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सूरजपुर,@हर साल बारिश से पहले सफाई के दावे…बारिश आते ही जलभराव की वही पुरानी कहानी,जनता पूछ रही-आखिर पानी निकलेगा कब?

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  • सूरजपुर में बारिश का ‘विकास मॉडल’…सड़क पर नदी…अस्पताल में तालाब और नालियों में कचरा
  • नाली बनी,सफाई भूली, बारिश आई तो सूरजपुर की सड़कें बन गईं जलमार्ग
  • बारिश ने उतारा विकास का मुखौटा, सूरजपुर में सड़क पर पानी और व्यवस्था बेपानी
  • सूरजपुर में मानसून की मार,नालियां जाम,सड़कें जलमग्न,जनता परेशान
  • कागज पर नालियां,सड़क पर दरिया,बारिश में बेनकाब हुई
  • सूरजपुर की व्यवस्थाबारिश आई और व्यवस्था
  • बह गई! सूरजपुर में सड़क बनी नदी, निकासी व्यवस्था हुई फेल
  • वोट लो और भूल जाओ’ से आगे बढ़ा सूरजपुर, बारिश में जनता ढूंढ रही सूखी सड़क


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर शहर में बारिश कोई नई मेहमान नहीं है, लेकिन हर साल बारिश आते ही शहर की व्यवस्था जिस तरह घुटनों के बल बैठ जाती है, वह जरूर नई कहानी बन जाती है,कुछ दिनों से हो रही बारिश ने एक बार फिर नगर की बुनियादी व्यवस्थाओं का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रख दिया है,कहीं सड़क पर पानी का समंदर है तो कहीं पुराना अस्पताल तालाब में तब्दील नजर आ रहा है। नेशनल हाईवे पर हालात ऐसे कि सड़क और नदी में फर्क करना मुश्किल हो जाए, तस्वीरें साफ बता रही हैं कि बारिश ने शहर को नहीं,बल्कि शहर की व्यवस्था को धो दिया है, फर्क सिर्फ इतना है कि बारिश के पानी के साथ कचरा और गंदगी भी बहनी चाहिए थी, लेकिन नालियां पहले ही जाम हैं, इसलिए पानी ने सड़क को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया।
पुराना अस्पताल बना ‘मानसून तालाब’-शहर का पुराना अस्पताल क्षेत्र भी बारिश में जलभराव की समस्या से अछूता नहीं है, अस्पताल जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान के आसपास पानी का जमा होना अपने आप में गंभीर सवाल है,अस्पताल वह जगह है जहां स्वस्थ व्यक्ति नहीं,बल्कि इलाज और मदद की जरूरत वाले लोग पहुंचते हैं,ऐसे में यदि वहां पहुंचने के रास्ते में ही पानी जमा हो जाए तो व्यवस्था की प्राथमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है, शहर में तालाबों की कमी हो तो पुराना अस्पताल परिसर काम आ सकता है—कम से कम बारिश के मौसम में तस्वीर तो यही बता रही है।
कचरा नाली में…पानी सड़क पर और जिम्मेदारी हवा में-जलभराव की समस्या को केवल बारिश के माथे मढ़ देना आसान है, लेकिन सवाल यह है कि बारिश का पानी आखिर निकलेगा कहां? यदि नालियां साफ हों, जल निकासी के मार्ग खुले हों और पानी के प्राकृतिक बहाव में बाधा न हो तो सामान्य बारिश के बाद सड़कों पर लंबे समय तक पानी जमा रहने की स्थिति नहीं बननी चाहिए, लेकिन यहां तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। नालियों में कचरा जमा है, पानी के रास्ते अवरुद्ध हैं और बारिश होते ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, फिर शुरू होता है वही पुराना खेल—जनता शिकायत करती है, अधिकारी निरीक्षण करते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं और पानी अपने आप उतर जाता है, अगली बारिश तक समस्या फिर जस की तस।
चुनाव खत्म,अब जनता किस दरवाजे पर जाए?- नगरीय निकाय चुनाव अभी हुए हैं, चुनाव के दौरान शहर की समस्याएं, विकास और नागरिक सुविधाएं हमेशा चर्चा के केंद्र में रहती हैं, जनता भी उम्मीद करती है कि चुनाव के बाद सड़क,नाली,सफाई और जल निकासी जैसी मूलभूत समस्याओं पर तेजी से काम होगा, लेकिन बारिश ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है,सूरजपुर नगर पालिका में कांग्रेस की सत्ता है,क्षेत्रीय विधायक भाजपा के हैं और राज्य में भी भाजपा की सरकार है, ऐसे में राजनीतिक जिम्मेदारी तय करने से ज्यादा जरूरी प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करना है,जनता के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पानी कांग्रेस की सीमा से आया है या भाजपा की सीमा से, जनता को बस पानी सड़क से हटता हुआ चाहिए,लेकिन स्थिति देखकर लगता है कि जिम्मेदारी भी शायद उसी पानी की तरह है—एक विभाग से दूसरे विभाग की ओर बहती रहती है।
