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बेंगलुरु@सूर्य के एल 1 प्वाइंट पर स्थापित हुआ आदित्य यान

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बेंगलुरु,06 जनवरी 2024(ए)।
इसरो का आदित्य-एल1 स्पेसक्राफ्ट 126 दिनों में 15 लाख किमी की दूरी तय करने के बाद आज यानी 6 जनवरी को सन-अर्थ लैग्रेंज पॉइंट एल1 पर पहुंच गया है। आदित्य-एल1 अब अपने 7 पेलोड की मदद से 5 साल तक सूरज की स्टडी करेगा।
स्पेसक्राफ्ट में 440 एन लिम्डि अपोजी मोटर लगी है, जिसकी मदद से आदित्य-एल1 को हेलो ऑर्बिट में पहुंचाया गया। यह मोटर इसरो के मार्स ऑर्बिटर मिशन में इस्तेमाल की गई मोटर के समान है। इसके अलावा आदित्य-एल1 में आठ 22एन थ्रस्टर और चार 10 एन थ्रस्टर हैं, जो इसके ओरिएंटेशन और ऑर्बिट को कंट्रोल करने के लिए जरूरी हैं।
एल1 अंतरिक्ष में ऐसा स्थान है, जहां पृथ्वी और सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्तियां संतुलित होती हैं। हालांकि एल१ तक पहुंचना और स्पेसक्राफ्ट को इस ऑर्बिट में बनाए रखना कठिन टास्क है। एल१ का ऑर्बिटल पीरियड करीब 177.86 दिन है।


पीएम नरेंद्र मोदी ने आदित्य-एल१ के हेलो ऑर्बिट में एंट्री करने की देशवासियों को बधाई देते हुए एक्स पर पोस्ट शेयर की है। पीएम ने लिखा- भारत ने एक और लैंडमार्क कायम किया है। सूर्य का अध्ययन करने वाला भारत का स्पेसक्राफ्ट आदित्य एल१ अपने डेस्टिनेशन पर पहुंच गया है।
यह सबसे जटिल और पेचीदा अंतरिक्ष अभियानों को साकार करने में हमारे वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम का प्रमाण है। मैं इस असाधारण उपलब्धि की सराहना करने में राष्ट्र के साथ शामिल हूं। हम मानवता को फायदा पहुंचाने के लिए विज्ञान की नई सीमाओं को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे।


इसरो चीफ एस सोमनाथ ने कहा कि आदित्य रु1 मिशन पूरी दुनिया के लिए है, अकेले भारत के लिए नहीं। उन्होंने कहा, आज हमने अपने मेजरमेंट के आधार पर सटीक प्लेसमेंट हासिल किया इसलिए अभी, हमारी गणना में, स्पेसक्राफ्ट सही जगह पर है।

  1. स्पेसक्राफ्ट की लॉन्चिंग
    आदित्य रु1 को 2 सितंबर को सुबह 11.50 बजे पीएसएलव्ही-सी 57 के एक्सएल वर्जन रॉकेट के जरिए श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। लॉन्चिंग के 63 मिनट 19 सेकेंड बाद स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी की 235 केएम & 19500 केएत की कक्षा में स्थापित कर दिया था।
    आदित्य एल१ को 2 सितंबर को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था।
    चार बार ऑर्बिट चेंज
    पहली बार इसरो के वैज्ञानिकों ने 3 सितंबर को आदित्य एल१ की ऑर्बिट बढ़ाई थी। उसकी पृथ्वी से सबसे कम दूरी 245 केएम, जबकि सबसे ज्यादा दूरी 22,459 केएम हो गई थी।
    5 सितंबर को रात 2.45 बजे आदित्य एल १ स्पेसक्रॉफ्ट की ऑर्बिट दूसरी बार बढ़ाई गई थी। उसकी पृथ्वी से सबसे कम दूरी 282 केएम, जबकि सबसे ज्यादा दूरी 40,225 केएम हो गई।
    इसरो ने 10 सितंबर को रात करीब 2.30 बजे तीसरी बार आदित्य रु1 की ऑर्बिट बढ़ाई थी। उसकी पृथ्वी से सबसे कम दूरी 296 केएम जबकि सबसे ज्यादा दूरी 71,767 केएम हो गई।
    इसरो ने 15 सितंबर को रात करीब 2ः15 बजे चौथी बार आदित्य रु1 की ऑर्बिट बढ़ाई थी। उसकी पृथ्वी से सबसे कम दूरी 256 केएम, जबकि सबसे ज्यादा दूरी 1,21,973 केएम हो गई।
    ट्रांस-लैग्रेंजियन इंसर्शन
    आदित्य एल१ स्पेसक्राफ्ट को 19 सितंबर को रात करीब 2 बजे ट्रांस-लैग्रेंजियन पॉइंट 1 में पहुंचाया गया। इसके लिए यान के थ्रस्टर कुछ देर के लिए फायर किए गए थे। ट्रांस-लैग्रेंजियन पॉइंट 1 इंसर्शन यानी यान को पृथ्वी की कक्षा से लैग्रेंजियन पॉइंट 1 की तरफ भेजना।
    एल१ ऑर्बिट इंसर्शन
    ट्रांस-लैग्रेंजियन पॉइंट 1 इंसर्शन के बाद स्पेसक्राफ्ट को उसके पाथ पर बनाए रखने के लिए 6 अक्टूबर 2023 को ट्रैजेक्ट्री करेक्शन मेनोवर (टीसीएम) किया गया था। अब अंतिम चरण की प्रक्रिया हो गई है। और स्पेसक्राफ्ट एल १ ऑर्बिट का चक्कर लगा रहा है।
    लैग्रेंज पॉइंट-1 क्या है?
    लैग्रेंज पॉइंट का नाम इतालवी-फ्रेंच मैथमैटीशियन जोसेफी-लुई लैग्रेंज के नाम पर रखा गया है। इसे बोलचाल में रु1 नाम से जाना जाता है। ऐसे पांच पॉइंट धरती और सूर्य के बीच हैं, जहां सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल बैलेंस हो जाता है।
    अगर इस जगह पर किसी ऑब्जेक्ट को रखा जाता है तो वह आसानी से उस पॉइंट के चारों तरफ चक्कर लगाना शुरू कर देता है। पहला लैग्रेंज पॉइंट धरती और सूर्य के बीच 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर है। इस पॉइंट पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ता।
    स्पेसक्राफ्ट को एल १ ऑर्बिट में
    बनाए रखना बड़ी चुनौती

