

- दो दशक से जमे स्टेनो कलेक्टर पर उठे सवालों की लंबी फेहरिस्त
- स्टेनो टाइपिस्ट से कुछ महीनों में स्टेनोग्राफर,फिर प्रतिनियुक्ति की ऐसी कहानी कि बदलते रहे कलेक्टर…पर नहीं बदला प्रभार
- छः महीने में पदोन्नति, वर्षों की प्रतिनियुक्ति और प्रभाव का नेटवर्क चर्चा में
- कलेक्टर बदले, सरकारें बदलीं,लेकिन नहीं बदला स्टेनो सिस्टम!
- प्रतिनियुक्ति या प्रशासनिक कब्जा? कोरिया कलेक्ट्रेट में एक कर्मचारी के प्रभाव की चर्चा तेज
- स्टेनो टाइपिस्ट से स्टेनोग्राफर तक का सफर बना सवाल, दस्तावेजों में नाम का अंतर भी चर्चा में…
- एसीबी में शिकायतें, निजी स्कूल को अनुदान और वर्षों का प्रभाव, सवालों के घेरे में कलेक्ट्रेट का चर्चित चेहरा
- कलेक्ट्रेट में फाइलों से ज्यादा प्रभाव की चर्चा, नई व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती
- दो दशक की प्रतिनियुक्ति का राज क्या है? कोरिया कलेक्ट्रेट में उठ रहे कई सवाल
- सिस्टम पर पकड़ या अनुभव का असर? प्रभावशाली स्टेनो को लेकर प्रशासनिक गलियारों में हलचल
- नई कलेक्टर के सामने चुनौती — क्या टूटेगा वर्षों पुराना प्रभाव का नेटवर्क?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया15 मई 2026(घटती-घटना)। सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि कुर्सियां बदलती रहती हैं,सिस्टम वही रहता है, लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में यह कहावत अब कुछ ज्यादा ही सटीक मानी जा रही है,यहां वर्षों से पदस्थ एक प्रभावशाली स्टेनो कलेक्टर को लेकर जो चर्चाएं प्रशासनिक गलियारों में लंबे समय से दबे स्वर में होती थीं, वे अब खुलकर सामने आने लगी हैं।
मामला सिर्फ एक कर्मचारी के लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने का नहीं है, बल्कि सवाल नियुक्ति,पदोन्नति,प्रतिनियुक्ति, प्रशासनिक प्रभाव,निजी स्कूल,सांसद निधि और एसीबी तक पहुंची शिकायतों के बावजूद कार्रवाई न होने तक जा पहुंचा है,सबसे दिलचस्प बात यह है कि जहां सामान्य कर्मचारी वर्षों तक एक पदोन्नति के लिए फाइलों के चक्कर काटते रह जाते हैं,वहीं यहां महज चार से छह महीने के भीतर स्टेनो टाइपिस्ट से स्टेनोग्राफर बनने की कहानी चर्चा का विषय बनी हुई है,और अब जब नई प्रशासनिक व्यवस्था जिले में आकार ले रही है, तब सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ एक कर्मचारी की कार्यकुशलता का मामला है, या फिर वर्षों में बना ऐसा प्रभावशाली तंत्र,जिसने पूरे सिस्टम को अपनी सुविधा के अनुसार ढाल लिया?
6 महीने में स्टेनो टाइपिस्ट से स्टेनोग्राफर! ये प्रशासनिक प्रतिभा या रिकॉर्ड का करिश्मा? दस्तावेजों ने खड़े किए सवाल
कोरिया कलेक्ट्रेट में वर्षों से प्रभावशाली भूमिका निभा रहे चर्चित स्टेनो को लेकर अब जो दस्तावेज सामने आ रहे हैं, उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार घनश्याम मिश्रा की नियुक्ति स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर 7 अप्रैल 1986 को हुई थी,लेकिन हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि महज कुछ ही महीनों बाद 27 अप्रैल 1986 को उन्हें स्टेनोग्राफर बना दिया गया,अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतनी जल्दी पदोन्नति कैसे संभव हुई? सरकारी सेवा नियमों में जहां वर्षों तक कर्मचारी पदोन्नति की प्रतीक्षा करते रहते हैं,वहां कुछ महीनों में पद परिवर्तन होना अपने आप में जांच का विषय माना जा रहा है,जानकारों का कहना है कि यदि दस्तावेज सही हैं,तो पूरी प्रक्रिया की विभागीय जांच जरूरी हो सकती है,सरकारी कर्मचारियों के बीच यह चर्चा अब व्यंग्य का विषय बन चुकी है,कई कर्मचारी मजाक में कहते नजर आते हैं कि यदि प्रतिभा इतनी तेज हो तो प्रतियोगी परीक्षाओं की जरूरत ही क्या है, सबसे अधिक सवाल नाम को लेकर भी उठ रहे हैं,नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों में जहां पूरा नाम घनश्याम मिश्रा बताया जा रहा है,वहीं पदोन्नति संबंधी रिकॉर्ड में जेपी मिश्रा का उल्लेख होने की चर्चा है,अब लोग पूछ रहे हैं कि यह सिर्फ रिकॉर्ड की तकनीकी शैली है या फिर सरकारी फाइलों की वह पुरानी बीमारी, जिसमें नाम,पद और नियम परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं?
