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सूरजपुर/भैयाथान@ धान एक लाख क्विंटल,खर्च 82 लाख पार!शिवप्रसादनगर में हिसाब की ‘खिचड़ी’ कौन पकाता रहा?

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  • 27 लाख के हिसाब पर 82 लाख की डेबिट! शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में खर्च का हिसाब कौन देगा?
  • एक लाख क्विंटल धान खरीदी का दावा,मजदूरी भुगतान पर भी सवाल, सीमित कर्मचारियों के बावजूद वेतन और अन्य मदों में भारी निकासी—बैंक स्टेटमेंट के मदवार ऑडिट की मांग…
  • 27 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से करीब 27 लाख बनते हैं,फिर नवंबर से जुलाई तक खाते से इतनी बड़ी रकम किस मद में निकली? मजदूरी और वेतन भुगतान भी जांच के घेरे में…
  • 27 लाख के धान पर 82 लाख की डेबिट! शिवप्रसादनगर समिति में ‘खर्च का खेल’ या कोई और हिसाब?
  • धान की बोरी का हिसाब पक्का,बैंक खाते के पैसों का हिसाब ढीला! शिवप्रसादनगर में उठे सवाल…
  • एक लाख क्विंटल धान खरीदा, खाते से लाखों निकले…कहां गया पैसा,कौन देगा हिसाब?
  • मजदूरी किसान दें,कर्मचारी गिने-चुने…फिर खाते से 82 लाख की निकासी क्यों?
  • किसान के धान का तौल हुआ,अब समिति के खर्च का तौल कौन करेगा?
  • धान कम नहीं,खर्च ज्यादा दिखा तो सवाल तो उठेंगे! शिवप्रसादनगर समिति का बैंक स्टेटमेंट खोल रहा राज
  • शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्रः एक लाख क्विंटल धान और 82 लाख की डेबिट…आखिर खर्च का आधार क्या?
  • धान’ की खरीद या ‘खर्च’ की बरसात? शिवप्रसादनगर समिति के खाते ने बढ़ाई पारदर्शिता की मांग

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,20 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में धान खरीदी से जुड़े खर्च का मामला अब केवल अनुमान और चर्चाओं तक सीमित नहीं रह गया है, समिति के बैंक खाते के उपलब्ध स्टेटमेंट में दर्ज लेन-देन को देखने पर वित्तीय प्रबंधन को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सूत्रों जो 01 जून 2025 से 22 जुलाई 2026 तक का बैंक स्टेटमेंट उपलब्ध है और इसमें नवंबर 2025 के बाद लगातार बड़ी-बड़ी डेबिट प्रविष्टियां दर्ज हैं। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य पहले ही स्पष्ट कर देना जरूरी है,उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट के अनुसार 12 नवंबर 2025 से 21 जुलाई 2026 तक की दर्ज डेबिट प्रविष्टियों का योग लगभग 1.16 करोड़ रुपये बैठता है,इसलिए इसे केवल 70 लाख रुपये से अधिक का खर्च कहना उपलब्ध स्टेटमेंट के हिसाब से कम आंकना होगा, हालांकि,इस पूरी राशि को धान खरीदी का खर्च मानना भी सही नहीं होगा,क्योंकि खाते में वेतन, मजदूरी,नकद भुगतान,आंतरिक ट्रांसफर,बैंक शुल्क और अन्य मदों की प्रविष्टियां भी शामिल हैं,यही वजह है कि अब असली सवाल कुल निकासी से ज्यादा मदवार खर्च के हिसाब का है।
