- सरकारी रिकॉर्ड की जांच करने के बजाय शिकायतकर्ता से मांगे सबूत,उप सचिव की भूमिका पर उठे सवाल…
- पीएम की सुरक्षा में कथित चूक के आरोप,फिर भी जांच नहीं!
- ‘नमूना सहायक’ के नाम पर निजी व्यक्ति को ले जाने की शिकायत,कार्रवाई के बजाय साक्ष्य मांगता रहा विभाग
- प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मामला या फाइलों में दबा सच? सरकारी आदेश में दर्ज नाम की जांच तक नहीं हुई,आखिर किसका संरक्षण?
- पीएम के भोजन परीक्षण दल में कथित अनधिकृत व्यक्ति की शिकायत पर उठे गंभीर सवाल…
- जब विभाग ही अपने आदेश नहीं पढ़ेगा, तो सच सामने कैसे आएगा?
- पीएम सुरक्षा प्रकरण में प्रारंभिक जांच तक नहीं, सवालों के घेरे में जिम्मेदार अधिकारी
- सरकारी आदेश में दर्ज ‘नमूना सहायक’ की सत्यता पर आज तक नहीं खुला राज…
-संवाददाता-
सूरजपुर/रायपुर,03 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता मानी जाती है,प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान सुरक्षा से जुड़े प्रत्येक विभाग की जिम्मेदारी तय होती है और भोजन परीक्षण जैसी प्रक्रिया को भी अत्यंत संवेदनशील माना जाता है,ऐसे में यदि इसी प्रक्रिया से जुड़ी किसी गंभीर शिकायत पर महीनों तक प्रभावी जांच न हो और विभाग अपने ही रिकॉर्ड की पड़ताल करने के बजाय शिकायतकर्ता से ही साक्ष्य मांगने लगे,तो स्वाभाविक रूप से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं,ऐसा ही एक मामला तत्कालीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी नितीश कुमार मिश्रा से जुड़ा सामने आया है,शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री के सूरजपुर दौरे के दौरान भोजन परीक्षण दल में एक ऐसे व्यक्ति को‘नमूना सहायक’ के रूप में शामिल किया गया, जो कथित रूप से विभाग का अधिकृत नमूना सहायक था ही नहीं, यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल विभागीय अनियमितता नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय हो सकता है।
बता दे की जब देश के प्रधानमंत्री के भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा की जांच से जुड़े प्रकरण पर ही गंभीर सवाल उठ रहे हों, तब स्वाभाविक रूप से अन्य माननीय जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों के लिए होने वाले खाद्य परीक्षण की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ जाती है,यदि इतने संवेदनशील मामले में प्रकाशित समाचारों, उपलब्ध दस्तावेजों और शिकायतों के बावजूद सक्षम स्तर पर निष्पक्ष जांच तक नहीं हो,तो यह केवल एक शिकायत का विषय नहीं रह जाता,बल्कि विभागीय जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है,रायपुर से प्रकाशित कई प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में यह मामला फोटो और दस्तावेजों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित हुआ,इसके बावजूद यदि विभाग ने तथ्यों का सत्यापन कर स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं रखा,तो संबंधित अधिकारी की पहुंच,प्रभाव अथवा उसे प्राप्त संरक्षण को लेकर भी स्वाभाविक रूप से चर्चाएं और सवाल उठना लाजिमी हैं, ऐसे मामलों में सच्चाई सामने लाने का सबसे प्रभावी माध्यम निष्पक्ष,पारदर्शी और समयबद्ध जांच ही हो सकती है।
सबसे आसान जांच थी,लेकिन वही नहीं हुई-इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत की पुष्टि के लिए किसी जटिल जांच की आवश्यकता नहीं थी,विभाग केवल अपने रिकॉर्ड देखकर यह स्पष्ट कर सकता था कि क्या सुमित त्रिपाठी विभाग का नियमित नमूना सहायक था? यदि नहीं था,तो उसका नाम आदेश में किस आधार पर दर्ज किया गया? किस अधिकारी ने उसका नाम प्रस्तावित किया? क्या उसके पास अधिकृत पहचान पत्र था? ये सभी तथ्य विभागीय अभिलेखों से आसानी से सत्यापित किए जा सकते थे।
