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रायपुर/बिलासपुर@23 साल बाद भी जिंदा है पीएससी-2003 घोटाले की आग ये ‘महाविद्रोह’ सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में होगा निर्णायक!

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  • न पद चाहिए…न पैसा…केवल न्याय चाहिए…वर्षा डोंगरे की दो दशक पुरानी लड़ाई फिर सुर्खियों में…
  • पीएससी-2003 : टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार का मामला,अब अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में!
  • सिस्टम बिक सकता है,संघर्ष नहीं-पीएससी घोटाले के खिलाफ वर्षा डोंगरे फिर मुखर
  • 23 साल पुराना घोटाला,लेकिन जख्म आज भी ताजा…न्याय की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर
  • लोक अदालत में समझौते की चर्चा से भड़की बहस,पीएससी-2003 मामला फिर बना सुर्खियां
  • IAS-IPS अवॉर्ड हुए लोग खुश होंगे,लेकिन लड़ाई
  • अभी खत्म नहीं : पीएससी याचिकाकर्ताओं का बड़ा बयान
  • भ्रष्टाचार बनाम संविधान के बिच पीएससी-2003
  • के खिलाफ दो दशक से जारी कानूनी जंग
  • ‘ऑफर ठुकराया,समझौता नहीं किया’
  • वर्षा डोंगरे ने फिर दोहराया संघर्ष का संकल्प
  • छत्तीसगढ़ पीएससी-2003 : हाईकोर्ट ने कहा था
  • ‘टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार’,अब सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद
  • 23 साल पुराना घोटाला,‘टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार’ की लड़ाई
  • और सिस्टम से टकराने वाली एक जिद का नाम — वर्षा डोंगरे
  • ‘न पद चाहिए,न पैसा… सिर्फ न्याय चाहिए’,सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची
  • लड़ाई ने फिर गरमाई छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था

-न्यूज डेस्क-
रायपुर/बिलासपुर,15 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग परीक्षा-2003… यह सिर्फ एक भर्ती परीक्षा का नाम नहीं रह गया है,यह अब छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास का ऐसा अध्याय बन चुका है,जिसे हर नई पीढ़ी अलग-अलग तरीके से सुनती है,कोई इसे ‘भर्ती घोटाला’कहता है,कोई‘सिस्टम की सड़ांध ’,तो कोई इसे उन युवाओं की अधूरी कहानी मानता है,जिनके सपनों को कथित भ्रष्टाचार ने निगल लिया,करीब 23 साल गुजर चुके हैं। कई चयनित अधिकारी अब बड़े पदों तक पहुंच चुके हैं,कुछ को प्रमोशन मिला,कुछ को आईएएस-आईपीएस अवॉर्ड मिला, कई सेवानिवृत्ति के करीब हैं,लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी हैं,जिन्होंने इस लड़ाई को अभी खत्म नहीं माना,इन्हीं नामों में सबसे चर्चित नाम है वर्षा डोंगरे,वर्षा डोंगरे अब केवल एक याचिकाकर्ता नहीं रहीं,वे इस लंबे संघर्ष का चेहरा बन चुकी हैं,सिस्टम से लड़ने वाली वह महिला,जिसने कथित तौर पर समझौते के प्रस्ताव ठुकराए,अदालतों में खुद पैरवी की और अब भी कह रही हैं अंतिम फैसला केवल सुप्रीम कोर्ट में होगा।
23 साल बाद भी
क्यों जिंदा है यह मामला?

