आरक्षक ने विधवा आदिवासी महिला से किया दुष्कर्म,गिरफ्तारी से बचने लगाई याचिका खारिज
बिलासपुर,14 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि,पुलिस के पास राज्य की ओर से मिली संस्थागत शक्ति होती है। ऐसे में पीडि़ता कई बार स्वतंत्र इच्छा से नहीं,बल्कि कानूनी कार्रवाई के भय के कारण भी सहमति दे सकती है। इसलिए आरोपी के बचाव में सहमति वाले तथ्य को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने आदिवासी विधवा महिला से दुष्कर्म के आरोपी आरक्षक की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी है। मामला जशपुर जिले के कांसाबेल थाना क्षेत्र का है। जहां पदस्थ आरक्षक रूद्रमणी यादव ने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। आरोप है कि रुद्रमणि यादव साल 2023 में फेसबुक के जरिए विधवा महिला से पहले दोस्ती की,जिसके बाद उससे बातचीत करने लगा।
महिला से दुष्कर्म,प्रेग्नेंट होने पर कराया अबॉर्शन : महिला ने उसके खिलाफ थाने में केस दर्ज कराई है,जिसमें उसके साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाया है। लगातार शारीरिक संबंध बनाने पर महिला गर्भवती हो गई, जिसके बाद आरक्षक ने उसका गर्भपात करा दिया। इसके बाद आरोपी आरक्षक ने उसे धमकी देने लगा। उसकी तस्वीरें रिश्तेदारों और परिचितों में वायरल कर दिया। महिला को जमीन दिलाने के नाम पर दो लाख रुपए लेने का आरोप भी ले लिया। इस मामले में पुलिस ने आरोपी आरक्षक के खिलाफ केस दर्ज किया है।
हाईकोर्ट ने कहा…परिस्थिति का फायदा उठा सकता है पुलिसकर्मी : आरोपी की ओर से दलील दी गई कि दोनों बालिग हैं और लंबे समय से सहमति से संबंध में थे। करीब तीन साल बाद एफआईआर दर्ज कराई गई,इसलिए उसे झूठा फंसाया गया है। राज्य ने जमानत का विरोध करते हुए आरोपों की गंभीरता और जांच में मिले साक्ष्यों का हवाला दिया। हाईकोर्ट को बताया गया कि पीडि़ता अनुसूचित जनजाति की विधवा है और आरोपी पुलिस कर्मचारी होने के कारण अपनी वर्दी और परिस्थिति का फायदा उठा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ 2023 से लगातार जबरन संबंध बनाने,गर्भावस्था और गर्भपात,धमकी,फोटो वायरल करने और दो लाख रुपए लेने जैसे गंभीर आरोप हैं। दस्तावेज और पीडि़ता की स्थिति को देखते हुए यह मामला उस फैसले से अलग है।
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