प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़ा था मामला-प्रधानमंत्री के किसी भी दौरे में भोजन परीक्षण प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है,इस प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी का सत्यापन तथा अधिकृत होना महत्वपूर्ण होता है, यदि किसी अनधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी संबंधी शिकायत सामने आती है,तो सामान्यतः उसकी गंभीर जांच अपेक्षित मानी जाती है,यही कारण है कि इस शिकायत को सामान्य विभागीय विवाद के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित प्रशासनिक प्रश्न के रूप में देखा जा रहा है।
नितीश कुमार मिश्रा पहले भी रहे हैं विवादों में-तत्कालीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी नितीश कुमार मिश्रा का नाम पूर्व में भी विभिन्न शिकायतों में सामने आता रहा है,उपलब्ध शिकायत पत्र में उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार, अवैध वसूली,पद के दुरुपयोग तथा विभागीय जांच की मांग की गई है,हालांकि इन आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच के बाद ही हो सकती है।
सूत्रों के दावे भी जांच के दायरे में…
सूत्रों का दावा है कि सूरजपुर में पदस्थापना के दौरान नितीश कुमार मिश्रा विभागीय स्थानांतरण,पदस्थापन और प्रयोगशाला से जुड़े मामलों में प्रभाव रखते थे,यह भी आरोप लगाए जाते रहे हैं कि वे कुछ व्यक्तियों को नमूना सहायक के रूप में स्थापित कराने का प्रयास करते रहे,इसी प्रकार कुछ सूत्र यह भी दावा करते हैं कि वे निजी वाहन पर सायरन का उपयोग करते थे, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनकी जांच होना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री के दौरे के लिए बना था विशेष भोजन परीक्षण दल
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 5 नवंबर 2023 को कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी,सूरजपुर द्वारा प्रधानमंत्री के प्रस्तावित 7 नवंबर 2023 के दौरे के लिए भोजन परीक्षण दल का गठन किया गया,इस आदेश में चिकित्साधिकारी के साथ तत्कालीन खाद्य सुरक्षा अधिकारी नितीश कुमार मिश्रा तथा सुमित त्रिपाठी को‘नमूना सहायक’के रूप में शामिल किया गया था,यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है।
शिकायत में क्या लगाए गए आरोप?
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आदेश में जिस सुमित त्रिपाठी को नमूना सहायक बताया गया,वह विभाग का अधिकृत नमूना सहायक नहीं था, शिकायत के अनुसार एक निजी व्यक्ति को सरकारी व्यवस्था के भीतर प्रवेश दिलाकर भोजन परीक्षण प्रक्रिया में शामिल कराया गया,यदि शिकायत सही साबित होती है तो कई गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं क्या भोजन परीक्षण टीम में किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश मिला? यदि हां,तो किसकी अनुमति से? क्या सुरक्षा एजेंसियों को सही जानकारी उपलब्ध कराई गई थी? क्या सरकारी आदेश में गलत विवरण दर्ज किया गया?
लेकिन विभाग ने शिकायतकर्ता को ही बुला लिया
शिकायत लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तक पहुंची, इसके बाद 19 जनवरी 2026 को उप सचिव विजय कुमार चौधरी द्वारा शिकायतकर्ता को पत्र जारी कर कहा गया कि शिकायत के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य एवं दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और उन्हें निर्धारित तिथि पर दस्तावेजों सहित उपस्थित होना होगा, यहीं से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
जब रिकॉर्ड विभाग के पास था तो शिकायतकर्ता से सबूत क्यों?
आलोचकों का तर्क है कि यदि विवाद सरकारी आदेश में दर्ज एक नाम का था, तो उसकी जांच करने का अधिकार और दायित्व स्वयं विभाग का था, सबसे पहले विभाग यह देख सकता था क्या संबंधित व्यक्ति कर्मचारी था? उसका नियुक्ति आदेश क्या था? उसका सेवा रिकॉर्ड क्या कहता है? क्या वह वास्तव में नमूना सहायक के रूप में अधिकृत था? यदि इन प्रश्नों के उत्तर रिकॉर्ड से मिल सकते थे, तो शिकायतकर्ता से अतिरिक्त साक्ष्य मांगने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यही प्रश्न अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है।
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