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13 नमूना सहायकों का प्रमोशन मामले में खंडन आया, लेकिन सवाल और बढ़ गए, डिग्री पहले से थी तो एफएसओ की सीधी भर्ती क्यों नहीं? 25′ कोटा बढ़ाने की टाइमिंग भी घेरे में
- ‘12वीं पास’ खबर के खंडन में 13 डिग्रीधारी सामने आए, अब विभाग से बड़ा सवाल—पहले नमूना सहायक क्यों?
- 10 से 25′ हुआ प्रमोशन कोटा, फिर 13 नमूना सहायकों की राह हुई आसान? नियम संशोधन की टाइमिंग से लेकर डीपीसी की भूमिका तक कई सवाल अनुत्तरित
- प्रमोशन नियमसम्मत तो पूरी फाइल सार्वजनिक करने में हिचक क्यों? 13 नमूना सहायकों की योग्यता, 25′ कोटा और डीपीसी की कार्यवाही पर पारदर्शिता की मांग
-संवाददाता-
रायपुर 03 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में 13 नमूना सहायकों को खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनाए जाने का मामला अब एक खबर और उसके खंडन के बीच का विवाद भर नहीं रह गया है, विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति ने भले ही एक प्रतिष्ठित अख़बार के एक प्रकाशित खबर को ‘असत्य, निराधार एवं काल्पनिक’ बताया हो, लेकिन जिस तरह खंडन में कुछ बिंदुओं का जवाब दिया गया और कई मूल सवालों पर चुप्पी बनी रही, उससे विवाद और गहरा गया है। 20 अगस्त 2026 को नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, छत्तीसगढ़ की ओर से जारी चार पेज की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि 13 नमूना सहायकों की पदोन्नति विभागीय पदोन्नति समिति द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, सेवा अवधि और दस्तावेजों की जांच के बाद की गई है, विज्ञप्ति में 13 पदोन्नत कर्मचारियों के नाम और उनकी शैक्षणिक योग्यताएं भी दर्ज हैं, विभाग का यह स्पष्टीकरण निश्चित रूप से रिकॉर्ड का हिस्सा है, लेकिन क्या इससे पूरा विवाद समाप्त हो जाता है? शायद नहीं, क्योंकि अब सवाल केवल यह नहीं है कि इन 13 कर्मचारियों के पास कौन-कौन सी डिग्री हैं, असली सवाल यह है कि इन डिग्रियों और उनकी मूल नियुक्ति, पदोन्नति के नियम, 25 प्रतिशत कोटा तथा विभागीय पदोन्नति समिति की प्रक्रिया के बीच संबंध क्या है?
12वीं पास की खबर का खंडन, लेकिन मूल सवाल जस के तस- एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित खबर के बाद विभाग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि 13 नमूना सहायकों को बिना योग्यता के खाद्य सुरक्षा अधिकारी नहीं बनाया गया है, विभाग ने पेज तीन पर सभी 13 कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता का विवरण देते हुए बताया है कि संबंधित कर्मचारियों की योग्यता का परीक्षण विभागीय पदोन्नति समिति ने किया था, विभाग के दस्तावेज में सूचीबद्ध योग्यताओं में एमएससी रसायन शास्त्र, एमएससी बायोटेक्नोलॉजी, एमएससी माइक्रोबायोलॉजी, एमएससी बायोकेमिस्ट्री और अन्य संबंधित योग्यताएं शामिल हैं, एक कर्मचारी की योग्यता बीटेक कृषि अभियांत्रिकी भी बताई गई है, यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है की अगर ये कर्मचारी इतनी उच्च शैक्षणिक योग्यता रखते थे, तो ये नमूना सहायक बने क्यों? क्या उनकी नियुक्ति के समय यही योग्यताएं उनके पास थीं? अगर थीं, तो उन्हें खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर सीधे भर्ती क्यों नहीं किया गया? अगर उस समय वे खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद के लिए पात्र नहीं थे, तो बाद में पात्रता कैसे और किस नियम के तहत बनी? और अगर उनकी डिग्री उस समय भी मान्य थी, तो क्या उन युवाओं और अभ्यर्थियों के अवसर पर कोई असर नहीं पड़ा जिन्होंने खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने के लिए निर्धारित भर्ती प्रक्रिया या प्रतियोगी परीक्षा का रास्ता चुना? इन सवालों का जवाब केवल वर्तमान शैक्षणिक योग्यता की सूची दिखाने से नहीं मिलता।
