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कोरिया@कोरिया पुलिस का कमाल : चोर 27 को मिले,खरीदार 1 सितंबर को 50 लाख की चोरी का गणित बिल्कुल फिट!

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  • पहले 40 लाख की बरामदगी,फिर 10 लाख का ‘अचानक’ प्रकट होना…पुलिस की दूसरी विज्ञप्ति ने खोल दिए कई नए सवाल…
  • 40 लाख की पहली बरामदगी के बाद 10 लाख का दूसरा खुलासा,पुलिस की दो प्रेस विज्ञप्तियों ने खड़े किए जांच की टाइमलाइन पर सवाल
  • टीएमसी की 50 लाख की चोरी,चोरों की गिरफ्तारी के पांच दिन बाद कथित खरीदार क्यों पकड़ा गया?
  • 40 लाख का माल पहले मिला, 10 लाख बाद में,कोरिया पुलिस की चोरी की कहानी में ‘खरीदार’ का लेट एंट्री!
  • चोर पकड़े, माल बरामद…फिर पांच दिन बाद मिला खरीदार! कोरिया पुलिस की कार्रवाई पर सवाल
  • 50 लाख की चोरी,40 लाख की बरामदगी और पांच दिन बाद 10 लाख का ‘खुलासा’
  • कोरिया पुलिस का ‘50 लाख वाला गणित’ः 40 लाख + 10 लाख = पूरा माल बरामद!
  • चोरी खुली या कहानी? पहले चोर,फिर खरीदार…पांच दिन में बदली पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति
  • चोरों से खरीदार तक पुलिस की ‘पांच दिन की यात्रा’,50 लाख की चोरी में उठे बड़े सवाल
  • माल पूरा बरामद’…लेकिन खरीदार पांच दिन बाद! कोरिया पुलिस की कहानी में कई अनुत्तरित सवाल


-रवि सिंह-
कोरिया,03 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया पुलिस में चोरी के मामलों का खुलासा भी कभी-कभी चोरी से ज्यादा दिलचस्प हो जाता है,चोरी होती है, एफआईआर दर्ज होती है,साइबर सेल सक्रिय होता है, चोर पकड़े जाते हैं,माल बरामद होता है और फिर प्रेस विज्ञप्ति जारी होकर बताया जाता है कि पुलिस ने शानदार सफलता हासिल कर ली,जनता भी सोचती है की चलो,मामला खुल गया, लेकिन कुछ मामलों में पुलिस का ‘खुलासा’ ही नए सवालों का ताला खोल देता है। बता दे की टीएमसी पाण्डोपारा की झिलमिली साइट के स्टोर से हुई लाखों रुपये की चोरी का मामला फिलहाल इसी श्रेणी में खड़ा दिखाई दे रहा है,पुलिस की पहली प्रेस विज्ञप्ति में चार आरोपियों की गिरफ्तारी और करीब 40 लाख रुपये के चोरी के पार्ट्स की बरामदगी का दावा किया गया, इसके बाद 1 सितंबर को दूसरी विज्ञप्ति आई,जिसमें कथित खरीदार सुजीत ताम्रकार की गिरफ्तारी और उसके कब्जे से करीब 10 लाख रुपये के पार्ट्स बरामद करने की बात कही गई,इसके बाद पुलिस ने कहा की चोरी हुआ पूरा सामान बरामद कर लिया गया, गणित देखिए की 40 लाख और 10 लाख मिलाकर 50 लाख,हिसाब तो बिल्कुल दुरुस्त,लेकिन पत्रकारिता का काम सिर्फ जोड़ना नहीं है,यह पूछना भी है कि ये रकम किस रास्ते से आई, किसके पास गई और पुलिस को किस मोड़ पर कौन मिला?