पत्नी के नाम स्कूल और सांसद निधि का सवाल…
मामला केवल प्रशासनिक प्रभाव तक सीमित नहीं है,अब चर्चा परिवार द्वारा संचालित निजी स्कूल तक पहुंच चुकी है,स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि संबंधित कर्मचारी के परिवार से जुड़े निजी स्कूल को सांसद निधि से अनुदान प्राप्त हुआ,यहीं से बहस और तेज हो गई है,जानकारों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में निजी संस्थाओं को सीधे इस प्रकार की सहायता दिए जाने को लेकर नियम बेहद स्पष्ट होते हैं,ऐसे में यदि किसी निजी स्कूल को लाभ मिला है तो उसकी पात्रता,प्रक्रिया और स्वीकृति की जांच जरूरी हो जाती है,लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सामान्य निजी स्कूलों को भी ऐसी सुविधाएं मिलती हैं, या फिर प्रभाव और पहुंच का फर्क यहां भी दिखाई देता है?
सबसे बड़ा सवाल—आखिर सिस्टम चल कौन रहा है?
पूरे मामले के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था नियमों से चल रही है या फिर कुछ प्रभावशाली लोगों की पकड़ से? क्या दो दशक से अधिक समय से चली आ रही प्रतिनियुक्ति की समीक्षा होगी? क्या पदोन्नति संबंधी दस्तावेजों की जांच होगी? क्या वेतन आहरण और विभागीय स्वीकृतियों का परीक्षण किया जाएगा? क्या निजी स्कूल और अनुदान से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच होगी? और सबसे बड़ा सवाल ये भी है की क्या नई प्रशासनिक टीम इन मुद्दों पर कार्रवाई करने का साहस दिखाएगी? फिलहाल कोरिया कलेक्ट्रेट में चर्चा सिर्फ फाइलों की नहीं, बल्कि उस स्थायी सिस्टम की है,जिसने वर्षों में खुद को इतना मजबूत बना लिया कि अब लोग मजाक में कहने लगे हैं कलेक्टर बदलते रहते हैं लेकिन असली व्यवस्था वहीं रहती है।
मध्यप्रदेश शासन काल की नियुक्ति,लेकिन विभाग कौन-सा?
दस्तावेज यह भी बताते हैं कि उनकी नियुक्ति मध्यप्रदेश शासन काल में हुई थी,लेकिन यहां सबसे गंभीर सवाल विभागीय मूल पदस्थापना को लेकर उठ रहा है,जानकारी के अनुसार संबंधित कर्मचारी मूलतः मत्स्य निगम विभाग के कर्मचारी हैं,न कि राजस्व विभाग के,फिर सवाल यह उठ रहा है कि आखिर मत्स्य विभाग का कर्मचारी वर्षों से राजस्व विभाग और कलेक्ट्रेट में किस आधार पर पदस्थ है? क्या यह केवल प्रतिनियुक्ति है? यदि प्रतिनियुक्ति है तो उसकी समयसीमा क्या थी? और यदि समयसीमा समाप्त हो चुकी थी तो फिर निरंतर विस्तार किस आधार पर होता रहा? प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि यह मामला सामान्य प्रतिनियुक्ति से कहीं ज्यादा गहरा दिखाई देता है।
प्रतिनियुक्ति या स्थायी सरकारी पट्टा?
सरकारी व्यवस्था में प्रतिनियुक्ति सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, किसी विभाग का कर्मचारी कुछ समय के लिए दूसरे विभाग में सेवाएं देता है और फिर मूल विभाग में लौट जाता है,लेकिन कोरिया जिले में यह प्रक्रिया अब स्थायी प्रतिनियुक्ति मॉडल के रूप में चर्चा में है,बताया जाता है कि संबंधित कर्मचारी मूलतः मत्स्य विभाग से जुड़े हैं, लेकिन पिछले दो दशक से अधिक समय से राजस्व विभाग और कलेक्ट्रेट में ही पदस्थ हैं,यानी सरकारें बदलीं,अधिकारी बदलेज्कलेक्टर बदलेज्जिले की सीमाएं तक बदल गईं,लेकिन यदि कुछ स्थायी रहा तो वह था यह प्रभावशाली प्रतिनियुक्ति,कर्मचारी अब तंज कसते हैं कि जिले में कुछ चीजें अस्थायी हो सकती हैं,सड़कें,योजनाएं,तबादले लेकिन कुछ व्यवस्थाएं अमर होती हैं।
हर नए कलेक्टर के साथ नई शुरुआत…या पुराना नियंत्रण?
