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कोरिया/सोनहत @करोड़ों खर्च,फिर भी प्यासे जलस्रोत! गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व की जल संरचनाओं पर उठे सवाल

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  • वन्यजीवों के लिए बने जलस्रोत खुद प्यासे! करोड़ों की परियोजनाओं की होगी जांच?
  • स्टॉप डैम बने,पानी नहीं रुका! गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में करोड़ों की परियोजनाओं पर सवाल
  • जंगल में जल संरक्षण या सरकारी धन की बर्बादी? बारिश के बाद भी सूखे पड़े स्टॉप डैम
  • बारिश बेअसर,करोड़ों की जल संरचनाएं बेकार! टाइगर रिजर्व में निर्माण गुणवत्ता पर घिरे सवाल
  • करोड़ों की लागत, अधूरा जल संरक्षण! वन्यजीवों के लिए बने जलस्रोतों की खुली पोल
  • फॉलोअप ग्राउंड रिपोर्ट : बरसात में भी नहीं भरे स्टॉप डैम, अब तकनीकी ऑडिट की मांग तेज

राजन पाण्डेय
कोरिया/सोनहत,04 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
प्रकृति के संरक्षण और वन्यजीवों के लिए जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में बनाए गए स्टॉप डैम और तालाब अब स्वयं सवालों के घेरे में हैं,करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित इन कृत्रिम जल संरचनाओं का उद्देश्य गर्मी के मौसम में वन्यजीवों के लिए स्थायी जल स्रोत तैयार करना था, लेकिन इस वर्ष लगातार हुई मूसलाधार बारिश के बावजूद कई संरचनाओं में अपेक्षित जलभराव नहीं हो पाया, इसके विपरीत प्राकृतिक नाले,छोटे गड्ढे और जलधाराएं पानी से लबालब दिखाई दे रही हैं,जबकि कृत्रिम संरचनाएं अपनी क्षमता के अनुरूप पानी रोकने में असफल नजर आ रही हैं,यह स्थिति केवल निर्माण गुणवत्ता का ही प्रश्न नहीं उठाती,बल्कि करोड़ों रुपये की लागत से संचालित जल संरक्षण योजनाओं की उपयोगिता और वन्यजीव संरक्षण की रणनीति पर भी गंभीर बहस खड़ी करती है।
तालाब में दरार,डिजाइन और निर्माण पर उठे सवाल-गिधरे मार्ग पर बने एक तालाब की स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई दी, स्थल निरीक्षण के दौरान देखा गया कि तालाब का गड्ढा अपेक्षाकृत छोटा है,जबकि उसके चारों ओर ऊंची मिट्टी की पाल बनाई गई है, पानी पाल तक पहुंच ही नहीं पाया,ग्रामीणों के अनुसार तालाब का प्राकृतिक ढाल भी सही दिशा में नहीं दिखाई देता, निरीक्षण के दौरान मिट्टी की दीवार में बड़ी दरार (क्रैक) भी दिखाई देने का दावा किया गया, यदि यह स्थिति सही है,तो लगातार वर्षा की स्थिति में संरचना की मजबूती पर भी प्रश्न उठते हैं,हालांकि इसकी वास्तविक तकनीकी स्थिति का आकलन विशेषज्ञों की जांच के बाद ही संभव होगा।
चंदहा मार्गः दीवार है,लेकिन पानी नहीं-मेण्ड्रा बैरियर से आगे चंदहा मार्ग पर बने स्टॉप डैम की स्थिति भी सवालों के घेरे में है,दूर से देखने पर केवल कंक्रीट की दीवार और खोदा गया क्षेत्र दिखाई देता है, लेकिन पर्याप्त जलभराव नहीं दिखा, स्थानीय ग्रामीण व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यहां यदि किसी चीज की सबसे अधिक कमी दिखाई देती है तो वह पानी है।
वन्यजीवों पर पड़ सकता है सीधा असर-गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व देश के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में से एक है,जहां हाथी, भालू,तेंदुआ,हिरण,जंगली सूअर सहित अनेक वन्यजीव निवास करते हैं,यदि कृत्रिम जल स्रोत पर्याप्त पानी नहीं रोक पाए तो गर्मी के दिनों में वन्यजीवों को पानी की तलाश में जंगल छोड़कर आबादी की ओर आना पड़ सकता है, वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट बढ़ने पर मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी वृद्धि हो सकती है, जिसका असर वन्यजीवों और ग्रामीणों दोनों पर पड़ेगा।
कई तकनीकी प्रश्न अभी भी अनुत्तरित