FSSAI के नियम में उच्च शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान- यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आता है, स्नस्स््रढ्ढ के खाद्य सुरक्षा एवं मानक नियमों के नियम 2.1.3 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए विभिन्न संबंधित विषयों में स्नातक/स्नातकोत्तर/डॉक्टरेट स्तर की योग्यताओं का प्रावधान है, इनमें फूड टेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, ऑयल टेक्नोलॉजी, कृषि विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान, बायोकेमिस्ट्री, माइक्रोबायोलॉजी, केमिस्ट्री और मेडिसिन आदि शामिल हैं। साथ ही निर्धारित प्रशिक्षण की शर्त भी है, 2025 में स्नस्स््रढ्ढ ने कुछ चिकित्सा पाठ्यक्रमों को भी खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद के लिए मान्यता प्राप्त विषयों में जोड़ा था, इसलिए विवाद का केंद्र केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘डिग्री है या नहीं’ असली जांच यह होनी चाहिए कि किस कर्मचारी की कौन-सी डिग्री, किस तारीख को प्राप्त हुई, उस समय लागू नियम क्या था और उस योग्यता के आधार पर उसकी पदोन्नति किस वैधानिक प्रक्रिया से हुई।
25′ कोटा—सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यहीं से जुड़ती है- विभाग की प्रेस विज्ञप्ति स्वयं स्वीकार करती है कि भर्ती नियम में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर 75 प्रतिशत सीधी भर्ती और 25 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान है, विज्ञप्ति के अनुसार छत्तीसगढ़ शासन ने 6 मई 2026 के राजपत्र के माध्यम से संबंधित भर्ती नियम में संशोधन करते हुए विभागीय पदोन्नति का प्रतिशत 10 से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया, यही संशोधन पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन जाता है, क्यों? क्योंकि सवाल यह नहीं है कि सरकार को भर्ती नियम बदलने का अधिकार है या नहीं, सरकार को नियम बदलने का अधिकार है, सवाल है की 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत करने की जरूरत कब महसूस हुई? इसका प्रस्ताव कब तैयार हुआ? फाइल किस तारीख को चली? किस अधिकारी ने प्रस्ताव रखा? क्या यह संशोधन पहले से लंबित था? यदि पहले से लंबित था तो कितने समय से? और सबसे महत्वपूर्ण है की क्या इस संशोधन का सीधा संबंध उन 13 नमूना सहायकों की पदोन्नति से था? इन सवालों का जवाब फाइल नोटिंग, प्रस्ताव, अनुमोदन और राजपत्र की प्रक्रिया से ही स्पष्ट हो सकता है।
तीन महीने पहले नियम बदला, फिर पदोन्नति संयोग या प्रशासनिक आवश्यकता?- यदि 6 मई 2026 को पदोन्नति का कोटा 10 से 25 प्रतिशत किया गया और इसके बाद 13 नमूना सहायकों को खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद पर पदोन्नत किया गया, तो घटनाक्रम की टाइमलाइन सार्वजनिक होना चाहिए, पहले प्रस्ताव बना या पदोन्नति की जरूरत सामने आई? पहले पद रिक्तियों की गणना हुई या कोटा बढ़ाया गया? पहले डीपीसी की तैयारी हुई या नियम संशोधन हुआ? क्या 25 प्रतिशत कोटा सामान्य मानव संसाधन आवश्यकता को देखते हुए बढ़ाया गया या तत्कालीन पदोन्नति की आवश्यकता को ध्यान में रखकर? इन सवालों का उत्तर मिलना इसलिए जरूरी है क्योंकि नियम में संशोधन और उसके बाद हुई पदोन्नति को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय उनकी प्रशासनिक टाइमलाइन देखना आवश्यक है, विभाग यदि यह कहता है कि संशोधन पहले से प्रस्तावित था तो प्रस्ताव की पुरानी तारीख सामने रखी जा सकती है, यदि ऐसा नहीं है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है।
