

- दो साल…एक जैसा खेल? शिवप्रसादनगर में कम रकबे पर ज्यादा पंजीयन और हजारों क्विंटल धान खरीदी का आरोप
- 2023-24 में समिति प्रबंधक सोहराब अंसारी पर सवाल, 2024-25 में सोहराब अंसारी और साधना कुशवाहा की भूमिका घेरे में…
- 23 किसानों के नाम पर 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे और 4728.80 क्विंटल धान बिक्री के दावे ने खोली व्यवस्था की पोल
- 23 किसानों की वास्तविक 20.94 हेक्टेयर जमीन के मुकाबले 88.27 हेक्टेयर रकबा दर्ज करने का आरोप…
- 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे पर सवाल—2023-24 और 2024-25 की खरीदी की जांच की मांग…
- पहले ओड़गी ब्लॉक के किसानों का रकबा शिवप्रसादनगर समिति के किसानों के नाम जोड़ने का आरोप,फिर उसी आधार पर धान खरीदी
- खबरें और शिकायतें सामने आने के बाद भी कार्रवाई पर सवाल…क्या कागजों में बढ़ता रहा खेत और गोदाम में आती रही फसल…
- शिवप्रसादनगर में रकबा बढ़ा,धान बिका… अब एफआईआर और जांच का इंतजार
- दो साल, एक जैसा खेल? रकबा बढ़ाने के आरोपों से घिरी शिवप्रसादनगर धान खरीदी
- कागज पर खेत बढ़े, धान के आंकड़े दौड़े—शिवप्रसादनगर समिति पर गंभीर सवाल
- खबरें छपीं, दस्तावेज सामने आए…फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं…शिवप्रसादनगर के रकबा कांड पर सवाल
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले के ओड़गी ब्लॉक की शिवप्रसादनगर धान खरीदी समिति एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है,इस बार मामला सिर्फ एक किसान,एक सीजन या किसी मामूली रिकॉर्ड त्रुटि तक सीमित नहीं बताया जा रहा,सामने आई शिकायतों और उपलब्ध विवरण के अनुसार धान खरीदी वर्ष 2023-24 और 2024-25, लगातार दो खरीदी वर्षों में किसानों के वास्तविक रकबे से अधिक भूमि का पंजीयन कर उसी आधार पर हजारों क्विंटल धान खरीदी किए जाने का आरोप है। आरोप है कि वर्ष 2023-24 में समिति प्रबंधक/धान खरीदी प्रभारी सोहराब अंसारी द्वारा ओड़गी ब्लॉक के किसानों के रकबे को शिवप्रसादनगर समिति के अंतर्गत पंजीकृत किसानों के नाम पर वास्तविक रकबे से अधिक दर्ज कराया गया और उसके आधार पर धान खरीदी की गई, इसके बाद वर्ष 2024-25 में भी कथित रूप से यही प्रक्रिया दोहराई गई,इस वर्ष समिति प्रबंधक सोहराब अंसारी और धान खरीदी प्रभारी साधना कुशवाहा की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि ओड़गी ब्लॉक के किसानों की जमीन का रकबा शिवप्रसादनगर समिति के पंजीकृत किसानों के नाम पर वास्तविक रकबे से अधिक दर्ज कराया गया और फिर उसी आधार पर हजारों क्विंटल धान खरीदी की गई, इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होगा, लेकिन यदि उपलब्ध आंकड़े और रिकॉर्ड जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला किसान पंजीयन से लेकर धान खरीदी और सरकारी भुगतान तक पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग करता है।
2023-24 में शुरू हुआ मामला या तभी से चल रहा था खेल?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल वर्ष 2023-24 से जुड़ा है,आरोप है कि उस खरीदी वर्ष में समिति प्रबंधक/धान खरीदी प्रभारी सोहराब अंसारी ने ऐसे किसानों के नाम पर अधिक रकबा पंजीकृत कराया जिनके वास्तविक खेत का रकबा कम था,यानी किसान के पास जमीन कम और सरकारी रिकॉर्ड में खेती का क्षेत्र अधिक,यदि ऐसा हुआ तो सवाल केवल यह नहीं कि पंजीयन किसने किया। सवाल यह है कि रकबा सत्यापन किसने किया? किसान के पास जितनी जमीन थी, उसका रिकॉर्ड राजस्व विभाग के पास उपलब्ध होना चाहिए,ऐसे में पंजीयन के समय वास्तविक रकबे और दर्ज रकबे का मिलान क्यों नहीं हुआ? क्या किसान पंजीयन के समय दस्तावेजों की जांच हुई? क्या समिति ने राजस्व रिकॉर्ड से मिलान किया? क्या संबंधित अधिकारी ने सत्यापन किया? यदि किया तो कथित रूप से अधिक रकबा दर्ज कैसे हो गया? और यदि सत्यापन नहीं किया गया तो फिर इतने बड़े पैमाने पर धान खरीदी किस आधार पर हुई?