    ये पॉइंट पूरी तरह से स्टेबल नहीं है, इसलिए आदित्य-एल १ स्पेसक्राफ्ट को वहां बनाए रखने और वहां मौजूद दूसरे स्पेसक्राफ्ट्स से संभावित टकरावों से बचाने के लिए लगातार मॉनिटरिंग करनी होगी। समय-समय पर थ्रस्टर्स की मदद से इसे उसकी पाथ पर रखा जाएगा।
    एटीट्यूड एंड ऑर्बिट कंट्रोल सिस्टम स्पेसक्राफ्ट के ओरिएंटेशन और पोजीशन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रणाली में विभिन्न सेंसर, कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स और एख्ुएटर जैसे रिएक्शन व्हील्स, मैग्नेटिक टॉर्क और रिएक्शन कंट्रोल थ्रस्टर्स शामिल हैं। सेंसर सिस्टम में एक स्टार सेंसर, सन सेंसर, एक मैग्नेटोमीटर और जाइरोस्कोप शामिल हैं।
    आदित्य-एल १ जैसे मिशनों के लिए, एटीट्यूड और ऑर्बिट कंट्रोल में हाईएक्यूरेसी महत्वपूर्ण है। इसके लिए इसरो ने एक सॉफ्टवेयर डेवलप किया है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की मदद से इसकी टेस्टिंग की गई है। वर्तमान में नासा के डब्ल्यू आईएनडी,एसीई और डीएससीओआरव्ही जैसे स्पेसक्राफ्ट और ईएसए/नासा कोलाबोरेटिव मिशन एसओएचओ भी एल १ के आसपास तैनात हैं।
    सूर्य की स्टडी जरूरी क्यों ?
    जिस सोलर सिस्टम में हमारी पृथ्वी है,उसका केंद्र सूर्य ही है। सभी आठ ग्रह सूर्य के ही चक्कर लगाते हैं। सूर्य की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य से लगातार ऊर्जा बहती है। इन्हें हम चार्ज्ड पार्टिकल्स कहते हैं। सूर्य का अध्ययन करके ये समझा जा सकता है कि सूर्य में होने वाले बदलाव अंतरिक्ष को और पृथ्वी पर जीवन को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
    सूर्य दो तरह से एनर्जी रिलीज करता हैः
    प्रकाश का सामान्य प्रवाह जो पृथ्वी को रोशन करता है और जीवन को संभव बनाता है।
    सूर्य से चुंबकीय कणों (मैग्नेटिक पार्टिकल्स) का विस्फोट होता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक चीजें खराब हो सकती हैं।
    इसे सोलर फ्लेयर कहा जाता है। जब ये फ्लेयर पृथ्वी तक पहुंचता है तो पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड हमें इससे बचाती है। अगर ये अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स से टकरा जाए तो ये खराब हो जाएंगी और पृथ्वी पर कम्युनिकेशन सिस्टम से लेकर अन्य चीजें ठप पड़ जाएंगी।
    सबसे बड़ा सोलर फ्लेयर 1859 में पृथ्वी से टकराया था। इसे कैरिंगटन इवेंट कहते हैं। तब टेलीग्राफ कम्युनिकेशन प्रभावित हुआ था। इसलिए इसरो सूर्य को समझना चाहता है। अगर वैज्ञानिकों के पास सोलर फ्लेयर की ज्यादा समझ होगी तो इससे निपटने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।
    भारत के पहले सूर्य मिशन आदित्य रु1 में लगे सोलर अल्ट्रॉवायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप ने सूर्य की फुल डिस्क तस्वीरें खींची हैं। इन्हें कैद करने के लिए टेलिस्कोप ने 11 फिल्टर का इस्तेमाल किया है।

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