‘वोट लो और फिर मजे करो’ वाली व्यवस्था?- शहर के लोगों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि चुनाव के समय जिस जनता की समस्या सबसे महत्वपूर्ण होती है, चुनाव के बाद वही समस्या प्राथमिकता सूची में नीचे क्यों चली जाती है? सड़क पर पानी भरा हो,नालियां जाम हों,कचरा जमा हो और लोगों को आवागमन में परेशानी हो—तो यह केवल बारिश की समस्या नहीं है। यह नगर प्रबंधन की तैयारी और नियमित निगरानी का भी सवाल है, अगर हर साल बारिश के बाद यही स्थिति बनती है तो फिर हर साल बारिश को दोष देना कुछ वैसा ही है जैसे परीक्षा में फेल होने के बाद किताब को दोष देना, बारिश तो अपना काम करेगी ही, सवाल यह है कि नगर व्यवस्था अपना काम कब करेगी?
सूरजपुर में विकास की असली परीक्षा बारिश ले रही है- किसी शहर के विकास का आकलन बड़े भवनों, रंग-रोगन,स्ट्रीट लाइट और सजावटी कार्यों से ही नहीं होता,असली परीक्षा तब होती है जब तेज बारिश होती है, बारिश के दौरान पानी कितनी जल्दी निकलता है? नालियां कितनी साफ हैं? मुख्य सड़कों पर जलभराव कितना होता है? आम नागरिक कितनी आसानी से आवागमन कर सकता है? इन सवालों के जवाब ही शहर की वास्तविक व्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड तैयार करते हैं, और फिलहाल सूरजपुर की तस्वीरें इस रिपोर्ट कार्ड पर बड़ा सवालिया निशान लगा रही हैं।
सफाई और नाली व्यवस्था की हो नियमित निगरानी- शहर में जलभराव की समस्या से निजात पाने के लिए केवल बारिश के समय पंप लगाने या पानी निकालने से काम नहीं चलेगा,नालियों की नियमित सफाई, अवैध अवरोधों को हटाना,कचरा फेंकने वालों पर कार्रवाई,जल निकासी के प्रमुख बिंदुओं की पहचान और बारिश से पहले व्यापक सफाई जरूरी है,साथ ही यह भी देखना होगा कि जिन नालियों का निर्माण हुआ है,उनका पानी वास्तव में कहां जा रहा है और क्या उनकी क्षमता शहर की मौजूदा आबादी एवं निर्माण के अनुरूप है, क्योंकि यदि नाली में पानी नहीं जा रहा और सड़क पर पानी ही पानी है,तो फिर सवाल केवल बारिश का नहीं—योजना, निर्माण, सफाई और निगरानी चारों का है।
अब तस्वीरें सवाल पूछ रही हैं…- सूरजपुर की बारिश ने कोई नई समस्या पैदा नहीं की है। उसने सिर्फ पुरानी समस्या को कैमरे के सामने ला दिया है,सड़क पर जमा पानी,बंद नालियां,कचरे से भरे निकासी मार्ग और जलमग्न सार्वजनिक स्थल शहर की उस व्यवस्था का आईना हैं,जिसकी चर्चा चुनावों में विकास के नाम पर होती है,अब जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारी इन तस्वीरों को केवल सोशल मीडिया की तस्वीर न मानें, बल्कि व्यवस्था की जांच रिपोर्ट मानकर देखें, क्योंकि जनता को हर मानसून में यह तय करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि वह सड़क से जा रही है, नाले से या नदी से, सूरजपुर को शहर ही रहने दीजिए साहब…हर बारिश में उसे तालाब और नदी बनाने की जरूरत नहीं है।
नाली बनी है, मगर पानी जाना मना है!
सूरजपुर में जल निकासी के लिए सड़क किनारे नालियां बनाई गई हैं, कागज पर यह व्यवस्था शायद पूरी तरह दुरुस्त होगी, लेकिन जमीन पर कहानी कुछ और है, कई स्थानों पर नालियों में कचरा जमा है, कहीं नालियां अवरुद्ध हैं तो कहीं पानी के बहाव का रास्ता ही बंद नजर आता है, अब सवाल यह है कि जब नाली में पानी ही नहीं जाएगा तो नाली आखिर किस काम की? शायद नगर की व्यवस्था का नया फार्मूला यही है—नाली बनाओ, उसकी सफाई भूल जाओ और बारिश होने पर सड़क को नाला घोषित कर दो, हर साल बारिश से पहले नालियों की सफाई की जरूरत होती है, लेकिन यदि सफाई समय पर नहीं होगी तो बारिश का पानी अपना रास्ता खुद बनाएगा, इस बार भी पानी ने रास्ता चुन लिया है और वह रास्ता सड़कों से होकर गुजर रहा है।
नेशनल हाईवे या ‘सूरजपुर जलमार्ग’?
शहर के नेशनल हाईवे की तस्वीरें व्यवस्था की कहानी खुद बयान कर रही हैं, सड़क पर इतना पानी जमा है कि दोपहिया वाहन चालक संभलकर निकलने को मजबूर हैं, भारी वाहनों के गुजरने पर सड़क पर जमा पानी चारों तरफ फैलता है, विडंबना यह है कि जिस मार्ग से रोजाना बड़ी संख्या में वाहन गुजरते हैं, उसी मार्ग पर जलभराव लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है, व्यंग्य में कहें तो सूरजपुर में बारिश के मौसम में नेशनल हाईवे का एक नया विभागीय उन्नयन हो जाता है—‘नेशनल हाईवे से नेशनल वाटरवे’, बस अंतर इतना है कि इस जलमार्ग पर नाव नहीं चलती, बल्कि बाइक, कार और ट्रक अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार तैरते हुए नजर आते हैं।


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