कलेक्ट्रेट के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि जिले में चाहे कितने भी नए कलेक्टर आए हों,लेकिन कार्यालय का वास्तविक संचालन तंत्र हमेशा कुछ पुराने चेहरों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा,इन्हीं चर्चाओं के केंद्र में यह प्रभावशाली स्टेनो भी बताए जाते हैं, कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों में उन्होंने ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया,जिसमें फाइलों की गति से लेकर अधिकारियों तक पहुंचने वाली जानकारी तक पर अप्रत्यक्ष प्रभाव बना लिया गया,हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कर्मचारियों के बीच यह धारणा गहरी है कि कलेक्ट्रेट में कौन कब मिलेगा, कौन-सी फाइल पहले जाएगी और किसकी शिकायत किन कोनों में धूल खाएगी यह सब बिना अनुभव वाले व्यक्ति के बस की बात नहीं,यही कारण है कि अब कई लोग उन्हें कर्मचारी कम और संस्था ज्यादा मानने लगे हैं।
कलेक्टर तक कौन पहुंचेगा…इसकी भी चर्चा!
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी कम रोचक नहीं है कि कई बार अधिकारी और कर्मचारी खुद इस बात को लेकर असमंजस में रहते थे कि कलेक्टर से सीधे मिलें या पहले व्यवस्था से गुजरें,कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि वास्तविक शिकायतें कई बार ऊपर तक पूरी गंभीरता से पहुंच ही नहीं पाती थीं,वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि अनुभवी कर्मचारी होने के कारण प्रशासनिक समन्वय में उनकी भूमिका स्वाभाविक थी,लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है, क्या किसी कर्मचारी की भूमिका इतनी प्रभावशाली हो सकती है कि वह वर्षों तक प्रशासनिक संतुलन का अनौपचारिक केंद्र बन जाए?
एसीबी तक पहुंचीं शिकायतें…लेकिन कार्रवाई अब तक गायब!
मामले का सबसे दिलचस्प और गंभीर पक्ष यह बताया जा रहा है कि संबंधित कर्मचारी के खिलाफ वर्षों में एसीबी तक सैकड़ों शिकायतें पहुंचीं, लेकिन अब तक किसी बड़ी विभागीय या कानूनी कार्रवाई की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई, यहीं से सवाल और गहरे हो जाते हैं,क्या शिकायतें केवल कागजों तक सीमित रहीं? क्या जांच शुरू हुई लेकिन पूरी नहीं हुई? या फिर सिस्टम ने हमेशा की तरह देखेंगे मोड में फाइलों को सुरक्षित रख दिया? कर्मचारियों के बीच अब यह व्यंग्य आम हो गया है कि सरकारी फाइलें दो जगह सबसे सुरक्षित रहती हैं रिकॉर्ड रूम में और जांच के नाम पर लंबित मामलों में।
स्कूल शिक्षा विभाग की चुप्पी भी सवालों में…
स्थानीय लोगों का कहना है कि छोटे निजी स्कूलों पर विभागीय कार्रवाई बहुत तेजी से होती है,कभी मान्यता, कभी भवन,कभी रिकॉर्डज् किसी न किसी आधार पर नोटिस जारी हो जाते हैं,लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों से जुड़ा हो,तब कार्रवाई की रफ्तार अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है? यही कारण है कि अब शिक्षा विभाग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं,लोगों का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं, जिन पर अब तक पर्दा पड़ा हुआ है।
प्रशासनिक अनुभव या प्रभाव का साम्राज्य?
कुछ लोग संबंधित स्टेनो का बचाव भी करते नजर आते हैं, उनका कहना है कि वर्षों तक अलग-अलग अधिकारियों के साथ काम करने से स्वाभाविक रूप से अनुभव बढ़ता है और संपर्क भी बनते हैं,लेकिन विरोध करने वालों का तर्क अलग है,उनका कहना है कि किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही व्यक्ति का अत्यधिक प्रभाव स्वस्थ संकेत नहीं माना जाता,जब एक कर्मचारी व्यवस्था से बड़ा दिखाई देने लगे,तब सवाल केवल व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर उठने लगते हैं।
नई कलेक्टर के सामने सबसे बड़ी परीक्षा…
अब जिले में नई प्रशासनिक व्यवस्था बनने के बाद सबसे अधिक नजर इसी बात पर है कि क्या वर्षों से चली आ रही इस स्थायी व्यवस्था में कोई बदलाव दिखाई देगा? कई कर्मचारी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अब प्रशासनिक पारदर्शिता और संतुलन को प्राथमिकता मिलेगी, वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वर्षों से मजबूत हो चुके नेटवर्क को तोड़ना आसान नहीं होगा, क्योंकि सरकारी सिस्टम में फाइलें बदलना आसान होता है,लेकिन वर्षों से जमे प्रभाव को हटाना बेहद कठिन।
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