67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबा—कागजों में खेत का विस्तार?- वर्ष 2024-25 से जुड़े उपलब्ध विवरण में 23 किसानों के नाम पर वास्तविक और पंजीकृत रकबे के बीच बड़ा अंतर बताया गया है।
आंकड़ों के अनुसार-यानी जहां वास्तविक रकबा 20.94 हेक्टेयर बताया जा रहा है, वहीं पंजीयन में यह आंकड़ा 88.27 हेक्टेयर तक पहुंचने का दावा है, यहां व्यंग्यात्मक सवाल उठना स्वाभाविक है खेत की मेड़ जमीन पर नहीं बढ़ी, लेकिन कागज पर 67.33 हेक्टेयर कैसे बढ़ गई? और अगर कागज पर रकबा बढ़ा तो उसके साथ 4728.80 क्विंटल धान भी कैसे जुड़ गया? यही वह बिंदु है जहां मामला साधारण पंजीयन त्रुटि से आगे बढ़कर गंभीर जांच की मांग करता है।
0.36 हेक्टेयर जमीन और 441.20 क्विंटल धान…रिकॉर्ड क्या कहता है?- उपलब्ध तालिका में कई ऐसे उदाहरण बताए गए हैं जहां वास्तविक रकबा बेहद कम है लेकिन पंजीयन और धान बिक्री काफी अधिक दिखाई गई है,मसलन विजय कुमार के नाम 0.36 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 4.66 हेक्टेयर पंजीयन और 441.20 क्विंटल धान बिक्री का विवरण दिया गया है, संताबाई के मामले में 0.45 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 6.76 हेक्टेयर पंजीयन और 366.40 क्विंटल धान बिक्री बताई गई है,शिवनाथ के नाम 0.54 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 5.95 हेक्टेयर पंजीयन और 419.60 क्विंटल धान बिक्री का दावा है, वहीं रामसाय के नाम 0.84 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 4.36 हेक्टेयर पंजीयन और 404.40 क्विंटल धान बिक्री बताई गई है, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। लेकिन यदि रिकॉर्ड में यही स्थिति है तो जांच का सवाल बेहद गंभीर हो जाता है।
आखिर अतिरिक्त रकबा आया कहां से?– यही पूरे मामले का मूल प्रश्न है, किसान के पास यदि 0.36 हेक्टेयर जमीन है तो उसके नाम 4.66 हेक्टेयर का पंजीयन किस आधार पर हुआ? यदि 0.45 हेक्टेयर जमीन है तो 6.76 हेक्टेयर कैसे दर्ज हुआ? क्या अतिरिक्त रकबा किसी दूसरे किसान की जमीन से आया? क्या ओड़गी ब्लॉक के किसी किसान का रकबा शिवप्रसादनगर समिति के किसान के नाम जोड़ दिया गया? क्या ऑनलाइन पंजीयन में किसी स्तर पर संशोधन किया गया? क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी के लॉगिन से रकबा बदला गया? इन सवालों का जवाब किसानवार पंजीयन रिकॉर्ड और पोर्टल के डिजिटल लॉग से मिल सकता है।
धान खरीदी का सबसे बड़ा सवाल…फसल आई कहां से?-धान खरीदी का रिकॉर्ड केवल रकबे से नहीं जुड़ा होता। फसल का वास्तविक उत्पादन भी जांच का हिस्सा होना चाहिए,यदि 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबा दर्ज किया गया और उसके आधार पर 4728.80 क्विंटल धान खरीदा गया तो जांच में यह भी देखना होगा कि क्या वह धान वास्तव में उन्हीं किसानों की जमीन पर पैदा हुआ था? यदि हां, तो खेत कहां है? यदि नहीं,तो धान किस खेत से आया? क्या दूसरे किसानों की फसल किसी अन्य किसान के नाम पर बेची गई? क्या भुगतान उन्हीं खातों में गया जिनके नाम पर धान खरीदा गया? इन सवालों के जवाब से पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
