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सोनहत (कोरिया)@ तहसील की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें,80 साल पुराने दस्तावेज़ भी नहीं दिला पा रहे गांव की बेटी को उसकी पहचान

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  • आजादी के पहले के रिकॉर्ड भी पड़े फीके, कागजों की लड़ाई में उलझ गया बेटी का भविष्य
  • साहब! 1946 का रिकॉर्ड और कितनी बार दूं?
  • सोनहत में सिस्टम की संवेदनहीनता के आगे बेबस हुई छात्रा
  • कैसा सुशासन ? जब अपनी ही पहचान को तरस रही गांव की बेटी

-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया),10 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
सरकार एक तरफ डिजिटल इंडिया और सरलीकरण का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर कोरिया जिले की सोनहत तहसील में जाति प्रमाण-पत्र बनवाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है, आलम यह है कि सात दशकों से अधिक पुराने पुख्ता दस्तावेज (मिसल बंदोबस्त 1946-47) पेश करने के बावजूद प्रशासनिक दफ्तरों से आवेदनों को बिना किसी ठोस कारण के निरस्त किया जा रहा है, अधिकारियों की इस कार्यप्रणाली से न केवल युवाओं का भविष्य अधर में लटका है, बल्कि शासन की कल्याणकारी योजनाओं पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं।
जब 1985 की जगह 1946 के रिकॉर्ड भी नाकाफी हों- गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ शासन के नियमानुसार, अन्य पिछड़ा वर्ग के स्थाई जाति प्रमाण पत्र हेतु आवेदक के पास प्रदेश में सन 1985 या उससे पूर्व का निवास एवं भूमि संबंधी रिकॉर्ड होना अनिवार्य है। शासन ने यह सीमा इसलिए तय की है ताकि पात्र लोगों को आसानी से प्रमाण-पत्र मिल सके। परंतु सोनहत तहसील में नियम और तर्क दोनों ही दम तोड़ते नजर आ रहे हैं, यहाँ प्रीति राजवाड़े जैसे आवेदकों के पास आजादी के भी पूर्व यानी सन 1946-47 के पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं, जो शासन की निर्धारित समय सीमा (1985) से भी लगभग 40 साल पुराने हैं। इसके बावजूद आवेदनों का बार-बार निरस्त होना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह पैदा करता है। जब 80 साल पुराने रिकॉर्ड को भी आधार नहीं माना जा रहा,तो आम जनता से न्याय की उम्मीद करना बेमानी साबित हो रहा है।
भविष्य का संकट
जाति प्रमाण-पत्र के अभाव में छात्र न तो उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश ले पा रहे हैं और न ही सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन कर पा रहे हैं,सोनहत तहसील में व्याप्त इस अव्यवस्था ने गुड गवर्नेंस के दावों की पोल खोल दी है। यदि समय रहते जिला प्रशासन ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया, तो आक्रोशित ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे सकता है। प्रीति राजवाड़े जैसे सैकड़ों आवेदकों को अब केवल कलेक्टर और जिला प्रशासन से न्याय की उम्मीद है।
कैसा सुशासन? जब अपनी ही पहचान को तरस रही गांव की बेटी
आज जब सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुशासन का ढिंढोरा पीट रही है, तब सोनहत तहसील की यह जमीनी हकीकत दावों पर कालिख पोतने के लिए काफी है,सवाल यह उठता है कि आखिर यह कैसा सुशासन है, जहां एक पात्र हितग्राही को अपनी ही जाति और पहचान साबित करने के लिए वर्षों तक दफ्तरों की धूल फांकनी पड़ रही है? जब गांव की बेटी जाति प्रमाण-पत्र के अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित रह जाए या शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए पात्र होते हुए भी दर-दर भटके,तो प्रशासनिक संवेदनशीलता मृत प्राय नजर आती है, कागजों और आंकड़ों में सिमटा सुशासन प्रीति राजवाड़े जैसी बेटियों के लिए बेमानी है, जिनका भविष्य आज फाइलों के ढेर और अधिकारियों की मनमानी के बीच दम तोड़ रहा है,क्या व्यवस्था इतनी लाचार हो चुकी है कि वह एक छात्र को उसका संवैधानिक अधिकार भी समय पर उपलब्ध नहीं करा पा रही?
केस स्टडी : प्रीति राजवाड़े की 3 साल की लंबी जंग
प्रशासनिक संवेदनहीनता का सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण ग्राम घुघरा की प्रीति राजवाड़े का है,प्रीति साल 2021 से अपने स्थाई जाति प्रमाण पत्र के लिए तहसील कार्यालय की चौखट घिस रही हैं,उन्होंने आवेदन के साथ सन 1946-47 का वैध रिकॉर्ड भी संलग्न किया है।
अजीबो-गरीब स्थिति
कई बार आवेदन रिजेक्ट होने के बाद जब उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को अपने दस्तावेज दिखाए,तो उच्चाधिकारियों ने रिकॉर्ड्स को सही पाया और पुनः आवेदन करने का सुझाव दिया।
फिर वही ढाक के तीन पात
उच्चाधिकारियों के भरोसे के बाद जब प्रीति ने फिर से आवेदन लगाया, तो सोनहत तहसील कार्यालय ने एक बार फिर उसे खारिज कर दिया, सवाल यह उठता है कि जब रिकॉर्ड सही हैं,तो फिर फाइल को रिजेक्ट करने का आधार क्या है?
सालों से चक्कर,फिर भी हाथ खाली
सोनहत में यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, दर्जनों हितग्राही सालों से कार्यालय के चक्कर काट-काटकर मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताडि़त हो चुके हैं,ग्रामीणों का आरोप है कि तहसील कार्यालय के कर्मचारी केवल फाइलों को इधर-उधर घुमाने में माहिर हैं,जब हमारे पास 1950 से पहले के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं,तो फिर प्रशासन हमें असली निवासी मानने से क्यों कतरा रहा है? क्या एक छात्रा को अपना हक पाने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़कर सिर्फ दफ्तरों के ही चक्कर लगाने होंगे? यह बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवाल
यदि वरिष्ठ अधिकारी रिकॉर्ड को सही मान रहे हैं, तो निचले स्तर पर बैठे कर्मचारी उन्हें चुनौती कैसे दे रहे हैं?
निरस्तीकरण का आधार
आवेदन रिजेक्ट करते समय स्पष्ट कारण क्यों नहीं बताया जाता?


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