एक लाख क्विंटल धान और 27 रुपये प्रति क्विंटल का सवाल-स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में लगभग एक लाख क्विंटल धान की खरीदी हुई,यदि धान खरीदी से संबंधित भुगतान की दर 27 रुपये प्रति क्विंटल मानी जाए तो एक लाख क्विंटल पर राशि लगभग 27 लाख रुपये बनती है,यदि इसमें अन्य स्वीकृत खर्च जोड़कर अधिकतम 30 से 35 लाख रुपये तक का खर्च मान लिया जाए,तब भी बैंक खाते में नवंबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच दिखाई दे रही भारी डेबिट प्रविष्टियां सवाल खड़े करती हैं,लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है—27 रुपये प्रति क्विंटल किस मद की अधिकृत दर है और इसमें कौन-कौन से खर्च शामिल हैं, यह संबंधित विभागीय आदेश से सत्यापित होना चाहिए,इसी तरह एक लाख क्विंटल की खरीदी का आंकड़ा भी खरीदी रजिस्टर से प्रमाणित किया जाना चाहिए,यानी सवाल आरोप लगाने का नहीं, बल्कि 27-35 लाख के अनुमान और बैंक खाते की वास्तविक वित्तीय गतिविधि के बीच अंतर का दस्तावेजी हिसाब मांगने का है।
वेतन के नाम पर भी लाखों…कर्मचारी कितने और भुगतान कितना?-बैंक खाते में वेतन भुगतान की प्रविष्टियां भी दर्ज हैं,26 दिसंबर 2025 को 3,90,000‘जुलाई से 25 नवंबर तक वेतन’ के नाम पर भुगतान हुआ, इसके बाद 9 मार्च 2026 को 2,34,000 ‘वेतन भुगतान दिसंबर 25 से फरवरी 2026 तक’ के नाम से डेबिट दर्ज है,उसी दिन 95,600 की दैनिक मजदूरी संबंधी प्रविष्टि भी दर्ज है,अब सवाल यह है कि समिति में उस अवधि में कितने कर्मचारी कार्यरत थे और उनका स्वीकृत वेतन कितना था? यदि कर्मचारियों की संख्या सीमित थी तो कर्मचारीवार वेतन बिल सामने रखकर आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि वास्तविक वेतन कितना बनता है,वेतन बिल है तो हिसाब आसान है,कर्मचारी की संख्या म मासिक वेतन में महीनों की संख्या=कुल वेतन,फिर बैंक खाते से निकली राशि से उसका मिलान किया जा सकता है, यदि दोनों बराबर हैं तो सवाल खत्म। यदि अंतर है तो फिर अंतर का कारण बताना होगा।
‘एसएम एसपीनगर को भुगतान किया गया’…नकद भुगतान की लंबी श्रृंखला- बैंक स्टेटमेंट में कई बार ‘एसएम एसपीनगर को भुगतान किया गया’ के नाम से नकद चेक भुगतान दर्ज हैं, फरवरी 2026 में 1,35,900, 94,360, 67,320 जैसे भुगतान दिखाई देते हैं,मार्च 2026 में भी 1,17,860 और 1,33,000 जैसे नकद चेक भुगतान दर्ज हैं। अप्रैल में 1,78,300,93,280 और 99,076 की निकासी दर्ज है,मई में 66,850 और 3,90,100 तथा जून में 1,01,930, 2,96,050 और 2,70,600 जैसे भुगतान दिखाई देते हैं,जुलाई 2026 में भी 2,88,850 का भुगतान‘एसएम एसपीनगर को भुगतान किया गया’ के नाम से दर्ज है और 14 जुलाई को 2,91,550 का नकद भुगतान तथा 21 जुलाई को 1,93,600 का भुगतान दर्ज है,यहां सवाल यह नहीं कि नकद भुगतान अपने आप में अवैध है,सवाल यह है कि इन सभी भुगतानों के पीछे कौन-सा कार्य था और उसका बिल-वाउचर कहां है यदि प्रत्येक भुगतान के पीछे स्वीकृत बिल,समिति का प्रस्ताव,कैशबुक प्रविष्टि और प्राप्तकर्ता का हस्ताक्षर मौजूद है तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है, लेकिन यदि भुगतान के पीछे दस्तावेज नहीं हैं तो फिर यही राशि जांच का केंद्र बनेगी।
खाते में आंतरिक ट्रांसफर भी,क्या यह खर्च है…या सिर्फ खाते का स्थानांतरण?-स्टेटमेंट में कुछ ऐसी प्रविष्टियां भी हैं जो सीधे खर्च नहीं बल्कि ट्रांसफर प्रतीत होती हैं,उदाहरण के लिए 1 जनवरी 2026 को 2,06,669 और 1,44,955 की राशि ‘भ्क्रस्न ्रस् क्कश्वक्र भ्ष्टस् क्कक्र्रस्भ््रङ्क’ के विवरण के साथ दूसरे भ्ष्टस् खातों में ट्रांसफर हुई,ऐसी राशि को सीधे धान खरीदी का खर्च मानना उचित नहीं होगा। इसी तरह अन्य खातों में ट्रांसफर हुई रकम का भी अलग हिसाब बनना चाहिए, यही कारण है कि बैंक स्टेटमेंट देखकर केवल कुल डेबिट को भ्रष्टाचार कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा,लेकिन कुल डेबिट में से वास्तविक धान खरीदी खर्च कितना है और अन्य मदों में कितना गया,इसका हिसाब मांगना पूरी तरह जायज सवाल है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि धान की बोरी से ज्यादा बड़ा हो गया खर्च का थैला?