की यह पुलिया सिर्फ एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग,तकनीकी निगरानी और विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत से जुड़ा सवाल बन गई है, अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और तकनीकी तथ्यों के साथ देता है या फिर यह मामला भी अन्य निर्माण कार्यों की तरह फाइलों में उलझकर रह जाता है।
    10 लाख रुपये की लागत, गुणवत्ता की जांच भी जरूरी
    लगभग 10 लाख रुपये की लागत से हो रहे निर्माण में गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री और कार्य की मजबूती को लेकर असंतोष की बातें सामने आ रही हैं, ऐसे में केवल निर्माण की बाहरी स्थिति देखकर गुणवत्ता का निष्कर्ष निकालने के बजाय तकनीकी परीक्षण कराया जाना आवश्यक है, निर्माण में इस्तेमाल की गई सीमेंट, रेत, गिट्टी और अन्य सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं, इसकी जांच होनी चाहिए, साथ ही कंक्रीट की मजबूती, निर्माण की मोटाई, सरिया और अन्य तकनीकी पहलुओं का परीक्षण भी कराया जाना चाहिए, सरकारी निर्माण में केवल ढांचा खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं है। उसकी मजबूती, टिकाऊपन और वास्तविक उपयोगिता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

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