यह पूरा मामला कई गंभीर तकनीकी सवाल खड़े करता है क्या निर्माण से पहले वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया गया था? क्या कैचमेंट एरिया का सही आकलन किया गया? क्या योग्य सिविल एवं हाइड्रोलिक इंजीनियरों की निगरानी में निर्माण हुआ? क्या डिजाइन और निर्माण मानकों का पालन किया गया? यदि भारी बारिश के बाद भी पानी नहीं रुक रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
जन सहयोग समिति ने की तकनीकी ऑडिट की मांग
कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने कहा कि यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जल संरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा है तो पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच आवश्यक है, उन्होंने कहा कि समिति इस मामले की शिकायत वन मुख्यालय रायपुर, भारत सरकार के संबंधित मंत्रालय तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंचाएगी, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो सके।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें…
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में बने सभी स्टॉप डैम एवं तालाबों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, निर्माण की गुणवत्ता और लागत की जांच कराई जाए, जल संरक्षण क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन कराया जाए, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, यदि अनियमितता या लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसी के विरुद्ध कार्रवाई की जाए।
क्या तय होगी जवाबदेही?
गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में करोड़ों रुपये की लागत से बनी जल संरचनाओं की वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि केवल निर्माण कार्य पूरा कर देना पर्याप्त नहीं है, यदि संरचनाएं अपने मूल उद्देश्य—जल संरक्षण—को ही पूरा नहीं कर पा रही हैं, तो सार्वजनिक धन के उपयोग और वन्यजीव संरक्षण की पूरी योजना पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित विभाग इन सवालों का तकनीकी और तथ्यात्मक जवाब देगा, या फिर यह मामला भी फाइलों तक सीमित रह जाएगा? क्योंकि यह केवल निर्माण कार्य का मामला नहीं, बल्कि जंगल के बेजुबान वन्यजीवों के भविष्य और करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि की जवाबदेही का भी प्रश्न है।
मानसून ने खोली विकास के दावों की हकीकत
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जिन स्टॉप डैमों और तालाबों का निर्माण पूरे वर्ष वन्यजीवों को पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था,वे वर्षा ऋतु में ही पर्याप्त जल संग्रह नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में जब बारिश के चरम समय में पानी नहीं रुक रहा, तो गर्मी के मौसम में इन संरचनाओं से क्या उम्मीद की जा सकती है, विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी स्टॉप डैम या तालाब की सफलता केवल उसकी दीवार की ऊंचाई से नहीं, बल्कि कैचमेंट एरिया,जल प्रवाह,भूमि की ढाल,मिट्टी की प्रकृति, जल निकासी व्यवस्था और वैज्ञानिक डिजाइन पर निर्भर करती है,यदि इन पहलुओं की अनदेखी की जाए तो भारी वर्षा भी जल संरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं कर सकती।
ग्राउंड रिपोर्ट : मेण्ड्रा-गिधरे मार्ग पर सवालों के घेरे में स्टॉप डैम
मेण्ड्रा बैरियर से आगे गिधरे मार्ग पर निर्मित लगभग सात फीट ऊंची और करीब 50 फीट लंबी कंक्रीट संरचना का निरीक्षण करने पर पाया गया कि सभी गेट बंद होने के बावजूद जलस्तर सीमित था,पानी केवल एक हिस्से में जमा दिखाई दिया,जबकि पूरी संरचना में पर्याप्त जलभराव नहीं था,स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत और आकार वाली संरचना से अपेक्षा थी कि यह लंबे समय तक बड़ी मात्रा में पानी संग्रहित करेगी, जिससे वन्यजीवों को गर्मी में राहत मिल सके।


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