- नौगई की आग पर चुप्पी,दिल्ली जाने वाली ट्रेन पर बधाई,आखिर जनता किसे अपना प्रतिनिधि माने?
- नौगई न्याय का इंतजार करता रहा,राजनीति रेलवे बोर्ड का पत्र पढ़ती रही…
- क्षेत्र में मातम था…सोशल मीडिया पर सौगात थी…
- जनता संवेदना खोज रही थी…सत्ता ट्रेन की नई टाइमिंग बता रही थी…
रवि सिंह
कोरिया/भरतपुर-सोनहत,22 जून 2026 (घटती-घटना)। राजनीति में समय का बड़ा महत्व होता है, क्या बोलना है,कब बोलना है और किस मुद्दे पर बोलना है,यही किसी जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता और प्राथमिकता तय करता है,लेकिन कोरिया जिले के नौगई गांव में हुई तिहरी मौत की भयावह घटना के बाद भरतपुर-सोनहत विधानसभा की राजनीति में जो तस्वीर सामने आई,उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ पूरा जिला नौगई कांड की चर्चा में डूबा रहा,तीन लोगों की दर्दनाक मौत, प्रदेश भर में सुर्खियां,गांव में मातम, सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक बहस, विपक्ष के बयान, सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाएं, पुलिस जांच,आत्मसमर्पण, गिरफ्तारी और न्याय की मांग,दूसरी तरफ क्षेत्र की स्थानीय विधायक की ओर से पांच दिनों तक ऐसी खामोशी रही मानो उनके विधानसभा क्षेत्र में कुछ हुआ ही न हो,लोग इंतजार करते रहे कि शायद आज कोई बयान आएगा,शायद आज पीडि़त परिवारों से मुलाकात होगी,शायद आज कोई संवेदना व्यक्त की जाएगी, लेकिन पांच दिन बीत गए और राजनीतिक कैलेंडर में नौगई का नाम तक दर्ज नहीं हुआ,फिर अचानक 22 जून की शाम सोशल मीडिया पर एक पोस्ट दिखाई देती है, जनता को लगा कि शायद अब नौगई की बात होगी,शायद न्याय की बात होगी,शायद पीडि़त परिवारों का जिक्र होगा। लेकिन पोस्ट खुली तो उसमें नौगई नहीं थी,उसमें थी दिल्ली जाने वाली ट्रेन,पोस्ट में लिखा था कि क्षेत्रवासियों के लिए सौगात मिली है और अंबिकापुर-हजरत निजामुद्दीन एक्सप्रेस की आवृत्ति साप्ताहिक से बढ़ाकर द्वि-साप्ताहिक कर दी गई है, निश्चित रूप से यह क्षेत्र के लिए अच्छी खबर है,रेल सुविधा बढ़ना स्वागत योग्य है, लेकिन जनता के मन में सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस समय यही सबसे जरूरी सूचना थी?
गांव में चिता की राख ठंडी नहीं हुई थी,राजनीति रेलवे टाइम टेबल पढ़ रही थी-नौगई में जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया, उनके घरों में अभी भी मातम पसरा हुआ है,गांव में लोग आज भी घटना की चर्चा कर रहे हैं,पीडि़त परिवार न्याय की मांग कर रहे हैं,पूरा जिला घटना को लेकर संवेदनशील बना हुआ है,ऐसे समय में जनता यह उम्मीद करती है कि उसका जनप्रतिनिधि कम से कम एक संवेदना संदेश तो जारी करे। यदि किसी कारणवश मौके पर नहीं पहुंच पाया तो पीडि़त परिवारों के प्रति दुख व्यक्त करे। लेकिन यहां तो स्थिति उलटी दिखाई दी,घटना के पांच दिन बाद जो पहली प्रमुख सार्वजनिक प्रतिक्रिया दिखाई दी,उसमें न पीडि़त थे,न न्याय था, न संवेदना थी,न घटना का उल्लेख था। वहां केवल रेल सुविधा थी,ऐसा लगा जैसे जनता शोक में है और राजनीति रेलवे बोर्ड की प्रेस विज्ञप्ति पढ़ रही है।
क्या नौगई विधानसभा क्षेत्र में नहीं आता?
यह सवाल अब खुले तौर पर पूछा जाने लगा है,क्योंकि जिस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कोई विधायक करता है, वहां घटित बड़ी घटनाओं पर उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से अपेक्षित मानी जाती है, यदि किसी क्षेत्र में सड़क बनती है तो श्रेय लिया जाता है, यदि कोई ट्रेन बढ़ती है तो पोस्ट की जाती है, यदि कोई योजना स्वीकृत होती है तो बधाई संदेश जारी होता है,तो फिर जब उसी क्षेत्र में तीन लोगों की मौत हो जाए तो संवेदना व्यक्त करने में संकोच क्यों? क्या दुख के समय जनता प्रतिनिधि की नहीं होती और विकास के समय जनता प्रतिनिधि की हो जाती है?
संवेदना भी राजनीतिक दायित्व होती है…
लोकतंत्र केवल विकास कार्यों का नाम नहीं है,लोकतंत्र जनता के सुख-दःुख में सहभागी बनने का भी नाम है,कई बार एक ट्वीट, एक पोस्ट, एक फोन कॉल या एक मुलाकात भी पीडि़त परिवार को यह भरोसा देती है कि उनका जनप्रतिनिधि उनके साथ खड़ा है,लेकिन जब ऐसी बड़ी घटना पर लगातार चुप्पी बनी रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है,जनता यह जानना चाहती है कि क्या उनके प्रतिनिधि के लिए रेलगाड़ी की अतिरिक्त फेरी तीन मौतों से अधिक महत्वपूर्ण विषय थी?
जनता को सौगात चाहिए,लेकिन संवेदना भी चाहिए…
रेलवे सुविधा बढ़ना विकास है, नई ट्रेन चलना विकास है,यात्रियों को सुविधा मिलना विकास है, लेकिन विकास और संवेदना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, जनता को रेल भी चाहिए और प्रतिनिधि का साथ भी चाहिए, उसे सड़क भी चाहिए और दुख में सहारा भी चाहिए,उसे योजनाएं भी चाहिए और न्याय की आवाज भी चाहिए,नौगई कांड के बाद लोगों को शायद यही उम्मीद थी कि उनका जनप्रतिनिधि पहले उनके घावों पर मरहम लगाएगा और फिर विकास की बातें करेगा।
राजनीति का सबसे कठिन प्रश्न…नौगई कांड ने केवल कानून
व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े किए हैं, बल्कि राजनीति की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े किए हैं,क्योंकि इतिहास में जनता यह नहीं याद रखती कि कौन सी ट्रेन सप्ताह में एक दिन और बढ़ी थी,लेकिन यह जरूर याद रखती है कि संकट की घड़ी में कौन उनके साथ खड़ा था और कौन नहीं, आज भरतपुर-सोनहत की जनता के बीच शायद यही चर्चा है जब हमारा गांव जल रहा था, तब हमारी नेता कहां थीं? और यह सवाल किसी विपक्षी दल का नहीं,बल्कि उस जनता का है जिसने प्रतिनिधित्व का अधिकार सौंपा था।
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