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या था इस भर्ती प्रक्रिया में कि दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ? क्यों आज भी लोग‘पीएससी-2003’ का नाम सुनते ही व्यवस्था पर सवाल उठाने लगते हैं? दरअसल यह मामला केवल चयन या अचयन का नहीं था, आरोप यह था कि पूरी भर्ती प्रक्रिया में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुईं, योग्य उम्मीदवार बाहर हो गए और कथित रूप से अपात्र लोगों को चयनित कर लिया गया, यानी युवाओं के सपनों का चयन मेरिट से नहीं,बल्कि ‘मैनेजमेंट’ से हुआ ऐसा आरोप वर्षों से लगता रहा,और यही कारण है कि यह मामला धीरे-धीरे अदालत से निकलकर जनता की अदालत तक पहुंच गया।
‘टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार’—एक टिप्पणी जिसने सिस्टम हिला दिया
वर्ष 2016 में जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया,तब एक शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में आया—‘टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार।’यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर सवाल था,जिस पर राज्य की प्रशासनिक रीढ़ खड़ी होती है,लोक सेवा आयोग…यानी वह संस्था,जहां से भविष्य के अफसर निकलते हैं,जहां से प्रशासनिक ईमानदारी और शासन व्यवस्था की नींव तैयार होती है,लेकिन जब उसी संस्था पर अदालत इतनी तल्ख टिप्पणी करे,तो सवाल केवल परीक्षा पर नहीं,पूरे सिस्टम पर खड़े हो जाते हैं, यही वजह थी कि हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद पूरे राज्य में हलचल मच गई थी।
जब वकील छूटे,तब
याचिकाकर्ता खुद बन गए पैरवीकार

इस मामले की सबसे दिलचस्प और भावनात्मक कहानी यह है कि वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते याचिकाकर्ताओं की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ गई,बताया जाता है कि शुरू में वकील केस लड़ रहे थे,लेकिन बाद में आर्थिक परेशानियों और लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण कई बार ऐसा दौर आया जब याचिकाकर्ताओं को खुद अदालत में खड़ा होना पड़ा, कल्पना कीजिए…सामने बड़े-बड़े वरिष्ठ वकील, सरकारी पक्ष,कानूनी दांव-पेंच और दूसरी तरफ वे लोग,जिन्होंने कानून की पढ़ाई तक नहीं की,लेकिन फिर भी लड़ाई जारी रही, यह वही दौर था जब सिस्टम ने शायद सोचा होगा कि‘समय के साथ लोग थक जाएंगे।’ कुछ थके भी, कुछ समझौते के लिए तैयार भी हुए, लेकिन कुछ लोग डटे रहे।
वर्षा डोंगरे ये वो नाम है जो सिस्टम से न डरने वाली ‘उलगुलान’ की आवाज
वर्षा डोंगरे का नाम अब इस पूरे संघर्ष की पहचान बन चुका है,वह आज भले डिप्टी जेलर हों,लेकिन उनके समर्थकों के लिए वह ‘सिस्टम से लड़ने वाली महिला’ हैं,उनका दावा है कि कोर्ट के बाहर भी कई बार‘सेटलमेंट’ के प्रयास हुए,समझाने,दबाव बनाने, मनाने और यहां तक कि‘ऑफर’ देने की बातें भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने हर बार इनकार किया,अब यह दावा कितना सही है और कितना नहीं,यह अलग जांच का विषय हो सकता है,लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह बात बार-बार कही है कि उन्हें पद नहीं,न्याय चाहिए, और यही लाइन अब उनके समर्थकों के बीच नारा बन चुकी है।
सिस्टम की सबसे बड़ी
ताकत-समय

सरकारी मामलों में अक्सर कहा जाता है कि सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत‘समय’ होता है, समय बीतता जाता है…लोग बूढ़े हो जाते हैं… जिम्मेदार लोग रिटायर हो जाते हैं…फाइलें धूल खा जाती हैं…और धीरे-धीरे मामला इतिहास बन जाता है,शायद यही उम्मीद इस मामले में भी रही होगी,लेकिन पीएससी-2003 का मामला खत्म नहीं हुआ,बल्कि हर कुछ वर्षों में फिर जिंदा हो जाता है,क्योंकि यह केवल कोर्ट का केस नहीं है,यह उन हजारों युवाओं की भावना से जुड़ा मामला है,जो मानते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ।
भाजपा सरकार में भर्ती,कांग्रेस सरकार में प्रमोशन-राजनीति भी घेरे में…
वर्षा डोंगरे ने अपने बयान में एक और गंभीर राजनीतिक आरोप लगाया था उन्होंने कहा कि भाजपा शासनकाल में कथित भ्रष्टाचार हुआ और बाद में कांग्रेस सरकार के दौरान उन्हीं चयनित अधिकारियों को प्रमोशन देकर आईएएस-आईपीएस अवॉर्ड दिया गया,यानी उनके अनुसार सत्ता बदली,लेकिन सिस्टम नहीं बदला, हालांकि यह उनके व्यक्तिगत आरोप हैं और संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक दल वास्तव में अलग-अलग होते हैं, या फिर सत्ता बदलने के बाद भी व्यवस्था वही रहती है?
लोक अदालत में सुलह?
सबसे बड़ा विवाद यही

