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नई दिल्ली@कैंसर दवाओं की ऊंची कीमत नरसंहार जैसी : सुप्रीम कोर्ट

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2700 की दवा पर कीमत 27 हजार कैसे लिखी,हर साल 5381 करोड़ का दवा कारोबार


नई दिल्ली,21 सितम्बर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से पूछा कि दवाओं की एमआरपी, रिटेल कीमत से 16′ से ज्यादा क्यों होनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल किया कि सभी दवाओं पर अधिकतम 16′ मार्जिन की सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती। दवाओं के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं। कोर्ट ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया,जिसकी रिटेल कीमत करीब 2,700 थी,लेकिन एमआरपी 27 हजार थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मंगलवार को दवाओं की कीमत और जेनेरिक दवाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद थे। कोर्ट ने कहा- यह नरसंहार है। यह कैसे हो रहा है? कॉर्पोरेट किसी को नहीं बख्शते,शव भी बाहर नहीं जाने देते। कोर्ट ने पूछा कि यदि मरीज सरकारी योजना में इलाज करा रहा है तो इतनी बढ़ी कीमत का भुगतान कौन करता है। इसका बोझ सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स पर ही पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट हॉस्पिटल इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं। वे मरीजों को अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। कोर्ट ने अस्पतालों के मुनाफे और दवाओं की कीमत तय करने के लिए एक समान नियम की जरूरत पर भी सवाल उठाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं की प्रिस्कि्रप्शन और मेडिकल डिवाइस के कंट्रोल से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने 10 गुना मुनाफे पर सवाल उठाए…
कोर्ट ने दवाओं पर 10 गुना या उससे ज्यादा मुनाफे के आरोप और डीपीसीओ, 2013 के तहत जरूरी व गैर-जरूरी दवाओं के अलग-अलग नियमों पर भी सवाल किए। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने माना कि यह गंभीर मुद्दा है। उन्होंने कहा कि ऐसा समाधान जरूरी है, जिसमें मरीजों, सरकार और फार्मा कंपनियों सभी के हितों का संतुलन रहे।
याचिकाकर्ता बोले…इलाज के
लिए गहने-संपत्ति बेचने को मजबूर

याचिकाओं में दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर से मरीजों और सरकारी योजनाओं पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का मुद्दा उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जिन दवाओं की कीमत सरकार तय करती है, उनका बाजार में हिस्सा कम है। वहीं, जिनकी कीमत सरकार की तरफ से तय नहीं की गई है,उनका बाजार में करीब 80′ या उससे ज्यादा हिस्सा है। उनकी शुरुआती एमआरपी तय करने में कंपनियों को ज्यादा छूट मिलती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे दवाओं की कीमत और मरीजों के इलाज का खर्च बढ़ सकता है। कई मरीज इलाज के लिए अपनी संपत्ति या गहने तक बेचने को मजबूर होते हैं।


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