- साधना कुशवाहा और सोहराब अंसारी को फिर मिलेगी धान खरीदी की जिम्मेदारी या बदलेगा चेहरा?
- धान खरीदी का नया सीजन…पुराने सवाल कायम…शिवप्रसादनगर में इस बार बदलेगा जिम्मेदारों का चेहरा?
- शिवप्रसादनगर में फिर धान खरीदी की तैयारी,क्या लौटेंगे पुराने चेहरे और पुराने सवाल?
- फिर आएगा धान,फिर आएगा सरकारी पैसा…निगरानी होगी या फिर शुरू होगा ‘खर्च’ का खेल?
- शिवप्रसादनगर में धान खरीदी से पहले बड़ा सवाल…साधना और सोहराब को फिर मिलेगी जिम्मेदारी?
- निगरानी,खर्च और जवाबदेही पर सरकार के सामने बड़ी चुनौती…
- सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी नजर…
- किसान धान देगा,सरकार पैसा देगी… अब देखना है हिसाब कौन देगा?
- शिवप्रसादनगर में फिर धान खरीदी की आहट,पुराने विवादों के बीच जिम्मेदारी पर नजर…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/शिवप्रसादनगर,14 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। धान खरीदी का नया सीजन शुरू होने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है,नवंबर के अंतिम सप्ताह या दिसंबर की शुरुआत से प्रदेशभर में धान खरीदी शुरू होने की संभावना के बीच उन समितियों और खरीदी केंद्रों पर नजरें टिक गई हैं,जहां पिछले वर्षों में धान की कमी, भुगतान, स्टॉक मिलान,परिवहन और जिम्मेदार कर्मचारियों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं,शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र भी ऐसे ही सवालों के घेरे में रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बार खरीदी व्यवस्था में बदलाव होगा या वही पुराने चेहरे फिर धान खरीदी की कमान संभालेंगे? शिवप्रसादनगर समिति को लेकर पहले से सामने आए आरोपों और शिकायतों की पृष्ठभूमि में यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि धान खरीदी के दौरान समिति के खाते में बड़ी रकम का आवागमन होता है,खरीदी, परिवहन, हमाली, रखरखाव,कर्मचारियों के भुगतान और अन्य मदों में शासन की राशि खर्च होती है,ऐसे में यदि निगरानी कमजोर रही तो सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
धान खरीदी सिर्फ धान तौलने का काम नहीं,करोड़ों के सरकारी धन का सवाल-धान खरीदी केंद्र को अक्सर किसान के धान की तौल और भुगतान तक सीमित समझ लिया जाता है,जबकि वास्तविकता में खरीदी केंद्र पर शासन की बड़ी वित्तीय व्यवस्था संचालित होती है,किसान से धान खरीदने के बाद उसका स्टॉक,बारदाना,परिवहन,मिलिंग, उठाव,भुगतान और रिकॉर्ड का पूरा हिसाब रखना पड़ता है,यहीं से निगरानी की वास्तविक जरूरत शुरू होती है,किस दिन कितना धान खरीदा गया? कितना धान केंद्र में मौजूद रहा? कितना उठाव हुआ? किस वाहन से धान गया? किस मिलर को भेजा गया? कितनी मात्रा में बारदाना आया और कितना उपयोग हुआ? समिति के खाते से किस मद में कितना पैसा निकला? किसे भुगतान किया गया? भुगतान का आधार क्या था? इन सवालों का जवाब केवल कागज पर नहीं,बल्कि भौतिक सत्यापन और बैंक खाते के मिलान से मिलना चाहिए।
शिवप्रसादनगर में खाते के खर्च ने पहले ही खड़े किए सवाल-शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र को लेकर सामने आए वित्तीय विवरणों में खरीदी अवधि के दौरान समिति के खाते से बड़ी राशि खर्च होने का सवाल उठाया गया है,उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग एक लाख क्विंटल धान की खरीदी के दौरान खाते से करीब 70 लाख रुपये से अधिक खर्च होने की बात सामने आई है,जबकि शिकायत कर्ताओं का दावा है कि सामान्य अपेक्षित खर्च इससे काफी कम होना चाहिए था,यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बैंक खाते से बड़ी राशि निकलना अपने आप में भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं करता, लेकिन यदि निकासी की गई राशि के सामने वास्तविक खर्च का स्पष्ट रिकॉर्ड,बिल, वाउचर,भुगतान प्राप्तकर्ता और कार्य का प्रमाण उपलब्ध नहीं है तो यह निश्चित रूप से जांच का विषय बनता है,खासकर तब,जब धान खरीदी केंद्र पर मजदूरी का भुगतान किसान स्वयं करते होने की बात कही जा रही है।