जमीन हस्तांतरण का दूसरा अध्याय-इस मामले से जुड़ी शिकायतों में ग्राम सोनपुर,तहसील भैयाथान की लगभग 3.13 हेक्टेयर यानी 7.7 एकड़ कृषि भूमि का मामला भी उठाया गया है, बताया गया है कि यह जमीन पूर्व में जरीफुल्ला के नाम दर्ज थी और बाद में हदीस मोहम्मद, रिजवान अंसारी और साधना कुशवाहा के नाम दर्ज होने की बात सामने आई,यदि यह राजस्व रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो जमीन हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक होगी, विशेष रूप से यह देखा जाना चाहिए कि जमीन के हस्तांतरण के समय उस पर कोई ऋण या बंधक था अथवा नहीं।
तीन बैंकों के ऋण का सवाल- शिकायत में संबंधित भूमि पर HDFC बैंक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक से ऋण होने का उल्लेख किया गया है,यदि भूमि पर ऋण लंबित था तो सवाल उठता है कि रजिस्ट्री से पहले संबंधित बैंक की एनओसी ली गई थी या नहीं, यदि एनओसी ली गई थी तो उसका रिकॉर्ड क्या है? यदि ऋण चुका दिया गया था तो भुगतान का प्रमाण क्या है? यदि बंधक हटाया गया था तो राजस्व रिकॉर्ड में उसका उल्लेख कब हुआ? इन सवालों की जांच के बिना भूमि हस्तांतरण की पूरी कहानी अधूरी रहेगी।
पहले भी खबरें प्रकाशित हुईं,फिर कार्रवाई कहां है?-इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि शिवप्रसादनगर समिति से जुड़े आरोपों को लेकर पहले भी कई बार समाचार प्रकाशित हो चुके हैं,रकबे के आंकड़े सामने आए, धान खरीदी पर सवाल उठे, जमीन हस्तांतरण का मुद्दा उठा,बैंक ऋण की स्थिति पर सवाल उठे, फिर भी यदि अब तक कोई निर्णायक प्रशासनिक कार्रवाई सामने नहीं आई है तो यह अपने आप में बड़ा सवाल है,यदि खबरों में लगाए गए आरोप गलत हैं तो प्रशासन को रिकॉर्ड के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, यदि आरोप गंभीर हैं तो जांच होनी चाहिए, लेकिन न खबर को मानना,न आरोप को खारिज करना और न जांच का स्पष्ट परिणाम बताना—यह तीसरी स्थिति जनता के संदेह को और मजबूत करती है,व्यंग्य में कहें तो शायद फाइल भी सोच रही होगी…‘पहले धान का मौसम खत्म हो जाए, फिर मेरी जांच होगी।
2024-25 में फिर वही कहानी, इस बार साधना की भूमिका भी सवालों में–
यदि वर्ष 2023-24 का मामला केवल रिकॉर्ड की गलती थी तो अगले खरीदी वर्ष में वही गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन आरोप है कि वर्ष 2024-25 में भी अधिक रकबा दर्ज कर धान खरीदी की गई, इस बार शिकायत में समिति प्रबंधक सोहराब अंसारी के साथ धान खरीदी प्रभारी साधना कुशवाहा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं, आरोप है कि दोनों की कथित मिलीभगत से ओड़गी ब्लॉक के किसानों का रकबा शिवप्रसादनगर समिति के पंजीकृत किसानों के नाम पर जोड़ा गया और वास्तविक रकबे से अधिक पंजीयन कराकर धान खरीदी की गई, यह आरोप गंभीर है और इसकी पुष्टि के लिए दोनों खरीदी वर्षों के किसानवार रिकॉर्ड का मिलान आवश्यक है, एक साल की गलती को चूक कहा जा सकता है, लेकिन दो साल लगातार एक जैसे आरोप सामने आएं तो उसे केवल संयोग मानकर छोड़ देना भी जांच से बचने का रास्ता हो सकता है।
क्या प्रशासन ने आंखें मूंद लीं?
