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संपादकीय@ जर्जर सड़कें : विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई

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छत्तीसगढ़ में मानसून के साथ एक बार फिर सड़कों की बदहाली बड़ा जनमुद्दा बनकर सामने आ रहा है। राजधानी रायपुर से लेकर सरगुजा, बस्तर,बिलासपुर,कोरबा और अन्य जिलों तक खराब सड़कें लोगों की परेशानी का कारण बनी हुई हैं। कहीं सड़कें गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं तो कहीं अधूरे निर्माण कार्य लोगों के लिए रोज़ाना खतरा बन रहे हैं। आम नागरिक, किसान,व्यापारी, विद्यार्थी और मरीज—हर वर्ग इस समस्या से प्रभावित है। सवाल यह है कि जब हर वर्ष सड़क निर्माण और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं,तब भी स्थिति में स्थायी सुधार क्यों नहीं दिखता?
सरगुजा संभाग इसका ताजा उदाहरण है। डिगमा-सरगवां सड़क हो,कई ग्रामीण संपर्क मार्ग हों या शहर की आंतरिक सड़कें—लंबे समय से लोग इनके निर्माण और मरम्मत की मांग कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कई जगह लोगों को आंदोलन, धरना और चक्का जाम का सहारा लेना पड़ रहा है। लोकतंत्र में जनता का विरोध करना उसका अधिकार है, लेकिन यदि बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोगों को सड़क पर उतरना पड़े तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सबसे गंभीर पहलू सड़क सुरक्षा का है। जर्जर सड़कें केवल असुविधा नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं का बड़ा कारण भी हैं। बरसात के दिनों में गड्ढों में पानी भर जाने से उनकी गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता और दोपहिया वाहन चालक सबसे अधिक हादसों का शिकार होते हैं। एम्बुलेंस की रफ्तार प्रभावित होती है, स्कूल बसों में सफर करने वाले बच्चों की सुरक्षा खतरे में रहती है और किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में अतिरिक्त समय और लागत दोनों का सामना करना पड़ता है।
समस्या केवल सड़क खराब होने की नहीं है,बल्कि निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी की भी है। कई बार नई बनी सड़कें कुछ ही महीनों में उखड़ने लगती हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप हो रहे हैं? यदि नहीं,तो जिम्मेदार एजेंसियों और अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं होती? जवाबदेही तय किए बिना गुणवत्तापूर्ण निर्माण की उम्मीद करना कठिन है।
ओवरलोड वाहनों की आवाजाही भी एक बड़ी चुनौती है। कई सड़कें सीमित भार क्षमता के अनुरूप बनाई जाती हैं,लेकिन उन पर निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक वजन वाले ट्रक नियमित रूप से चलते हैं। परिणामस्वरूप सड़कें समय से पहले ही क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। परिवहन और संबंधित विभागों को इस दिशा में सख्ती दिखानी होगी,अन्यथा हर वर्ष मरम्मत पर खर्च होने वाला सरकारी धन व्यर्थ जाता रहेगा।
राज्य सरकार ने आधारभूत संरचना के विकास को प्राथमिकता देने की बात कही है। नई सड़कें,पुल और हाईवे बनना निश्चित रूप से विकास का संकेत हैं,लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है पहले से मौजूद सड़कों को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना। विकास का सही अर्थ वही है, जिसका लाभ सीधे आम नागरिक तक पहुंचे।
अब आवश्यकता केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि समयबद्ध और पारदर्शी कार्ययोजना की है। जिन सड़कों की स्थिति अत्यंत खराब है, उनकी प्राथमिकता तय कर शीघ्र मरम्मत और निर्माण कराया जाए। साथ ही गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच, नियमित मॉनिटरिंग और दोषी ठेकेदारों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और संबंधित विभागों को मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना होगा।
किसी भी राज्य की पहचान केवल उसकी ऊंची इमारतों या बड़ी परियोजनाओं से नहीं होती,बल्कि उन सड़कों से होती है जिन पर आम नागरिक हर दिन चलता है। यदि सड़कें सुरक्षित,मजबूत और टिकाऊ होंगी,तभी विकास के दावे वास्तव में सार्थक माने जाएंगे।


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