22 अगस्त की रात चोरी,24 अगस्त को रिपोर्ट और 27 अगस्त को चोर गिरफ्त में-पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 22 अगस्त 2026 की रात करीब 1ः34 बजे टीएमसी कंपनी की झिलमिली साइट स्थित स्टोर में चोरी हुई,यहां कोयला उत्खनन में इस्तेमाल होने वाली मशीनों के महंगे पार्ट्स रखे थे,जिनमें तांबा,पीतल और कांसा आदि धातुओं का इस्तेमाल होता है,24 अगस्त को कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर ने पुलिस को शिकायत दी, चोरी की अनुमानित कीमत करीब 50 लाख रुपये बताई गई और पटना थाने में अपराध दर्ज कर जांच शुरू हुई, इसके बाद पुलिस ने मुखबिर तंत्र सक्रिय किया। साइबर सेल को लगाया गया,संदिग्धों से पूछताछ हुई और पुलिस के अनुसार चोरी की पूरी कड़ी सामने आने लगी,27 अगस्त को चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, पुलिस ने दावा किया कि आरोपी 9-10 लोगों के समूह में चोरी करने पहुंचे थे, स्टोर की छत की सीट हटाई गई, मशीनों के महंगे पार्ट्स निकाले गए, चोरी का सामान पहले जंगल में छिपाया गया और बाद में उसे बेच दिया गया, पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों की निशानदेही पर करीब 40 लाख रुपये का सामान बरामद हुआ,यानी पुलिस की पहली कहानी में चोर भी मिल गए और माल भी,लेकिन एक चीज अभी बाकी थी—कथित खरीदार।
40 लाख पहले,10 लाख बाद में…चोरी का ‘किश्तों वाला खुलासा’– पुलिस की दोनों विज्ञप्तियों को साथ रखिए तो मामला कुछ यूं बनता है पहली किश्त में चार आरोपी गिरफ्तार, 40 लाख का माल बरामद,दूसरी किश्त में कथित खरीदार गिरफ्तार, 10 लाख का माल बरामद, अंतिम घोषणा में चोरी का पूरा सामान बरामद,ऐसा लगता है जैसे चोरी का खुलासा भी किसी वेब सीरीज की तरह एपिसोड में रिलीज हुआ हो,पहले एपिसोड में चोर, दूसरे में खरीदार,और दर्शकों के लिए बोनस सवाल—बाकी किरदार कौन हैं? व्यंग्य अपनी जगह है,लेकिन इस अंतर की जांच गंभीरता से होना जरूरी है,क्योंकि किसी भी आपराधिक मामले में बरामदगी की तारीख,स्थान,व्यक्ति और परिस्थितियां केस की महत्वपूर्ण कडि़यां होती हैं।
50 लाख या उससे अधिक? रकम का सवाल भी कम दिलचस्प नहीं- इस मामले में एक और सवाल चोरी की वास्तविक कीमत को लेकर है,कंपनी की शिकायत में करीब 50 लाख रुपये की चोरी बताई गई,पहली प्रेस विज्ञप्ति में करीब 40 लाख रुपये का सामान बरामद होने की बात कही गई,दूसरी में करीब 10 लाख रुपये की बरामदगी बताई गई,लेकिन स्थानीय स्तर पर चोरी की रकम को लेकर 50 लाख से अधिक,यहां तक कि उससे कहीं ज्यादा होने की चर्चाएं भी हैं,अब सवाल है—आधिकारिक मूल्यांकन क्या है? क्या चोरी गए प्रत्येक पार्ट की सूची तैयार हुई? क्या टीएमसी के अधिकृत अधिकारी ने बरामद सामान की पहचान की? क्या प्रत्येक पार्ट का मूल्य कंपनी के रिकॉर्ड से मिलाया गया? क्या 40 लाख और 10 लाख की कीमत का आधार समान है? और यदि कंपनी की वास्तविक क्षति 50 लाख से अधिक है तो पुलिस की विज्ञप्तियों में 50 लाख का आंकड़ा ही क्यों प्रमुख है? यह सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि बरामदगी और मूल्यांकन की पारदर्शिता के लिए है।
अब कहानी में सुजीत ताम्रकार और उसके बेटे का अध्याय- मामले में कथित खरीदार के रूप में सुजीत ताम्रकार का नाम सामने आया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया है,यहां से जांच का अगला स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या उसकी भूमिका अकेले तक सीमित थी? स्थानीय सूत्रों के हवाले से उसके बेटे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,यह दावा भी सामने आया है कि चोरी के सामान की आवाजाही में एक मारुति ईको वाहन का इस्तेमाल हुआ था,लेकिन पुलिस की उपलब्ध दोनों विज्ञप्तियों में उस वाहन की बरामदगी या सुजीत के बेटे की गिरफ्तारी का उल्लेख नहीं है,तो फिर सवाल यह है अगर वाहन की जानकारी जांच में आई थी,तो पुलिस उस वाहन तक पहुंची या नहीं? वाहन किसके नाम पर है? घटना की रात उसकी लोकेशन क्या थी? क्या सीसीटीवी फुटेज में वाहन दिखाई देता है? क्या उसमें चोरी का सामान ले जाया गया था? यदि हां,तो उसका ड्राइवर कौन था? और यदि पुलिस को इन सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं, तो क्या मामला वास्तव में पूरी तरह खुल गया है?
