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कोरिया/सोनहत@ हत्या का समर्थन या न्याय का सम्मान?

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  • क्या अपराधी होने का आरोप किसी की हत्या का औचित्य बन सकता है?
  • नौगई कांड: कानून से बड़ा समाज या समाज से बड़ा कानून?
  • मृतक पर आरोप,आरोपियों पर सहानुभूति! आखिर न्याय का पैमाना क्या है?
  • हत्या के बाद चरित्र हनन क्यों? न्याय या बचाव की रणनीति!
  • कानून के कटघरे में नौगई कांड,समाज के कटघरे में सोच
  • यदि वह अपराधी था तो सजा अदालत देती, आग नहीं
  • नौगई तिहरा हत्याकांड: न्याय की लड़ाई या अपराध का सामाजिक बचाव?
  • तीखी टिप्पणी: “मरा हुआ अपराधी था या नहीं,यह बहस बाद की है,पहले जवाब दीजिए—हत्या का अधिकार किसने दिया?
  • नौगई तिहरे हत्याकांड के बहाने समाज,कानून और नैतिकता पर बड़ा सवाल


-रवि सिंह-
कोरिया/सोनहत, 22 जून 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले के नौगई गांव में हुए तिहरे हत्याकांड ने पूरे जिले ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है, घटना के बाद पुलिस जांच अपने स्तर पर चल रही है, आरोपियों की गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण की प्रक्रिया भी चर्चा में रही, लेकिन अब इस मामले में एक नया और चिंताजनक पहलू सामने आ रहा है, कुछ लोग और कुछ सामाजिक समूह इस घटना को इस आधार पर देखने का प्रयास कर रहे हैं कि जिन लोगों की मौत हुई उनमें से एक व्यक्ति कथित रूप से दबंग, रंगदार,विवादित या आपराधिक प्रवृत्ति का था,इसी तर्क के आधार पर आरोपियों के प्रति सहानुभूति पैदा करने का प्रयास भी दिखाई दे रहा है। लेकिन क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप उसकी हत्या को उचित ठहरा सकते हैं? क्या किसी समाज को इस बात पर गौरव महसूस करना चाहिए कि उसके समाज के लोगों ने कानून अपने हाथ में लेकर किसी व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया? सामाजिक,नैतिक और न्यायिक दृष्टिकोण से यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है और इसका उत्तर भी उतना ही स्पष्ट है। यदि कोई अपराधी था तो कानून था,हत्या नहीं-भारतीय संविधान और न्याय व्यवस्था किसी भी व्यक्ति को कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं देती, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत थी,वह लोगों को परेशान करता था,जमीनों पर कब्जा करता था,दबाव बनाता था या उसके खिलाफ अन्य आरोप थे, तो उसके लिए पुलिस, प्रशासन और न्यायालय मौजूद हैं, कानून यह नहीं कहता कि किसी व्यक्ति के कथित अपराधों का फैसला समाज या किसी समाज का एक परिवार स्वयं कर ले और उसे सजा दे दे,यदि ऐसा होने लगे तो फिर न्यायालय,पुलिस और प्रशासन की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी, यही कारण है कि भारत में न्याय का अधिकार केवल न्यायपालिका को दिया गया है,किसी समाज, जाति या समूह को नहीं,आज यदि कोई यह तर्क देता है कि मृतकों में से एक व्यक्ति विवादित था, इसलिए उसके साथ जो हुआ वह उचित था,तो यह तर्क न केवल कानून के खिलाफ है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भी विरुद्ध है।
मौत के बाद आरोप लगाना कितना उचित?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जो आरोप आज मृतकों पर लगाए जा रहे हैं, वे आरोप पहले क्यों नहीं सामने आए? यदि वास्तव में मृतक लोगों को परेशान करता था, जमीनों पर कब्जा करता था या समाज के लिए खतरा था, तो उसके जीवित रहते हुए प्रशासन को शिकायत क्यों नहीं दी गई? यदि शिकायत दी गई थी तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? मृत्यु के बाद किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल खड़े कर उसे अपराधी साबित करने का प्रयास अक्सर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की रणनीति माना जाता है, अदालतें भी किसी हत्या के मामले में यह नहीं देखतीं कि मृतक लोकप्रिय था या अलोकप्रिय, बल्कि यह देखती हैं कि उसकी हत्या कैसे और किन परिस्थितियों में हुई, किसी मृत व्यक्ति पर बाद में लगाए गए आरोप हत्या के अपराध को कम नहीं करते।
समाज का समर्थन किसके लिए होना चाहिए?