भर्ती और पदोन्नति दोनों रास्ते हैं, लेकिन प्राथमिकता किसे?- विभाग की प्रेस विज्ञप्ति में साफ लिखा है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर 75 प्रतिशत सीधी भर्ती और 25 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान है, तो फिर यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उस समय कुल कितने खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद स्वीकृत थे और कितने रिक्त थे, कितने पद सीधी भर्ती के लिए निर्धारित थे? कितने पद पदोन्नति के लिए? क्या सीधी भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी? क्या पदोन्नति पहले कर दी गई? अगर पदोन्नति पहले हुई तो उसका प्रशासनिक कारण क्या था? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पदोन्नति का रास्ता नियम में होना अलग बात है और उस रास्ते को किस समय इस्तेमाल किया गया, यह अलग प्रशासनिक प्रश्न है।
‘10 साल का अनुभव’ भी बना जांच का विषय- विभाग ने अपने खंडन में एक और महत्वपूर्ण बात कही है, उसके अनुसार शैक्षणिक योग्यता के साथ नमूना सहायक के पद पर न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा अवधि पूरी करना आवश्यक था, विभागीय पदोन्नति समिति ने संबंधित कर्मचारियों की पात्रता और दस्तावेजों का परीक्षण किया, अब यहां भी कई दस्तावेजी सवाल हैं 13 कर्मचारियों की मूल नियुक्ति की तारीख क्या है? उनकी नियुक्ति किस भर्ती नियम के तहत हुई? नियुक्ति के समय उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या थी? 10 वर्ष की सेवा किस तारीख को पूरी हुई? क्या सभी 13 कर्मचारी एक ही तारीख अथवा अलग-अलग तारीखों में पात्र हुए? पदोन्नति के समय वरिष्ठता सूची क्या थी? क्या सभी पात्र कर्मचारियों पर समान मानदंड लागू किया गया? यदि इन सभी प्रश्नों के दस्तावेज उपलब्ध हैं तो विवाद समाप्त करने में विभाग को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
डीपीसी ने जांच की तो डीपीसी की पूरी कार्यवाही सार्वजनिक क्यों नहीं?- विभाग का सबसे मजबूत बचाव ही अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है, विभाग कहता है कि विभागीय पदोन्नति समिति ने गहन जांच की, तो फिर जनता को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि समिति ने क्या जांच की? डीपीसी में कौन-कौन सदस्य थे? बैठक कब हुई? कुल कितने कर्मचारी पात्र थे? कितनों के दस्तावेजों की जांच हुई? किस कर्मचारी की कौन-सी डिग्री स्वीकार की गई? क्या किसी कर्मचारी की योग्यता पर आपत्ति आई? क्या किसी कर्मचारी का नाम पात्रता सूची से बाहर हुआ? वरिष्ठता सूची का आधार क्या था? डीपीसी की अनुशंसा किस अधिकारी ने मंजूर की? इन सवालों के जवाब डीपीसी की कार्यवाही और संबंधित नोटशीट से मिल सकते हैं।
प्रतियोगी परीक्षा बनाम विभागीय पदोन्नति-अंतर समझना होगा- खाद्य सुरक्षा अधिकारी तकनीकी और नियामकीय जिम्मेदारी वाला पद है, FSSAI के नियमों में शैक्षणिक योग्यता के साथ प्रशिक्षण की शर्त भी है, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि सीधी भर्ती के लिए अभ्यर्थियों को निर्धारित चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, तो विभागीय पदोन्नति पाने वाले कर्मचारियों के लिए कौन-सी चयन प्रक्रिया लागू होती है? क्या केवल वरिष्ठता और शैक्षणिक योग्यता पर्याप्त है? क्या कोई विभागीय परीक्षा हुई? क्या दक्षता परीक्षण हुआ? क्या प्रशिक्षण कराया गया? या भर्ती नियम में विभागीय पदोन्नति के लिए अलग प्रक्रिया निर्धारित है? इसका जवाब भर्ती नियम की संबंधित अनुसूची और डीपीसी की कार्यवाही से ही तय होगा, इसलिए इस सवाल पर बिना दस्तावेज किसी कर्मचारी की योग्यता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन विभाग से पारदर्शी जवाब मांगना बिल्कुल उचित है।
