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एमसीबी/चिरिमिरी@भक्ति रस की ऐसी बजी धुन की डूब गए भक्त श्याम,भक्त श्याम के कंधे में भगवान श्याम अप्रवासी

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-रवि सिंह-
एमसीबी/चिरिमिरी, 19 फरवरी 2025 (घटती-घटना)। अप्रवासी भारतीय चंद्रकांत पटेल एवं परिवार तथा श्रीमद् भागवत सेवा समिति चिरमिरी की ओर से आयोजित श्रीमद भागवत कथा में आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी ने भागवत कथा के पांचवे दिन मंगलवार को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया, जिसमें पूतना का वध और गोवर्धन पूजा का प्रसंग शामिल था। कथा में आज प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री भाजपा रामप्रताप सिंह, योग आयोग के अध्यक्ष संजय अग्रवाल, महापौर रामनरेश राय सहित अन्य उपस्थित रहे कथा में भजन के दौरान स्वास्थ्य मंत्री पत्नी सहित जमकर थिरके।
पूतना का वध कर किया उसका उद्धार रहा कथा का प्रसंग
पुतना चरित्र पर व्याख्यान देते हुए आचार्य गोस्वामी ने कहा कि कंस स्वयं को सब कुछ समझ लिया। हमसे बड़ा कोई न हो। जो हमसे बड़ा बनना चाहे या हमारा विरोधी हो उसको मार दिया जाय। ऐसा निश्चय कर ब्रज क्षेत्र में जितने बालक पैदा हुए हो उनको मार डालो, और इसके लिये पूतना राक्षसी को भेजा तो प्रभु श्री बालकृष्ण भगवान ने पूतना को मोक्ष प्रदान किया ही इधर कंस प्रतापी राजा उग्रसेन का पुत्र होते भी स्वार्थ लोलुपता अधिकाधिक होने के कारण राक्षसो की श्रेणी में आ गया और भगवान श्री कृष्ण ने उसका संहार किया।
माखन चोरी करना इस बात का प्रतीक था कि वे अपने भक्तों का प्रेम पाना चाहते थे…
माखन चोरी प्रसंग की धुन बजते ही भक्त श्रोता भक्ति रस में लीन हो गए इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री श्याम भी खुद को रोक नहीं पाए। भक्त श्याम भगवान श्याम को कंधे में उठाकर खूब झूमे यही नहीं कथा में ऐसा वातावरण निर्मित हुआ जैसा स्वयं भगवान धरती पर उतरकर भक्तों के साथ लीला कर रहे हो। भक्त और भगवान दोनों में अंतर कर पाना मुश्किल रहा। कथा प्रसंग के पांचवा दिन श्याम का दिन रहा जहां भक्त, भगवान और प्रसंगकर्ता तीनों श्याम मौजूद रहे। दरअसल कथावाचक आचार्य ने माखन चोरी की लीला का सुंदर चित्रण का वर्णन करते हुए कहा कि माखनचोरी केवल एक बाल लीला नहीं बल्कि इसके पीछे भगवान का गहरा प्रेम और स्नेह भाव छिपा हुआ है। श्रीकृष्ण का माखन चोरी करना इस बात का प्रतीक था कि वे अपने भक्तों का प्रेम पाना चाहते हैं। उन्होंने समझाया कि माखन, जो मेहनत और प्रेम का प्रतीक है भगवान को भोग के रूप में अत्यंत प्रिय था। बालकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर में माखन चुराने जाते थे। जिससे गोपियों का उनके प्रति प्रेम और भी बढ़ जाता था। माखन चोरी लीला प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दूध,दही, माखन को खा-खाकर कंस के अनुचर बलवान होकर अधर्म को बढावा दे रहे थे, इसलिये प्रभु ने दूध, दही, माखन को मथुरा कंस के अनुचरों के पास जाने से रोका और छोटे-छोटे ग्वाल-बालों को खिलाया जिससे वे ग्वाल-बाल बलवान बनें और अधर्मी कंस के अनुचरों को परास्त कर सकें। भगवान श्रीकृष्ण ग्वाल-बालो से इतना प्रेम करते थे कि उनके साथ बैठकर भोजन करते-करते उनका जूठन तक मांग लेते थे। आचार्य श्री ने कहा कि हम जीवन में वस्तुओं से प्रेम करते है और मनुष्यों का उपयोग करते है। ठीक तो यह है कि हम वस्तुओं का उपयोग करें और मनुष्यों से प्रेम करें।
जहां स्वार्थ समाप्त होता है मानवता वहीं से प्रारम्भ होती है:आचार्य मृदुल कृष्ण शास्त्री
मानव योनि में जन्म लेने मात्र से जीव को मानवता प्राप्त नहीं होती। यदि मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद भी उसमें स्वार्थ की भावना भरी हुई है, तो वह मानव होते हुए भी राक्षसी वृçा की पायदान पर खड़ा रहता है। यदि व्यक्ति स्वार्थ की भावना को त्याग कर हमेशा परमार्थ भाव से जीवन यापन करे तो निश्चित रूप से वह एक अच्छा इन्सान है, यानी सुदृढ मानवता की श्रेणी में खड़ा होकर पर सेवा कार्य में रत है। क्योंकि परमार्थ की भावना ही व्यक्ति को महान बनाती है।
संसार जड़ है तो चेतन परमात्मा
आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी महाराज जी ने कहा कि संसार की क्रिया से मन हटाकर यदि हम परमात्मा में लगा देते हैं तो वहीं परमात्मा में मिलन होता है हमारा मन चाबी की तरह है संसार की ओर मन घुमा दिया तो बंधन वही संसार के कर्तव्यों को निष्ठा पूर्वक निर्वहन करते हुए परमात्मा के चरणों में लगा दिया तो यही मन मोक्ष का द्वार है आनंद नंद के घर में ही पैदा होता है जीवन की समग्रता ही कृष्ण है व्यक्ति सुख बटोरता है तथा आनंद को लूटता है
प्रेम और भक्ति से ही भगवान प्रसन्न होते हैं:आचार्य शास्त्री जी
महाराज श्री ने वृंदावन की सुंदर कथाओं का वर्णन किया। बकासुर, अघासुर आदि दैत्यों का उद्धार, कालिया मर्दन के बाद गोवर्धन धारण कर भगवान ब्रज वासियों की रक्षा की। अंत में कथा से सीख लेते हुए श्रोताओं से अपने जीवन को धन्य बनाने के लिए आह्वान किया। आचार्य ने ममतामयी लीलाओं के माध्यम से भक्तों को यह संदेश दिए कि भगवान प्रेम और भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।प्रेम की भाषा बोलिये जिसे बहरे भी सुन सकते हैं और गूंगे भी समझ सकते है। कृष्ण की बाल लीलाएं यह बताती हैं कि ईश्वर अपने भक्तों के साथ सदा निकट रहते हैं और प्रेम से उनके जीवन में सम्मिलित रहते हैं। श्रोताओं ने बालकृष्ण लीला का आनंद लिया और भक्ति में लीन होकर जयकारे लगाए । हर तरफ जय कन्हैया लाल के जयघोष की गूंज सुनाई दी। भजन-कीर्तन का दौर भी चला, इस बीच पूरा माहौल भक्ति में डूबा रहा।


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