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कोरिया/बैकुंठपुर@ 75 साल पुरानी वन भूमि पर कब्जे का खेल!

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स्टे लगाने वाले एसडीएम के रहते 50 लाख से अधिक के सौदे की चर्चा
प्रशासनिक भूमिका पर उठे सवाल…
फॉरेस्ट रेंजर बंगला गायब,स्टाफ क्वार्टर भी लुप्त अब स्टे के बावजूद जमीन सौदे की चर्चा, भट्ठीपारा वन भूमि प्रकरण में कई सवाल…
स्टे था तो सौदा कैसे हुआ? 75 साल पुरानी वन विभाग की जमीन पर कब्जे और रिकॉर्ड बदलाव की जांच की मांग तेज…
वन भूमि से निजी संपत्ति तक का सफर! रेंजर बंगला टूटा,क्वार्टर गायब हुए,अब करोड़ों की जमीन पर उठ रहे बड़े सवाल…
भट्ठीपारा वन भूमि कांड फाइलों में स्टे,जमीन पर सौदा?एसडीएम,राजस्व और पंजीयन विभाग की भूमिका पर उठे गंभीर प्रश्न…
पहले गायब हुआ रेंजर बंगला…अब स्टे के बावजूद सौदे की चर्चा…भट्ठीपारा वन भूमि प्रकरण में प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़े हुए सात बड़े सवाल…
सात सवाल जिनका जवाब प्रशासन को देना होगा