प्रेस विज्ञप्ति में हस्ताक्षर का सवाल भी क्यों महत्वपूर्ण?- चार पेज की प्रेस विज्ञप्ति के अंतिम हिस्से में नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, छत्तीसगढ़ का पदनाम अंकित है, दस्तावेज पर हस्ताक्षर भी हैं, अब यदि यह दावा किया जा रहा है कि हस्ताक्षर नियंत्रक के नहीं बल्कि किसी अन्य अधिकृत अधिकारी जैसे सहायक औषधि नियंत्रक एवं स्थापना शाखा प्रभारी द्वारा किए गए हैं, तो सवाल सीधा है, क्या संबंधित अधिकारी को नियंत्रक की ओर से इस प्रकार की प्रेस विज्ञप्ति जारी करने का विधिवत अधिकार प्राप्त था? यह किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं है, यह केवल प्राधिकरण की वैधता से जुड़ा प्रशासनिक सवाल है, यदि प्राधिकरण आदेश है तो उसे सार्वजनिक किया जा सकता है, इससे यह विवाद भी तत्काल समाप्त हो जाएगा।
डीपीसी के सदस्यों को लेकर भी पारदर्शिता जरूरी- इस पूरे मामले में डीपीसी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि विभाग स्वयं अपने खंडन में समिति की जांच को पदोन्नति का आधार बता रहा है, ऐसे में समिति के गठन को लेकर उठने वाले सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यदि किसी सदस्य के खिलाफ न्यायालय में कोई मामला लंबित है, कोई विभागीय विवाद है अथवा उसकी भूमिका को लेकर कोई आपत्ति है, तो केवल इस आधार पर उसे दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि क्या डीपीसी सदस्यों के चयन के लिए कोई स्पष्ट मानदंड था? क्या हितों के टकराव से बचने की कोई व्यवस्था अपनाई गई? क्या सभी सदस्यों ने निष्पक्षता संबंधी घोषणा की? और सबसे महत्वपूर्ण है की क्या डीपीसी की पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड पर उपलब्ध है?
विभाग ने आरोप का खंडन किया, लेकिन आरोपों की तह तक जाने की जरूरत अभी बाकी- इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि विभाग ने प्रकाशित खबर को ‘पूर्णतः असत्य, निराधार एवं काल्पनिक’ बताया है, लेकिन एक मजबूत खंडन केवल यह बताने से पूरा नहीं होता कि ‘हमने नियम के अनुसार किया।’ अगर सवाल नियम पर है तो नियम की प्रति दीजिए, अगर सवाल योग्यता पर है तो नियुक्ति के समय की योग्यता बताइए, अगर सवाल 25 प्रतिशत कोटा पर है तो प्रस्ताव की फाइल दिखाइए, अगर सवाल पदोन्नति पर है तो डीपीसी की कार्यवाही बताइए, अगर सवाल वरिष्ठता पर है तो वरिष्ठता सूची सामने रखिए, अगर सवाल सीधी भर्ती पर है तो भर्ती प्रक्रिया की स्थिति बताइए, और अगर सवाल प्रेस विज्ञप्ति के हस्ताक्षर पर है तो अधिकृत अधिकारी का आदेश बताइए, दस्तावेज सामने आएंगे तो विवाद स्वतः खत्म हो जाएगा।
सवाल किसी कर्मचारी के खिलाफ नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता के पक्ष में- यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी कर्मचारी की डिग्री, योग्यता या पदोन्नति पर अंतिम फैसला समाचार रिपोर्ट के आधार पर नहीं किया जा सकता, यदि विभाग के पास वैध नियम, पात्रता और डीपीसी की विधिवत अनुशंसा है तो वही निर्णायक दस्तावेज होंगे, लेकिन उसी तरह किसी खबर को केवल ‘निराधार’ कह देने से भी सभी सवाल समाप्त नहीं हो जाते, खाद्य सुरक्षा अधिकारी का काम सीधे जनता के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए इस पद पर नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, विभाग की विश्वसनीयता उतनी ही मजबूत होगी।
मामले को एक झटके में स्पष्ट करने के लिए विभाग यदि निम्न दस्तावेज सार्वजनिक कर दे तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता हैः-