अब इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया, जब लोक अदालत में सुलह की संभावना की चर्चा सामने आई,यहीं से विवाद और गहरा गया, लोग पूछ रहे हैं क्या‘टॉप टू बॉटम भ्रष्टाचार’जैसे मामले में समझौता संभव है? क्या न्याय की लड़ाई का अंत पैसों या पदों से हो सकता है? वर्षा डोंगरे ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है,उन्होंने साफ कहा कि यह मामला लोक अदालत में सुलह योग्य नहीं है,उनके अनुसार यह लड़ाई व्यक्तिगत लाभ की नहीं,बल्कि व्यवस्था में सुधार की है।
सुप्रीम कोर्ट पर टिकी नजरें…
अब पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, करीब 10 वर्षों से मामला वहां विचाराधीन है और अब सभी की नजरें अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं, यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बड़ा फैसला देता है,तो इसका असर केवल एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा,यह भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं,लोक सेवा आयोगों की विश्वसनीयता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी प्रभाव डाल सकता है।
सबसे बड़ा सवाल…क्या न्याय
देर से मिलेगा या कभी नहीं?

23 साल…यह कोई छोटा समय नहीं होता, एक पूरी पीढ़ी इस दौरान जवान से अधेड़ हो जाती है, लेकिन पीएससी-2003 का मामला अब भी अदालत में है,यही वजह है कि लोग अब पूछने लगे हैं क्या न्याय इतनी देर से मिलेगा कि उसका अर्थ ही खत्म हो जाए? या फिर यह मामला भी उन लंबी कानूनी लड़ाइयों में शामिल हो जाएगा,जिनका फैसला इतिहास में तो दर्ज होता है,लेकिन पीडि़तों के जीवन में नहीं?
एएसपी बन जाइए,मामला खत्म कीजिए,और फिर भी नहीं मानीं?
मामले का सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि हाईकोर्ट के फैसले में उल्लेखित कथित प्रस्ताव के अनुसार राज्य सरकार और लोक सेवा आयोग की ओर से उन्हें ‘ASP with Notional Promotion’ और 11 साल का वेतन देने का ऑफर दिया गया था, यदि यह दावा सही है, तो सवाल और गंभीर हो जाते हैं,क्या सिस्टम इतनी बड़ी कीमत देकर मामला शांत करना चाहता था? क्या यह समझौता था या‘डैमेज कंट्रोल ‘? लेकिन वर्षा डोंगरे का दावा है कि उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, यहीं से यह लड़ाई केवल नौकरी की नहीं, बल्कि ‘स्वाभिमान’ की लड़ाई बन गई।
‘महाविद्रोह जारी रहेगा’-सिर्फ नारा नहीं,व्यवस्था पर सवाल है…
पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा जिस लाइन की हो रही है,वह है उलगुलान (महाविद्रोह) जारी रहेगा…यह सिर्फ एक भावनात्मक वाक्य नहीं है,यह उस गुस्से,निराशा और संघर्ष का प्रतीक बन चुका है,जो वर्षों से सिस्टम के खिलाफ जमा होता रहा,और अब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह गया कि पीएससी-2003 में क्या हुआ था,सवाल यह भी है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था इतने लंबे संघर्ष के बाद भी सच को अंतिम मंजिल तक पहुंचा पाएगी? फिलहाल लड़ाई जारी है…फैसला बाकी है…और सुप्रीम कोर्ट की ओर टकटकी लगाए बैठे लोग अब भी यही कह रहे हैं—‘न पद चाहिए…न पैसा… सिर्फ न्याय चाहिए। ‘


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