समाज का अपने लोगों के लिए खड़ा होना स्वाभाविक और आवश्यक भी है,लेकिन प्रश्न यह है कि समाज किसके लिए और किस आधार पर खड़ा हो रहा है? यदि कोई गरीब, कमजोर, पीडि़त या निर्दोष व्यक्ति अन्याय का शिकार हो रहा हो, तो समाज का उसके समर्थन में खड़ा होना सामाजिक जिम्मेदारी माना जा सकता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति गंभीर अपराध का आरोपी है और केवल इसलिए उसका समर्थन किया जाए क्योंकि वह किसी विशेष जाति या समाज से संबंधित है, तो यह सामाजिक न्याय की अवधारणा के विपरीत माना जाएगा, समाज की जिम्मेदारी अपने लोगों को कानून का पालन करना सिखाने की भी होती है, न कि अपराध के बाद उनके पक्ष में माहौल बनाने की।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जातीय और सामाजिक संगठन अपनी भूमिका निभाते हैं, वे सामाजिक उत्थान, शिक्षा, सहायता और समाज सुधार के लिए काम करते हैं, लेकिन जब कोई संगठन या समूह किसी गंभीर आपराधिक मामले में केवल जातीय आधार पर पक्ष लेने लगता है, तब वह अनजाने में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करता दिखाई देता है, नौगई हत्याकांड में भी यही प्रश्न उठ रहा है कि क्या आरोपियों के प्रति सहानुभूति उनकी सामाजिक पहचान के कारण दिखाई जा रही है? यदि ऐसा है तो यह न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना जाएगा, अपराधी का मूल्यांकन उसके कर्मों से होना चाहिए, उसकी जाति या समाज से नहीं।
यदि यही तर्क हर समाज अपनाने लगे तो क्या होगा?
कल्पना कीजिए कि हर समाज यह मान ले कि यदि किसी व्यक्ति से उसे शिकायत है तो वह स्वयं उसे सजा दे सकता है,ऐसी स्थिति में देश अराजकता की ओर बढ़ जाएगा,हर विवाद का समाधान हिंसा से होने लगेगा और कानून का शासन समाप्त हो जाएगा, यही कारण है कि भारतीय दंड संहिता और न्यायिक व्यवस्था किसी भी प्रकार की भीड़तंत्र या निजी प्रतिशोध की भावना को अपराध मानती है, न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह आरोपी और पीडि़त दोनों को सुनती है और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती है।
दोहरे मापदंडों पर भी सवाल…
इस पूरे घटनाक्रम में एक और सवाल उठ रहा है,जब देश के अन्य हिस्सों में किसी समाज विशेष के व्यक्ति के साथ अन्याय होता है,तब अक्सर वही समाज उतनी मुखरता से सामने नहीं आता जितनी सक्रियता से अपने समाज के आरोपियों के समर्थन में दिखाई देता है,यदि समाज वास्तव में न्यायप्रिय है तो उसे हर पीडि़त के लिए आवाज उठानी चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग से संबंधित हो,न्याय की मांग व्यक्ति की सामाजिक पहचान देखकर नहीं की जानी चाहिए।
न्याय का आधार भावनाएं नहीं,तथ्य होते हैं…
नौगई तिहरे हत्याकांड में अंतिम निर्णय अदालत को करना है,पुलिस जांच,साक्ष्य,गवाह और न्यायिक प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि दोषी कौन है और निर्दोष कौन,लेकिन समाज को यह समझना होगा कि किसी मृतक के खिलाफ बाद में आरोप लगाकर हत्या को उचित ठहराने का प्रयास न तो कानूनी रूप से सही है और न ही नैतिक रूप से, यदि कोई व्यक्ति अपराधी था तो उसे सजा देने का अधिकार केवल कानून को था,यदि किसी ने कानून अपने हाथ में लिया है तो उसका मूल्यांकन भी कानून के अनुसार ही होगा।
नौगई कांड में असली परीक्षा बाकी…
नौगई तिहरे हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं है,बल्कि यह समाज के सामने खड़ा एक नैतिक और न्यायिक प्रश्न भी है, सवाल यह नहीं है कि मृतक कैसा था, सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को मार देने का अधिकार किसी समाज,परिवार या समूह को दिया जा सकता है,लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है…नहीं…समाज को न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, किसी आरोपी के पक्ष में नहीं,क्योंकि जिस दिन समाज अपराध और अपराधी के बीच की रेखा को जाति,रसूख और पहचान के आधार पर तय करने लगेगा,उस दिन न्याय व्यवस्था की बुनियाद कमजोर होने लगेगी,नौगई कांड में भी असली परीक्षा यही है कि समाज न्याय का साथ देता है या फिर जातीय भावनाओं के नाम पर अपराध के प्रति सहानुभूति का माहौल तैयार करता है।


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