मजदूरी किसान दे रहा है तो समिति के खाते से निकला पैसा किस मद में?-धान खरीदी केंद्रों पर हमाली और मजदूरी को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं, किसानों का कहना है कि वे अपने धान की तुलाई,चढ़ाई और संबंधित मजदूरी का भुगतान स्वयं करते हैं, ऐसे में यदि समिति के खाते से हमाली या मजदूरी के नाम पर राशि निकाली गई है तो उसका पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए, किस मजदूर को कितना भुगतान किया गया? किस दिन काम कराया गया? कितने क्विंटल धान की हमाली हुई? कितने मजदूर लगाए गए? मजदूरों की उपस्थिति का रिकॉर्ड कहां है? क्या भुगतान सीधे मजदूर के खाते में हुआ? यदि किसान से मजदूरी भी ली गई और समिति के खाते से भी उसी मद में भुगतान हुआ,तो फिर एक ही काम के लिए दोहरा भुगतान तो नहीं हुआ? यही वह जगह है जहां इस बार शासन को विशेष निगरानी की आवश्यकता है।
‘खर्च’ की फाइल में हर रुपये का हिसाब होना चाहिए-आगामी खरीदी सीजन में सबसे जरूरी व्यवस्था यह होनी चाहिए कि समिति के खाते से होने वाले प्रत्येक भुगतान को खरीदी की वास्तविक गतिविधि से जोड़ा जाए, सिर्फ यह लिख देना कि पैसा हमाली में खर्च हुआ,पर्याप्त नहीं होना चाहिए,उसके साथ मजदूरों की सूची,कार्य दिवस,भुगतान राशि,बैंक ट्रांजेक्शन और संबंधित रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए,इसी तरह परिवहन भुगतान के मामले में वाहन नंबर,ट्रिप,वजन पर्ची,उठाव की तारीख और गंतव्य का मिलान किया जाना चाहिए,धान की मात्रा और पैसे की मात्रा—दोनों का हिसाब एक साथ चले,तभी खरीदी व्यवस्था पारदर्शी मानी जा सकती है।
सरकारी पैसा बचाना है तो बैंक खाते की निगरानी जरूरी-समिति के बैंक खाते में पैसा आने के बाद उसकी निकासी पर निगरानी की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हो जाती है,शाखा स्तर पर बैंक अधिकारियों की भूमिका केवल बैंकिंग लेन-देन तक सीमित नहीं हो सकती; यदि किसी समिति के खाते में असामान्य रूप से बड़ी रकम निकल रही है तो उसके पीछे के दस्तावेज और भुगतान की प्रकृति पर सवाल उठना स्वाभाविक है,यही कारण है कि आगामी खरीदी के दौरान असामान्य निकासी की स्वचालित निगरानी,भुगतान की मदवार जांच और समिति के बैंक खाते का नियमित मिलान किया जाना चाहिए,यदि किसी समिति के खाते से लगातार बड़ी राशि निकाली जा रही है तो विभाग को यह पूछना चाहिए कि पैसा कहां गया और किस काम में लगा।
एक तिहाई पैसा अनियमितता में चला जाता है—दावे की भी हो जांच- धान खरीदी के दौरान कुल सरकारी खर्च का बड़ा हिस्सा अनियमितताओं में जाने संबंधी आरोप भी सामने आते रहे हैं,लेकिन इस तरह के व्यापक दावे को बिना आंकड़ों के तथ्य नहीं माना जा सकता,इसलिए सरकार यदि वास्तव में व्यवस्था को पारदर्शी बनाना चाहती है तो उसे प्रत्येक खरीदी केंद्र का मदवार ऑडिट कराना चाहिए, कितना पैसा आया? कितना खर्च हुआ? किस मद में खर्च हुआ? किसे भुगतान हुआ? क्या भुगतान वास्तविक था? क्या एक ही मद में दो बार भुगतान हुआ? क्या मजदूरी का भुगतान वास्तव में मजदूरों को मिला? क्या परिवहन का भुगतान वास्तविक उठाव के अनुपात में हुआ? इन सवालों के जवाब सामने आते ही यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी धन का कितना हिस्सा वास्तविक व्यवस्था पर खर्च हुआ और कितना खर्च संदिग्ध है।
