- FMD टीकाकरण में गड़बड़ी के आरोप,जांच समिति बनी… रिपोर्ट और कार्रवाई गायब
- टीकाकरण की गड़बड़ी पर शासन ने कराई जांच, डेढ़ माह बाद भी नतीजा बेनतीजा
- एफएमडी टीकाकरण में अनियमितता के आरोप,जांच समिति के बाद भी कार्रवाई का इंतजार
- जांच समिति पहुंची,दस्तावेज खंगाले… फिर कहां अटक गई एफएमडी जांच?
- टीकाकरण अभियान पर उठे सवाल,जांच के बाद भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं
- एफएमडी टीकाकरण में कथित गड़बड़ी की जांच ठंडे बस्ते में? डेढ़ माह से कार्रवाई का इंतजार
- टीकाकरण में गड़बड़ी के आरोपों पर जांच शुरू,अब जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग…
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,14 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर और कोरिया जिले में पशुधन विकास विभाग के एफएमडी (खुरहा-मुंहपका) टीकाकरण अभियान में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुई विभागीय जांच अब खुद सवालों के घेरे में है, गंभीर आरोपों के बाद शासन स्तर से जांच के निर्देश हुए, समिति गठित हुई,अधिकारी जांच के लिए पहुंचे और दस्तावेजों की पड़ताल भी हुई, लेकिन करीब डेढ़ माह बाद भी किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आने से पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
दैनिक घटती-घटना,अंबिकापुर संस्करण ने 3 जुलाई 2026 को ‘खुरहा-मुंहपका टीकाकरण अभियान में करोड़ों का खेल?’ शीर्षक से मामला प्रमुखता से उठाया था,खबर में टीकाकरण अभियान के क्रियान्वयन, आंकड़ों और जमीनी स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे,इसके बाद मामला विभागीय स्तर तक पहुंचा और उच्च अधिकारियों द्वारा जांच के निर्देश दिए गए,उपलब्ध विभागीय पत्र के अनुसार 27 जुलाई 2026 को उप संचालक, पशु चिकित्सा सेवाएं,जिला कोरिया को पत्र जारी कर जांच समिति की कार्रवाई के संबंध में जानकारी दी गई। पत्र में गठित जांच समिति द्वारा 30 जुलाई 2026 को उप संचालक कार्यालय, जिला कोरिया में उपस्थित होकर जांच की कार्यवाही संपादित किए जाने का उल्लेख है।
जांच समिति पहुंची,दस्तावेज देखे…फिर खामोशी क्यों?- मामले में सबसे बड़ा सवाल जांच के बाद की कार्रवाई को लेकर है, जब शासन के निर्देश पर जांच समिति गठित हुई और समिति ने निर्धारित तारीख पर जांच की कार्यवाही की, तो उसके निष्कर्ष क्या रहे? जांच में आरोप सही पाए गए या निराधार? यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी तय हुई तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं मिली तो विभाग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए जांच रिपोर्ट अथवा निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किया? इसी खामोशी के कारण अब स्थानीय स्तर पर जांच में कथित लीपापोती की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि ऐसी चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और अंतिम स्थिति विभाग की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
टीकाकरण के आंकड़ों और जमीनी हकीकत पर पहले से सवाल– एफएमडी टीकाकरण पशुओं को खुरहा-मुंहपका जैसी संक्रामक बीमारी से बचाने से जुड़ा महत्वपूर्ण अभियान है, ऐसे अभियान में टीकाकरण की वास्तविक संख्या, उपलब्ध वैक्सीन, उपयोग की गई डोज,शेष स्टॉक और मैदानी रिकॉर्ड का आपस में मिलान महत्वपूर्ण होता है, मामले में पहले से ही आरोप लगाए गए थे कि कागजों में दर्ज टीकाकरण और जमीनी स्तर पर किए गए टीकाकरण की वास्तविक स्थिति की विस्तृत जांच आवश्यक है,इन्हीं आरोपों के बाद शासन स्तर की जांच से उम्मीद जगी थी कि दस्तावेज और मैदानी रिकॉर्ड का मिलान कर स्थिति स्पष्ट की जाएगी,लेकिन जांच के डेढ़ माह बाद भी नतीजे सामने नहीं आने से अब जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर ही सवाल उठने लगे हैं।
रिपोर्ट में क्या मिला,विभाग क्यों नहीं बता रहा?-यदि जांच समिति ने 30 जुलाई को जांच की कार्यवाही की थी तो अब तक उसकी रिपोर्ट किस स्तर पर लंबित है? क्या समिति ने जांच प्रतिवेदन उच्च कार्यालय को सौंप दिया? यदि सौंप दिया तो उस पर क्या निर्णय लिया गया? क्या किसी अधिकारी-कर्मचारी को नोटिस जारी किया गया? क्या किसी से स्पष्टीकरण मांगा गया या किसी तरह की विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सामने आने से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जांच वास्तव में अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंची या केवल दस्तावेजी प्रक्रिया बनकर रह गई।
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की उठ रही मांग– मामले में अब जांच रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष सार्वजनिक करने की मांग भी उठ रही है, सवाल यह भी है कि करोड़ों रुपये से जुड़े बताए जा रहे टीकाकरण अभियान में यदि वित्तीय अथवा प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगे हैं तो जांच केवल कार्यालयीन दस्तावेजों तक सीमित रही या टीकाकरण की जमीनी वास्तविकता का भी सत्यापन किया गया? विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी वैक्सीन प्राप्त हुई, कितनी डोज का उपयोग दर्ज किया गया, कितने पशुओं का टीकाकरण हुआ, रिकॉर्ड का भौतिक सत्यापन कैसे किया गया और जांच में क्या निष्कर्ष निकला।
‘जांच की जांच’ जैसी स्थिति क्यों?- जिस मामले में आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए जांच गठित की गई थी, उसी जांच का परिणाम सामने न आने से अब स्थिति ऐसी बन रही है कि मूल आरोपों के साथ जांच की गति और पारदर्शिता भी सवालों के घेरे में आ गई है, फिलहाल कथित अनियमितताओं अथवा किसी अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी की अंतिम पुष्टि जांच रिपोर्ट से ही होगी, लेकिन विभागीय जांच के इतने समय बाद भी स्पष्ट कार्रवाई या निष्कर्ष सामने न आना सवाल जरूर पैदा करता है,अब पशुपालकों और आम लोगों की निगाहें पशुधन विकास विभाग तथा शासन पर हैं—जांच रिपोर्ट आखिर कब सामने आएगी? यदि गड़बड़ी मिली है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी? और यदि आरोप सही नहीं मिले तो विभाग स्थिति स्पष्ट कर इस पूरे विवाद पर विराम क्यों नहीं लगाता? सवाल सीधा है—एफएमडी टीकाकरण में कथित ‘करोड़ों के खेल’ की जांच तो हुई, अब जांच का नतीजा और जिम्मेदारी तय होने का इंतजार आखिर कब खत्म होगा?
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