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अम्बिकापुर@बूम बैरियर गिरा तो ‘वीआईपी गुस्सा’ टोलकर्मी पर बरसा!

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मंत्री के काफिले की गाड़ी पर गिरा टोल बूम,कर्मचारी हाथ जोड़ता रहा…थप्पड़ पड़ते रहे…वीडियो वायरल…थाने पहुंचा मामला

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,03 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी व्यवस्था में आम आदमी को अक्सर नियम-कायदे समझाने वाले वीआईपी काफिले के सामने वही नियम कितने बेबस हो जाते हैं,इसकी तस्वीर लखनपुर के लहपटरा टोल नाके से सामने आई है। मामला इतना भर था कि टोल का बूम बैरियर मंत्री के काफिले की गाड़ी पर गिर गया। इसके बाद गुस्सा इतना बढ़ा कि बैरियर तो बच गया, लेकिन एक टोलकर्मी के गाल जरूर ‘वीआईपी प्रोटोकॉल’ की मार झेल गए। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में टोल कर्मचारी हाथ जोड़कर माफी मांगता नजर आ रहा है,जबकि उसके सामने मौजूद व्यक्ति उसे थप्पड़ मारता दिखाई देता है। वीडियो सामने आने के बाद अब सवाल यह है कि गलती मशीन की थी तो सजा कर्मचारी को किस नियम के तहत दी गई?
बूम अपने आप गिरा,लेकिन थप्पड़ अपने आप नहीं पड़े : जानकारी के अनुसार अंबिकापुर-बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग-130 पर लहपटरा टोल नाके से रात करीब 12ः30 बजे महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का काफिला गुजर रहा था। आगे चल रही गाड़ी के निकलने के बाद स्वचालित टोल प्रणाली के तहत बूम बैरियर नीचे आया और पीछे आ रही मंत्री की गाड़ी से टकरा गया। इससे वाहन को नुकसान पहुंचा। बस फिर क्या था—बूम गिरने की खटाक के बाद टोल प्लाजा पर वीआईपी गुस्से की आवाजें गूंजने लगीं। रिपोर्टों के अनुसार मंत्री के निजी सहायक ओम प्रकाश राजवाड़े पर टोल कर्मचारी के साथ गाली-गलौज और मारपीट का आरोप है। वीडियो में कर्मचारी हाथ जोड़कर माफी मांगता दिखाई दे रहा है।
‘माफ कर दीजिए साहब’…लेकिन थप्पड़ का हिसाब कौन देगा? वायरल वीडियो की सबसे परेशान करने वाली तस्वीर यही है कि एक कर्मचारी हाथ जोड़कर खुद को बचाने की कोशिश करता दिखाई देता है। सामने खड़ा व्यक्ति लगातार थप्पड़ मारता नजर आता है।
अब सवाल यह नहीं कि बूम बैरियर क्यों गिरा? सवाल यह भी है कि यदि बूम सिस्टम में तकनीकी या संचालन संबंधी गलती हुई थी तो उसकी जांच कौन करता? टोल कंपनी से जवाब कौन मांगता? नुकसान का आकलन कौन करता? क्या सड़क पर कानून का काम जांच करना है या मौके पर ही ‘तुरंत न्याय’ कर देना? फॉलो वाहन होता तो शायद बूम भी ‘वीआईपी’ पहचान लेता! टोल कर्मचारियों की ओर से एक दिलचस्प सफाई सामने आई है। बताया गया कि काफिले में पहले की तरह फॉलो वाहन नहीं था। आगे वाली गाड़ी निकल गई और उसके पीछे मंत्री का वाहन होने की जानकारी टोलकर्मियों को नहीं हो सकी। इसी कारण स्वचालित सिस्टम ने बूम नीचे कर दिया। यानी मामला तकनीक और प्रोटोकॉल के बीच फंस गया।
बूम को क्या पता कि पीछे आने वाली गाड़ी आम आदमी की है या मंत्री की? मशीन ने अपना काम किया—लेकिन मशीन के बाद इंसानों ने जो किया, उस पर अब सवाल उठ रहे हैं।
थाने पहुंचा टोलकर्मी,अब पुलिस तय करेगी ‘किसका प्रोटोकॉल’ः घटना के बाद पीडि़त टोल कर्मचारी महेंद्र राजवाड़े अन्य टोलकर्मियों और ग्रामीणों के साथ लखनपुर थाने पहुंचा और शिकायत देकर कार्रवाई की मांग की। ग्रामीणों ने कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है। अब गेंद पुलिस के पाले में है। वायरल वीडियो,प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और शिकायत के आधार पर पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि मारपीट किसने की,किस परिस्थिति में की और क्या कानून हाथ में लेने की कोशिश हुई।
वीआईपी काफिला और आम कर्मचारी…कानून की नजर में फर्क कितना? यह घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें मंत्री के काफिले का नाम सामने आया है। हालांकि मंत्री स्वयं मारपीट में शामिल थीं,ऐसा उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं कहा गया है; एक रिपोर्ट के अनुसार वे घटना के दौरान वाहन में ही थीं और बाद में सुरक्षाकर्मियों ने बीच-बचाव किया। मामले की जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन वायरल वीडियो ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है…अगर टोल का बूम किसी आम आदमी की गाड़ी पर गिरता और उसके साथ ऐसा व्यवहार होता,तो क्या मामला इतना ही ‘छोटा’ माना जाता?
लोकतंत्र में पद बड़ा हो सकता है,काफिला बड़ा हो सकता है,गाड़ी महंगी हो सकती है…लेकिन कानून की किताब सबके लिए एक ही होनी चाहिए। अब देखना यह है कि लखनपुर पुलिस इस मामले में बूम बैरियर की तकनीकी जांच करती है या सिर्फ मामले के ‘वीआईपी वजन’ को देखती है।
फिलहाल टोल प्लाजा पर एक सवाल हवा में तैर रहा है…बूम गिरने की गलती किसकी थी,यह जांच से पता चलेगा,लेकिन थप्पड़ चलाने का अधिकार आखिर किसने दे दिया?


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