इस बार सिर्फ धान की तौल नहीं,पूरी व्यवस्था की निगरानी हो-आगामी खरीदी सीजन में यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार रोकना चाहती है तो निगरानी केवल धान के स्टॉक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, खरीदी से भुगतान तक और भुगतान से उठाव तक पूरी श्रृंखला की निगरानी आवश्यक है,समिति के खाते का बैंक मिलान,स्टॉक का भौतिक सत्यापन,बारदाना रजिस्टर,हमाली भुगतान, परिवहन रिकॉर्ड,मिलर को भेजे गए धान की मात्रा और समिति के खर्च का स्वतंत्र परीक्षण—इन सभी को एक साथ देखा जाना चाहिए,तभी यह पता चलेगा कि कहीं कागज पर धान पूरा और जमीन पर कम तो नहीं है,या खाते में खर्च ज्यादा और वास्तविक काम कम तो नहीं हुआ।
शिवप्रसादनगर इस बार बनेगा मिसाल या फिर वही कहानी दोहराएगा?- शिवप्रसादनगर अब केवल एक धान खरीदी केंद्र नहीं रह गया है,पिछले वर्षों में सामने आए आरोपों और वित्तीय सवालों के कारण यह केंद्र आगामी खरीदी सीजन में प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की परीक्षा भी बन सकता है,अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस बार क्या करता है,क्या पुराने आरोपों और शिकायतों का रिकॉर्ड देखकर जिम्मेदारी तय की जाएगी? क्या धान खरीदी में ऐसे कर्मचारियों को जिम्मेदारी दी जाएगी जिनकी कार्यप्रणाली पहले सवालों में रही है? क्या नई टीम बनाकर खरीदी कराई जाएगी? क्या समिति के खाते की निकासी पर विशेष निगरानी रखी जाएगी? क्या किसानों से होने वाले मजदूरी भुगतान और समिति के खाते से होने वाले भुगतान का मिलान कराया जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल…क्या इस बार शिवप्रसादनगर में धान खरीदी का चेहरा बदलेगा या फिर वही पुराने चेहरे,वही पुरानी व्यवस्था और वही पुराने सवाल दोबारा सामने आएंगे?
सरकार के लिए मौका…‘धान खरीदी’ को पारदर्शिता की खरीदी बनाए-सरकार के पास अभी समय है,खरीदी शुरू होने से पहले यदि जिम्मेदारियां तय कर दी जाएं,संदिग्ध मामलों में निष्पक्ष समीक्षा करा दी जाए,बैंक खातों की निगरानी मजबूत कर दी जाए और प्रत्येक भुगतान का डिजिटल तथा भौतिक सत्यापन सुनिश्चित कर दिया जाए तो सरकारी धन की बड़ी बचत हो सकती है,सरकार का पैसा किसी समिति,अधिकारी या कर्मचारी की निजी राशि नहीं है,यह जनता का पैसा है और उसका इस्तेमाल भी जनता के हित में होना चाहिए,धान किसान का है, पैसा सरकार का है और जवाबदेही व्यवस्था की है,इसलिए इस बार सवाल केवल इतना नहीं कि शिवप्रसादनगर में साधना और सोहराब को फिर जिम्मेदारी मिलेगी या नहीं,असली सवाल यह है कि क्या सरकार इस बार ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिसमें किसी एक व्यक्ति के हाथ में धान,रिकॉर्ड और भुगतान—तीनों की ताकत एक साथ न रहे? अगर जवाब हां है तो आगामी खरीदी में बदलाव दिखाई देना चाहिए,अगर जवाब नहीं है तो फिर दो महीने बाद धान के साथ पुराने सवाल भी खरीदी केंद्रों पर लौट आएंगे।
साधना और सोहराब पर फिर भरोसा या इस बार नया चेहरा?
शिवप्रसादनगर की धान खरीदी व्यवस्था में साधना कुशवाहा और सोहराब अंसारी के नाम पहले भी चर्चा में रहे हैं,साधना कुशवाहा को लेकर पूर्व वर्षों की धान खरीदी में कमी और बाद की जिम्मेदारियों को लेकर सवाल उठ चुके हैं,वहीं सोहराब अंसारी को लेकर भी धान खरीदी से जुड़े मामलों में आरोप और शिकायतें सामने आने की बात कही गई है,यही वजह है कि अब आगामी धान खरीदी से पहले यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उन्हीं लोगों को फिर से जिम्मेदारी दी जाएगी जिनकी कार्यप्रणाली पहले से सवालों के घेरे में रही है? यदि विभाग इन लोगों को फिर जिम्मेदारी देता है तो उसके पीछे का प्रशासनिक आधार क्या होगा? क्या पिछले मामलों की जांच और कार्रवाई का परीक्षण किया जाएगा? क्या उनके पुराने रिकॉर्ड को देखा जाएगा? क्या जिम्मेदारी देने से पहले समिति और बैंक स्तर पर कोई निष्पक्ष समीक्षा होगी? और यदि चेहरा बदला जाता है तो क्या नई व्यवस्था वास्तव में पारदर्शी होगी या केवल कर्मचारी का नाम बदलकर वही पुरानी कार्यप्रणाली जारी रहेगी?
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