- व्यंग्य की भाषा में कहें तो धान खरीदी केंद्र में किसान अपनी बोरी लेकर आता है और विभाग उसकी बोरी का वजन करता है,लेकिन अब सवाल यह है कि केंद्र के बैंक खाते से निकलने वाले पैसों का वजन कौन करेगा? धान की बोरी में एक लाख क्विंटल का हिसाब है तो बैंक खाते में हर एक रुपये का हिसाब होना चाहिए, क्योंकि यह किसी निजी कारोबारी की दुकान का पैसा नहीं है, यह सहकारी संस्था का पैसा है और इसके पीछे किसान की उपज तथा सरकारी व्यवस्था जुड़ी हुई है,इसलिए ‘बैंक खाते में पैसा निकला’ और‘भ्रष्टाचार हुआ…इन दोनों को एक नहीं माना जा सकता,लेकिन यदि पैसा निकला है तो‘क्यों निकला?’यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है,और यदि जवाब है कि यह मजदूरी थी तो मजदूर कौन? यदि जवाब है कि वेतन था तो कर्मचारी कौन? यदि जवाब है कि परिवहन था तो वाहन कौन? यदि जवाब है कि धान खरीदी का खर्च था तो किस स्वीकृत दर पर? यदि जवाब है कि प्रशासनिक खर्च था तो किस प्रस्ताव पर? यानी हर रुपये के पीछे एक दस्तावेज होना चाहिए।
जांच हो तो सिर्फ बैंक खाते की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की हो-इस मामले में किसी एक बैंक प्रविष्टि को पकड़कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा,यदि जांच करनी है तो धान खरीदी की कुल मात्रा,स्वीकृत दर,खरीदी अवधि,परिवहन,हमाली,मजदूरी,वेतन,बारदाना, स्टॉक, मिलर को उठाव, कैश बुक, लेजर और बैंक स्टेटमेंट—सभी का मिलान किया जाना चाहिए,खास तौर पर नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तक की सभी डेबिट प्रविष्टियों को मदवार बांटकर देखा जाए,धान खरीदी से सीधे जुड़े खर्च कितने? मजदूरी कितनी?वेतन कितना?परिवहन कितना?नकद भुगतान कितना?अन्य प्रशासनिक खर्च कितना? आंतरिक ट्रांसफर कितना? और ऐसा भुगतान कितना जिसके पीछे कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं? तभी वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
अब समिति से सवाल—मदवार हिसाब सार्वजनिक होगा या नहीं?-
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र के बैंक खाते से जुड़े आंकड़े सामने आने के बाद सबसे स्वाभाविक मांग यही है कि समिति और संबंधित सहकारिता अधिकारी मदवार खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करें,यदि खाते से निकला पैसा नियमसम्मत है तो दस्तावेज दिखाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए,यदि मजदूरी का भुगतान नियम के अनुसार हुआ है तो मजदूरों की सूची सामने रखी जा सकती है,यदि वेतन का भुगतान हुआ है तो कर्मचारीवार वेतन बिल उपलब्ध कराया जा सकता है,यदि नकद भुगतान हुआ है तो वाउचर और कैशबुक दिखाई जा सकती है, और यदि कोई राशि दूसरे खाते में ट्रांसफर हुई है तो उसका उद्देश्य और अंतिम उपयोग बताया जा सकता है,फिर सवाल खत्म,लेकिन यदि करोड़ों की आवाजाही के बावजूद हिसाब सिर्फ इतना मिले कि ‘सब नियम से हुआ’,तो किसान का अगला सवाल स्वाभाविक होगा—नियम कहां है और पैसा किस मद में है?