  1. विवादित भूमि पर स्टे कब और किस आदेश से लगाया गया?
  2. स्टे प्रभावी रहते जमीन की बिक्री कैसे हुई?
  3. स्टे हटाया गया था तो उसका आदेश कहां है?
  4. राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किस अधिकारी के निर्देश पर हुआ?
  5. फॉरेस्ट रेंजर बंगला और छह स्टाफ क्वार्टर गायब होने की जिम्मेदारी किसकी है?
  6. वन विभाग की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  7. पूरे प्रकरण में किन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही?
    रवि सिंह-
    कोरिया/बैकुंठपुर,22 जून 2026 (घटती-घटना)।
    कोरिया वनमंडल बैकुंठपुर के भट्ठीपारा स्थित वन विभाग की बहुमूल्य भूमि से जुड़ा विवाद अब जिले के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में शामिल हो गया है,करीब 75 वर्षों से वन विभाग के कब्जे और उपयोग में रही भूमि पर पहले राजस्व रिकॉर्ड में कथित बदलाव कर निजी स्वामित्व दर्ज होने की बात सामने आई, फिर पुराने फॉरेस्ट रेंजर बंगले और छह स्टाफ मर्टरों के अस्तित्व पर सवाल खड़े हुए और अब इस विवादित भूमि के 50 लाख रुपये से अधिक में सौदा होने की चर्चाओं ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है,सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आ रहा है कि इस भूमि विवाद पर स्टे आदेश स्वयं एसडीएम न्यायालय द्वारा लगाया गया था,ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन था और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश प्रभावी था, तब जमीन की खरीदी-बिक्री,निर्माण और कब्जे की गतिविधियां कैसे चलती रहीं?
    2025 में उठे थे सवाल, 2026 में और गहरा गया मामला
    यह विवाद पहली बार चर्चा में तब आया जब स्थानीय मीडिया में प्रकाशित खबरों में दावा किया गया कि भट्ठीपारा स्थित वन विभाग की भूमि पर बने पुराने फॉरेस्ट रेंजर बंगले और छह शासकीय स्टाफ मर्टरों को हटाकर निजी निर्माण खड़ा कर दिया गया है, रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ कर जमीन को थर्ड पार्टी के नाम दर्ज किया गया और इसी आधार पर कब्जा तथा निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी,वन विभाग ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराते हुए प्रशासन को कई पत्र लिखे थे। वनमंडलाधिकारी द्वारा एसडीएम,पुलिस प्रशासन और अन्य अधिकारियों को कार्रवाई के लिए पत्राचार किया गया, लेकिन इसके बावजूद विवाद समाप्त होने के बजाय और अधिक उलझता चला गया।
    राजस्व विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल…
    इस पूरे प्रकरण में राजस्व रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है, यदि वन विभाग के कब्जे वाली भूमि का रिकॉर्ड बदला गया, तो यह कार्य किस प्रक्रिया के तहत हुआ? क्या नामांतरण वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया? क्या रिकॉर्ड संशोधन के दौरान वन विभाग से कोई आपत्ति नहीं ली गई? क्या राजस्व अधिकारियों ने मौके की स्थिति का परीक्षण किया था? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी विभाग के उपयोग वाली भूमि का रिकॉर्ड बदला गया है तो केवल एक अधिकारी नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की भूमिका की जांच आवश्यक है।
    75 वर्षों तक सरकारी भवन रहे, फिर अचानक निजी जमीन कैसे बन गई?
    स्थानीय लोगों और पुराने रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आता है कि विवादित भूमि पर दशकों से वन विभाग के भवन मौजूद थे, यहां फॉरेस्ट रेंजर बंगला था,जहां वन अधिकारियों का निवास और कार्यालयीन गतिविधियां संचालित होती थीं, इसके अलावा वन विभाग के कर्मचारियों के लिए स्टाफ मर्टर भी बने हुए थे,सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भूमि पर वर्षों तक सरकारी भवन खड़े रहे, वह अचानक निजी स्वामित्व में कैसे पहुंच गई? यदि भूमि वास्तव में निजी थी तो वन विभाग ने उस पर दशकों तक भवन क्यों बनाए रखे? और यदि भूमि शासकीय थी तो फिर राजस्व रिकॉर्ड में उसका स्वरूप बदलने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई? यही सवाल अब पूरे मामले की जांच का केंद्र बनते जा रहे हैं।
    स्टे आदेश के बावजूद गतिविधियां कैसे चलती रहीं?
    मामले का सबसे संवेदनशील पहलू स्टे आदेश को लेकर है, जानकारी के अनुसार विवादित भूमि पर एसडीएम न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किया गया था, किसी भी भूमि विवाद में स्टे आदेश का अर्थ होता है कि संबंधित भूमि की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा और यथास्थिति बनाए रखी जाएगी, ऐसे में अब कई गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं क्या स्टे प्रभावी रहते हुए जमीन की रजिस्ट्री हुई? क्या स्टे के दौरान निर्माण कार्य कराया गया? क्या स्टे हटाया गया था? यदि हटाया गया तो उसका आदेश कहां है? आदेश किस अधिकारी ने जारी किया? क्या वन विभाग को इसकी जानकारी दी गई थी? यदि स्टे प्रभावी था और फिर भी भूमि का हस्तांतरण या निर्माण हुआ, तो यह सीधे-सीधे न्यायालयीन आदेशों के पालन से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
    एसडीएम की भूमिका भी सवालों के घेरे में…
    स्थानीय स्तर पर अब सबसे अधिक चर्चा एसडीएम की भूमिका को लेकर हो रही है, लोगों का कहना है कि जब किसी भूमि विवाद में स्वयं एसडीएम न्यायालय ने स्टे लगाया था तो उसके पालन की जिम्मेदारी भी प्रशासन की थी, यदि बाद में उसी भूमि पर कथित रूप से बिक्री, कब्जा और निर्माण हुआ तो यह जानना आवश्यक है कि क्या स्टे आदेश का पालन कराया गया? क्या संबंधित विभागों को आदेश की जानकारी दी गई? क्या किसी स्तर पर आदेश को निष्प्रभावी माना गया? क्या स्टे हटाने का कोई वैधानिक आदेश मौजूद है? इन्हीं कारणों से अब मामले की जांच केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तक पहुंच गई है।
    पंजीयन विभाग पर भी सवाल…
    भूमि के कथित सौदे और रजिस्ट्री को लेकर अब पंजीयन विभाग की भूमिका भी चर्चा में है,यदि भूमि विवादित थी और उस पर स्टे प्रभावी था तो रजिस्ट्री की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई? क्या पंजीयन विभाग ने भूमि की वास्तविक स्थिति की जांच की? क्या विवाद और न्यायालयीन प्रक्रिया की जानकारी संबंधित अधिकारियों को थी? इन सवालों का जवाब सामने आना अभी बाकी है।
    50 लाख रुपये से अधिक के सौदे की चर्चा ने बढ़ाई गंभीरता
    मामले में अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि विवादित भूमि का 50 लाख रुपये से अधिक में सौदा किया गया,यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो जांच का दायरा और बढ़ जाएगा,क्योंकि तब यह केवल भूमि रिकॉर्ड की त्रुटि का मामला नहीं रह जाएगा बल्कि सरकारी संपत्ति के संभावित हस्तांतरण और उससे जुड़े आर्थिक पहलुओं की भी जांच करनी पड़ेगी।
    वन विभाग करता रहा शिकायत,कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
    दस्तावेज बताते हैं कि वन विभाग ने कई बार प्रशासन को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी,वनमंडलाधिकारी द्वारा एसडीएम,पुलिस और अन्य अधिकारियों को शिकायतें भेजी गईं। इसके बावजूद मौके पर निर्माण गतिविधियों और कब्जे की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं, यही कारण है कि अब पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं,स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी सामान्य व्यक्ति पर सरकारी भूमि कब्जाने का आरोप होता तो तत्काल कार्रवाई होती, लेकिन इस मामले में वर्षों से केवल पत्राचार और जांच की बातें ही सामने आती रही हैं।
    निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है…
    भट्ठीपारा वन भूमि प्रकरण अब केवल जमीन का विवाद नहीं रह गया है,यह सरकारी संपत्ति की सुरक्षा,राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता, न्यायालयीन आदेशों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है,विशेष रूप से यह तथ्य कि विवादित भूमि पर स्टे आदेश स्वयं एसडीएम न्यायालय द्वारा लगाया गया था,पूरे मामले को और संवेदनशील बना देता है। अब जनता की निगाहें जिला प्रशासन और शासन पर टिकी हैं कि क्या पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, स्वतंत्र और व्यापक जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाएगी या फिर 75 वर्षों पुरानी सरकारी भूमि का यह रहस्य भी फाइलों और जांचों के बीच दबकर रह जाएगा।

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