किसी खबर में आरोप प्रकाशित होना अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करता, लेकिन जब मामला सरकारी धान खरीदी,किसानों के रकबे और हजारों क्विंटल धान से जुड़ा हो तो प्रशासन का दायित्व है कि वह तथ्य जांचे, यदि 2023-24 और 2024-25 दोनों वर्षों के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं तो दोनों को सामने रखकर तुलना करना मुश्किल काम नहीं है, किसान का वास्तविक रकबा, पंजीकृत रकबा, धान खरीदी, भुगतान, इन चार आंकड़ों का मिलान कर दिया जाए तो पूरा मामला काफी हद तक स्पष्ट हो सकता है।
क्या दो वर्षों में एक ही पैटर्न दोहराया गया?
यही सबसे महत्वपूर्ण जांच बिंदु है, यदि 2023-24 में अधिक रकबा दर्ज हुआ और उसी आधार पर अधिक धान खरीदा गया,फिर 2024-25 में भी वही तरीका अपनाया गया, तो जांच को यह देखना होगा कि क्या दोनों वर्षों में एक ही किसान,एक ही जमीन, एक ही लॉगिन,एक ही प्रक्रिया या एक ही स्तर के अधिकारी/कर्मचारी जुड़े हुए थे,यदि ऐसा पैटर्न सामने आता है तो मामला और गंभीर हो सकता है।
अब जांच केवल समिति की नहीं, पूरे सिस्टम की होनी चाहिए..
इस मामले में केवल समिति प्रबंधक या खरीदी प्रभारी की भूमिका देखना पर्याप्त नहीं होगा,जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि किसान पंजीयन किसने किया? रकबा किसने सत्यापित किया? संशोधन किसने किया? किस अधिकारी ने पंजीयन अनुमोदित किया? धान खरीदी किस आधार पर स्वीकार की गई? खरीदी के बाद भुगतान किस खाते में गया? क्या किसी दूसरे किसान का रकबा किसी अन्य किसान के नाम दर्ज हुआ? क्या दोनों खरीदी वर्षों में समान पैटर्न दिखाई देता है? यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदारी उसी स्तर पर तय होनी चाहिए।
धान का हिसाब होगा या फाइल फिर सो जाएगी?
शिवप्रसादनगर समिति का यह मामला अब सिर्फ यह सवाल नहीं रह गया है कि किस किसान ने कितना धान बेचा,अब सवाल यह है कि किसान के पास जमीन कितनी थी? पंजीयन में जमीन कितनी दिखाई गई? उस अतिरिक्त रकबे पर धान कितना खरीदा गया? उसकी रकम किसे मिली? और सबसे अहम—दो खरीदी वर्षों में कथित रूप से एक जैसी प्रक्रिया कैसे दोहराई गई? यदि वर्ष 2023-24 में सोहराब अंसारी की भूमिका पर आरोप हैं और वर्ष 2024-25 में सोहराब अंसारी के साथ साधना कुशवाहा की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं,तो दोनों वर्षों की पूरी फाइल सामने रखकर जांच करना ही सबसे उचित रास्ता होगा,क्योंकि खेत में जितनी जमीन है,उससे ज्यादा जमीन कागज पर उग आए और फिर उसी कागजी जमीन से हजारों क्विंटल धान भी पैदा हो जाए—तो इसे खेती का चमत्कार कहें या रिकॉर्ड का खेल,यह जांच के बाद ही तय होगा,लेकिन एक बात तय है की जब 23 किसानों के नाम, 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबा और 4728.80 क्विंटल धान का आंकड़ा सामने हो, तब फाइल बंद करने से सवाल बंद नहीं होंगे,अब प्रशासन को तय करना है कि वह इस मामले का वास्तविक हिसाब करेगा या फिर खबरें प्रकाशित होती रहेंगी,शिकायतें जाती रहेंगी और फाइल किसी सरकारी अलमारी में बैठकर अगली धान खरीदी का इंतजार करती रहेगी।
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