अंतिम सवाल…धान खरीदी केंद्र है या खर्च का खुला खाता?-
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का बैंक स्टेटमेंट कई सवाल सामने रखता है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलना चाहिए,उपलब्ध दस्तावेज इतना जरूर दिखाते हैं कि खाते में नवंबर 2025 के बाद बड़ी मात्रा में वित्तीय गतिविधियां हुईं और कई भुगतान धान खरीदी,मजदूरी, वेतन तथा नकद भुगतान से जुड़े हैं,अब गेंद सहकारिता विभाग के पाले में है, एक लाख क्विंटल धान की खरीदी हुई तो कुल स्वीकृत खर्च कितना था? 27 रुपये प्रति क्विंटल की दर किस मद के लिए थी? मजदूरी का भुगतान कौन करता था? समिति के खाते से मजदूरी मद में पैसा क्यों निकला? सीमित कर्मचारियों के वेतन पर कुल कितना खर्च हुआ?‘स्रू स्क्कहृ्रत्र्रक्र को भुगतान किया गया’के नाम से निकली रकम किस काम में लगी? नकद भुगतान के पीछे कौन-से बिल और वाउचर हैं? और सबसे बड़ा सवाल—यदि नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तक खाते से करीब 1.16 करोड़ रुपये की डेबिट हुई है, तो इस पूरी रकम का मदवार हिसाब आखिर कौन देगा? क्योंकि किसान के धान का हिसाब बोरी-बोरी में लिया जाता है,तो सहकारी समिति के पैसे का हिसाब रुपये-रुपये में क्यों नहीं होना चाहिए?
नवंबर से खाते में करोड़ों की
हलचल,खर्च का हिसाब कहां है?
बैंक स्टेटमेंट में 12 नवंबर 2025 को 2,85,467.52 की जमा प्रविष्टि,21 नवंबर को 28,14,453.23 की जमा और 29 नवंबर को 1,28,366.28 की जमा दिखाई देती है, 4 दिसंबर को भी 2,45,601.72 जमा हुआ,दूसरी ओर इसी अवधि में कई डेबिट प्रविष्टियां भी दर्ज हैं,इसके बाद दिसंबर से मार्च तक खाते में लगातार भुगतान होते दिखाई देते हैं,इनमें मजदूरी,वेतन,नकद भुगतान,विभिन्न संस्थाओं को भुगतान तथा अन्य खर्च शामिल हैं,दिसंबर में 3.90 लाख का भुगतान ‘जुलाई से 25 नवंबर तक वेतन’ के नाम से दर्ज है,फिर फरवरी 2026 में धान खरीदी से सीधे संबंधित दिखाई देने वाली प्रविष्टियां भी सामने आती हैं,4 फरवरी 2026 को 1,59,600—’धान खरीदी 2025 2026 मजदूरी’ के विवरण के साथ डेबिट हुआ,अगले दिन 5 फरवरी को 1,90,000‘मजदूरी भुगतान 2025-26’ के नाम से डेबिट दर्ज है,यही वह बिंदु है जहां मजदूरी भुगतान की व्यवस्था को लेकर स्पष्टता जरूरी हो जाती है।
जब मजदूरी का भुगतान किसान करते हैं तो समिति के खाते से मजदूरी भुगतान क्यों?