- 6 मई 2026 के भर्ती नियम संशोधन की अधिसूचना।
- 10 से 25 प्रतिशत पदोन्नति कोटा बढ़ाने की फाइल/प्रस्ताव की तारीख।
- कुल स्वीकृत एवं रिक्त खाद्य सुरक्षा अधिकारी पदों की स्थिति।
- 13 पदोन्नत कर्मचारियों की मूल नियुक्ति आदेश की प्रतियां।
- उनकी नियुक्ति के समय उपलब्ध शैक्षणिक योग्यता।
- वर्तमान पदोन्नति की पात्रता सूची एवं वरिष्ठता सूची।
- डीपीसी की बैठक की कार्यवाही एवं अनुशंसा।
- सीधी भर्ती के 75 प्रतिशत कोटे की वर्तमान स्थिति।
- पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा/प्रशिक्षण संबंधी प्रक्रिया, यदि लागू हो।
- प्रेस विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी का प्राधिकरण आदेश, यदि हस्ताक्षरकर्ता नियंत्रक स्वयं नहीं हैं।
खंडन नहीं, दैनिक घटती घटना के सवालों का जवाब दीजिए- जिस प्रतिष्ठित अखबार में खबर प्रकाशित होने के बाद विभाग खंडन छपवाने की कवायद में जुटा, उसी मामले पर दैनिक घटती घटना करीब 50 खबरों के जरिए लगातार सवाल उठा चुका है, अब जरूरत खंडन की नहीं, उन सवालों के तथ्यात्मक और दस्तावेजी जवाब की है, एक प्रतिष्ठित अखबार में खबर प्रकाशित होने के बाद विभाग ने उसका खंडन जारी कर दिया, लेकिन दैनिक घटती घटना इस पूरे मामले पर शुरुआत से लगातार खबरें प्रकाशित कर कई गंभीर सवाल उठा चुका है, अब तक इस मामले में करीब 50 खबरें प्रकाशित होने की स्थिति बन रही है, ऐसे में सवाल यह है कि यदि विभाग के पास पूरे मामले में नियमसम्मत प्रक्रिया और पारदर्शिता के पर्याप्त दस्तावेज हैं, तो उन सवालों का जवाब सीधे दैनिक घटती घटना को क्यों नहीं दिया जा रहा? खंडन किसी एक खबर का जवाब हो सकता है, लेकिन लगातार उठाए जा रहे सवालों का विकल्प नहीं, दैनिक घटती घटना ने जिन बिंदुओं पर सवाल उठाए हैं, उनमें 13 नमूना सहायकों की मूल नियुक्ति, उनकी नियुक्ति के समय की शैक्षणिक योग्यता, खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद की निर्धारित पात्रता, 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किए गए पदोन्नति कोटे की टाइमिंग, राजपत्र संशोधन की प्रक्रिया, सीधी भर्ती और पदोन्नति के क्रम तथा विभागीय पदोन्नति समिति की भूमिका जैसे सवाल शामिल हैं, विभाग की अपनी प्रेस विज्ञप्ति में भी 25 प्रतिशत पदोन्नति कोटे और 13 कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यताओं का उल्लेख किया गया है, इसलिए अब सवाल किस अखबार ने क्या लिखा? का नहीं, बल्कि दैनिक घटती घटना द्वारा लगातार उठाए गए सवालों का जवाब क्या है? का है।
प्रतिष्ठित अखबार को भी सवाल पूछना चाहिए-
यदि विभाग किसी प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित खबर को गलत बताकर खंडन जारी कर सकता है, तो उसी गंभीरता से यह भी पूछा जाना चाहिए कि दैनिक घटती घटना द्वारा लगातार प्रकाशित खबरों में उठाए गए सवालों का जवाब विभाग ने अब तक क्यों नहीं दिया? क्या विभाग के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं? या जवाब हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक करने से बचा जा रहा है? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो नियुक्ति आदेश, भर्ती नियम, राजपत्र संशोधन, डीपीसी की कार्यवाही, पात्रता सूची और पदोन्नति से संबंधित दस्तावेज सामने रखे जाने चाहिए, क्योंकि करीब 8 महीने में 50 खबरों के बाद भी यदि सवाल वहीं खड़े हैं, तो एक प्रेस विज्ञप्ति से मामला खत्म नहीं होगा, अब खंडन नहीं—दस्तावेज चाहिए, जवाब चाहिए और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता चाहिए।
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