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कोरिया@ कोरिया के सलबा गांव में ‘जल-युद्ध

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प्यास बुझाने के लिए जान जोखिम में डाल रहे ग्रामीण
राजन पाण्डेय
कोरिया ,27 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
कहते हैं ‘जल ही जीवन है’, लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरिया जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत सलबा के लिए जल अब ‘काल’ बनता जा रहा है। आजादी के सात दशकों बाद भी यहाँ की तस्वीरें विकास के दावों के गाल पर एक कड़ा तमाचा हैं। भीषण गर्मी की दस्तक के साथ ही इस गाँव में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है, और प्रशासन की चुप्पी ग्रामीणों की मुश्किलों को और बढ़ा रही है।
नरक जैसी स्थिति : गंदे पानी से बुझ रही प्यास-सलबा के ग्रामीण आज उस दौर में जीने को विवश हैं, जिसकी कल्पना भी आधुनिक समाज में डरावनी लगती है। गाँव के लोग अपनी और अपने मवेशियों की प्यास बुझाने के लिए एक पुरानी ‘ढोढ़ी’ (झरिया या छोटा गड्ढा) पर निर्भर हैं। इस ढोढ़ी का पानी न केवल मटमैला और दूषित है, बल्कि इसमें नग्न आंखों से कीड़े और छोटे जीव तैरते देखे जा सकते हैं। डॉक्टर जिस पानी को छूने तक से मना करते हैं, उसी पानी को छानकर पीना यहाँ के बच्चों और बुजुर्गों की मजबूरी बन गई है। यह स्थिति किसी भी वक्त गाँव में बड़ी महामारी को निमंत्रण दे सकती है।
नल-जल योजना : शोपीस बने नल,सूखी पड़ी पाइपलाइन- प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ योजना का हश्र यहाँ के गलियों में देखा जा सकता है, गाँव के हर घर के सामने शान से नल तो लगा दिए गए हैं, लेकिन वे सिर्फ ‘शोपीस’ बनकर रह गए हैं, धरातल पर न तो पानी की टंकी का निर्माण हुआ है और न ही पाइपलाइन में पानी की एक बूंद पहुंची है,सरकार के रिकॉर्ड में शायद यह गाँव ‘नल-युक्त’ हो चुका हो, लेकिन हकीकत में यहाँ की महिलाएं आज भी मीलों का सफर तय कर दूषित पानी ढोने को मजबूर हैं, गाँव के हैंडपंप भी सफेद हाथी साबित हो रहे हैं; आधे सूखे पड़े हैं और बाकियों से उगल रहा गंदा पानी पीने लायक नहीं है।
प्रशासनिक लाचारीः ‘ड्राय’ बोर और गिरता जलस्तर- जब इस समस्या को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से सवाल किया जाता है, तो जवाब में सिर्फ ‘तकनीकी मजबूरियां’ गिनाई जाती हैं, ग्राम सरपंच आशु कुजूर का कहना है कि उन्होंने प्रयास तो किए, लेकिन जलस्तर का लगातार नीचे जाना सबसे बड़ी बाधा है, हाल ही में पीएचई विभाग द्वारा कराए गए बोर खनन में सफलता नहीं मिली क्योंकि जमीन के नीचे पानी नहीं मिला, विभाग का तर्क है कि जब तक कोई मजबूत जल स्रोत नहीं मिलता, तब तक नल-जल योजना का ढांचा खड़ा करने का कोई फायदा नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि इस ‘तकनीकी खोज’ के बीच ग्रामीण कब तक प्यासे रहेंगे?
एक मानवीय त्रासदी की आहट– ग्रामीण लालसाय और अनिल बेग ने बताया कि जैसे-जैसे पारा चढ़ेगा, यह ढोढ़ी भी सूख जाएगी, इसके बाद गाँव के पास पलायन करने या बूंद-बूंद को तरसकर दम तोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा, ग्रामीणों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होने के बावजूद अधिकारी यहाँ का दौरा करने और कोई वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे टैंकर या गहरा खनन) करने की जहमत नहीं उठा रहे हैं।
प्रशासन से सीधे सवाल
क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी या बच्चे की जान जाने का इंतजार है?
मुख्यालय से 8 किमी दूर की यह दुर्दशा है, तो दूरस्थ वनांचलों का क्या हाल होगा?
’जल जीवन मिशन’ के अधूरे काम के लिए ठेकेदारों और जिम्मेदार इंजीनियरों पर कार्रवाई कब होगी?

खौफ का सायाः पानी के स्रोत पर मधुमक्खियों का पहरा-
पानी के लिए संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता। कुदरत और सिस्टम की मार के बीच अब ‘मधुमक्खियों’ का कहर टूट पड़ा है, पानी के इसी एकमात्र स्रोत के ठीक ऊपर और आसपास मधुमक्खियों ने बड़े-बड़े छत्ते बना लिए हैं, ग्रामीण जब पानी भरने या नहाने जाते हैं, तो मधुमक्खियां उन पर प्राणघातक हमला कर देती हैं, स्थानीय महिला फूलमती बेग की आंखों में दहशत साफ दिखती है, वे कहती हैं— ‘अभी कुछ दिन पहले ही एक छोटे बच्चे पर मधुमक्खियों ने बुरी तरह हमला कर दिया था। तब से बच्चे वहां जाने के नाम से ही कांपने लगते हैं, हमें प्यास बुझाने जाना है या अपनी जान बचानी है, समझ नहीं आता। ‘
इनका कहना है…
गंदा हो या अच्छा यही पानी सहारा है. कुछ दिन पहले एक छोटा बच्चे पर भी मधुमक्खियों ने हमला किया। इसके बाद से बच्चे यहां जाने से डरने लगे हैं।
स्थानीय महिला फूलमती बेग
हमने पीएचई विभाग के माध्यम से बोर खनन भी कराया लेकिन वहां ड्राई बोर निकल गया। जलस्तर कम होने की वजह से अब आगे खनन कर पाना भी मुश्किल हो रहा है।
आशु कुजूर,सरपंच


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