इस मामले में स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि धान खरीदी केंद्र पर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान किसान स्वयं करते हैं और समिति के खाते से मजदूरी भुगतान नहीं होना चाहिए, यदि संबंधित व्यवस्था वास्तव में ऐसी ही है तो बैंक स्टेटमेंट में दर्ज ‘धान खरीदी 2025-2026 मजदूरी’ और ‘मजदूरी भुगतान 2025-26’ जैसी प्रविष्टियों का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए,यहां बैंक स्टेटमेंट स्वयं यह प्रमाणित नहीं करता कि भुगतान गलत था,लेकिन वह इतना जरूर दिखाता है कि ऐसे भुगतान दर्ज हुए हैं,इसलिए समिति को यह बताना चाहिए कि किस मजदूर को कितना भुगतान हुआ? किस तारीख को हुआ? कितने दिन काम कराया गया? किस दर से मजदूरी तय हुई? मजदूरों की उपस्थिति किस रजिस्टर में दर्ज है? किस अधिकारी ने भुगतान स्वीकृत किया? और सबसे महत्वपूर्ण—यदि मजदूरी का भुगतान किसी अन्य व्यवस्था के तहत होना था तो समिति के खाते से यह रकम क्यों निकली? इन सवालों का जवाब मजदूरी रजिस्टर,भुगतान वाउचर,उपस्थिति पंजी और बैंक भुगतान का मिलान करके ही मिल सकता है।
फिर 1.16 करोड़ की डेबिट का बड़ा हिस्सा गया कहां?
उपलब्ध स्टेटमेंट में 12 नवंबर 2025 से 21 जुलाई 2026 तक दर्ज डेबिट प्रविष्टियों का कुल योग लगभग 1,16,09,688.55 बैठता है,यानी करीब 1.16 करोड़ रुपये, लेकिन इस आंकड़े को सीधे ‘धान खरीदी में खर्च’ कहना भी गलत होगा, क्योंकि इसमें वेतन, मजदूरी, नकद भुगतान, बैंक शुल्क और कुछ ट्रांसफर शामिल हैं, यहीं से असली खबर निकलती है,अगर 1.16 करोड़ रुपये धान खरीदी का खर्च नहीं है तो फिर इसका मदवार विवरण क्या है? और यदि इसका बड़ा हिस्सा धान खरीदी से संबंधित है तो फिर एक लाख क्विंटल धान की खरीदी के लिए इतना खर्च क्यों? यही वह सवाल है जिसका जवाब समिति और संबंधित सहकारिता अधिकारियों को देना चाहिए।
27 लाख का गणित और 1.16 करोड़ का बैंक हिसाब—बीच की कहानी कौन बताएगा?
एक तरफ एक लाख क्विंटल म 27 रुपये = 27 लाख रुपये का गणित सामने है,दूसरी तरफ बैंक खाते में नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तक करीब 1.16 करोड़ रुपये की डेबिट प्रविष्टियां दिखाई देती हैं, बीच का अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार साबित नहीं करता,क्योंकि खाते में अन्य प्रकार के लेन-देन भी हैं,लेकिन यह अंतर इतना बड़ा जरूर है कि मदवार ऑडिट जरूरी हो जाता है,सहकारिता विभाग चाहे तो इस सवाल का जवाब एक ही दिन में दे सकता है, बस बैंक स्टेटमेंट लेकर कैशबुक सामने रखी जाए, कैशबुक के साथ लेजर रखा जाए, लेजर के साथ वाउचर रखे जाएं, वाउचर के साथ भुगतान प्राप्तकर्ता की जानकारी रखी जाए,मजदूरी के साथ मजदूरों की सूची रखी जाए, वेतन के साथ कर्मचारीवार बिल रखा जाए,और धान खरीदी के साथ स्टॉक एवं परिवहन रिकॉर्ड रख दिया जाए, फिर पता चल जाएगा कि पैसा कहां गया।
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र : खर्च का हिसाब सवालों में


नोटः बैंक खाते की कुल डेबिट को सीधे भ्रष्टाचार या धान खरीदी का खर्च नहीं
माना जा सकता। वास्तविक स्थिति के लिए कैश बुक,लेजर,बैंक स्टेटमेंट,बिल-वाउचर,
मजदूरी भुगतान रजिस्टर और संबंधित स्वीकृति आदेशों का मिलान जरूरी है।


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