सड़क किनारे मिला बताया जा रहा मालसबसे बड़ा रहस्य-इस पूरे प्रकरण में एक और दावा सामने आया है, जिसे लेकर विभागीय स्तर पर जांच की जरूरत महसूस होती है, सूत्रों के अनुसार चोरी के कुछ सामान को पटना से कटगोड़ी/मुरमा की ओर जाने वाले मार्ग पर फेंके जाने की बात कही जा रही है,दावा है कि इस सामान की सूचना एक पुलिसकर्मी तक पहुंची और उसके बाद पटना पुलिस को जानकारी देकर सामान बरामद कराया गया,यह दावा फिलहाल स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं है और पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में भी सामान के सड़क किनारे लावारिस हालत में मिलने का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो सवाल बेहद सीधा है की उस सामान की जानकारी सबसे पहले संबंधित पुलिसकर्मी को कैसे मिली? किसने फोन किया? किस नंबर से फोन आया? किस समय सूचना दी गई? सूचना देने वाले को कैसे पता था कि वहां चोरी का सामान पड़ा है? क्या बरामदगी स्थल का पंचनामा बनाया गया? क्या वहां सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध था? क्या किसी वाहन की पहचान हुई? और क्या उस बरामदगी को केस डायरी में उसी रूप में दर्ज किया गया है? क्योंकि ‘आरोपी के कब्जे से बरामद’ और ‘सड़क किनारे लावारिस मिला’—दोनों परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं।


पांडेय जी तक सूचना पहले कैसे पहुंची?- यही वह बिंदु है जहां स्थानीय चर्चाओं में कोरिया पुलिस से जुड़े प्रधान आरक्षक पांडेय का नाम सामने आता है,आरोप है कि कथित सड़क किनारे पड़े सामान की जानकारी उन्हें मिली और फिर उन्होंने पटना पुलिस को इसकी सूचना दी,यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो सवाल बनता है पांडेय को ही यह सूचना क्यों मिली? और उनसे पहले पुलिस को जानकारी क्यों नहीं थी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि चोरी के सामान को किसी आरोपी अथवा उसके सहयोगी ने रास्ते में फेंका था,तो उसके बारे में जानकारी रखने वाला व्यक्ति खुद जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकता है,इसलिए सूचना देने वाले व्यक्ति की पहचान और उसके पुलिसकर्मी तक पहुंचने की कहानी जांच का हिस्सा होनी चाहिए।
‘सुपर कॉप’ और ‘मायावी’ की चर्चा ?-इस मामले के साथ एक और पुलिसकर्मी का नाम स्थानीय चर्चाओं में लिया जा रहा है,जो वर्तमान में पड़ोसी एमसीबी जिले में पदस्थ बताया जाता है,स्थानीय स्तर पर उसके लिए ‘सुपर कॉप’, ‘मायावी’ जैसे उपनाम इस्तेमाल किए जाने की चर्चा है,आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि जिला छोड़ने के बाद भी कोरिया में उसका प्रभाव और संपर्क बना हुआ है,यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि ये सभी आरोप और चर्चाएं हैं, स्थापित तथ्य नहीं, किसी पुलिसकर्मी पर अवैध कारोबारियों को संरक्षण देने, आरोपी को बचाने या लेनदेन करने जैसे आरोप गंभीर हैं और इनकी पुष्टि केवल स्वतंत्र जांच, विभागीय रिकॉर्ड या अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों से ही हो सकती है, लेकिन यदि ऐसे आरोप बार-बार उठ रहे हैं तो उन्हें जांच के दायरे में लाना विभाग के हित में ही होगा।
तिवारी जी एमसीबी में…फिर कोरिया में मौजूदगी क्यों?-सबसे बड़ा सवाल संबंधित पुलिसकर्मी की कोरिया जिले में कथित मौजूदगी को लेकर है,यदि वह वर्तमान में एमसीबी जिले में पदस्थ हैं तो यह पता लगाया जा सकता है कि चोरी की घटना और उसके बाद की जांच के दौरान वह कोरिया जिले में कब-कब आए, इसके लिए किसी विशेष जासूसी की आवश्यकता नहीं,सीसीटीवी देखिए, मोबाइल लोकेशन देखिए,वाहन की आवाजाही देखिए,कॉल डिटेल देखिए,यदि वे नहीं आए तो आरोप खत्म, यदि आए तो आने का कारण दर्ज होगा,और यदि उनका इस केस से कोई संबंध नहीं था तो जांच उसी तथ्य को साबित कर देगी।
‘लाल महल’ की चर्चा भी सीसीटीवी में खोजी जा सकती है- स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी चर्चा है कि संबंधित पुलिसकर्मी का बैकुंठपुर जिला मुख्यालय में आना-जाना बना रहता है और एक खास स्थान,जिसे स्थानीय बोलचाल में ‘लाल महल’ कहा जा रहा है,से उसके संपर्क की चर्चा होती है,इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है,लेकिन यदि सीसीटीवी कैमरे मौजूद हैं तो मामला सरल है,तारीख निकालिए, फुटेज देखिए, व्यक्ति की पहचान कीजिए, वाहन देखिए,अगर कुछ नहीं है तो चर्चा खत्म,अगर फुटेज में मौजूदगी है तो फिर अगला सवाल होगा—किससे मिलने आए थे और क्यों? यानी इस पूरे मामले में आरोपों का जवाब भी आरोप से नहीं,रिकॉर्ड से दिया जा सकता है।
क्या पुलिस ने पूरी ‘चेन’ पकड़ी या सिर्फ चोरी का माल?- चोरी के मामले का खुलासा केवल सामान बरामद होने से पूरा नहीं माना जाना चाहिए,असली सवाल पूरी श्रृंखला का है स्टोर से सामान किसने निकाला? किसने वाहन में रखा? किसने रास्ता बताया? किसने जंगल में छिपाया? किसने खरीदा? किसने आगे बेचा? किसने भुगतान किया? किसने सामान इधर-उधर किया? किसने सड़क किनारे फेंका? और किसे पहले से पता था कि सामान कहां है? यदि पुलिस इन सभी कडि़यों को जोड़ देती है तो मामला वास्तव में मजबूत खुलासा कहलाएगा।
वरिष्ठ अधिकारियों सेकुछ सीधी मांग…
पहला—पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक हो 22 अगस्त से 1 सितंबर तक पुलिस ने कब-कब क्या कार्रवाई की?
दूसरा—कथित खरीदार तक पहुंचने की कहानी बताई जाए सुजीत ताम्रकार का नाम पुलिस को कब पता चला?
तीसरा—सीसीटीवी जांच हो घटनास्थल से लेकर माल के संभावित परिवहन मार्ग तक।
चौथा—वाहनों की जांच हो किस वाहन से चोरी का माल गया?
पांचवां—कॉल डिटेल और लोकेशन की जांच हो चोरों और कथित खरीदार के बीच संपर्क था या नहीं?
छठा—पुलिसकर्मियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो क्या किसी दूसरे जिले में पदस्थ पुलिसकर्मी ने इस केस में हस्तक्षेप किया?
सातवां—बरामद माल का स्वतंत्र मूल्यांकन हो 40 लाख और 10 लाख की कीमत किस आधार पर तय हुई?

पहली विज्ञप्ति में खरीदार की कहानी,दूसरी में खरीदार की गिरफ्तारी
यहीं से इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है, पुलिस की पहली विज्ञप्ति में चोरी का सामान कबाड़ी को बेचने की बात कही गई है। यानी जांच के दौरान पुलिस को यह जानकारी मिल चुकी थी कि चोरी का माल सिर्फ चोरों के पास नहीं रहा, बल्कि उसे आगे बेचा गया,तो सवाल है—यदि चोरी का माल बेचने वाले और खरीदने वाले की कड़ी 27 अगस्त की जांच में सामने आ गई थी,तो कथित खरीदार की गिरफ्तारी 1 सितंबर को क्यों हुई? 27 अगस्त से 1 सितंबर तक पांच दिन का अंतर है,क्या इन पांच दिनों में पुलिस कथित खरीदार की तलाश कर रही थी? क्या वह फरार था? क्या पुलिस को उसका नाम बाद में पता चला? क्या उसके ठिकाने की निगरानी की गई? क्या उसके मोबाइल और वाहन की जांच की गई? या फिर कहानी में खरीदार का अध्याय ही बाद में जोड़ा गया? इन सवालों का जवाब पुलिस की दूसरी विज्ञप्ति नहीं देती,दूसरी विज्ञप्ति सिर्फ यह बताती है कि 1 सितंबर को सुजीत ताम्रकार को पूछताछ के लिए बुलाया गया और उसके पेश करने पर करीब 10 लाख रुपये के पार्ट्स बरामद हुए।


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