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रायपुर,@ नकली दवा कांड

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  • पूरा सिस्टम चुप, एनएसयूआई को सिर्फ एक चेहरा दिखा क्यों?
  • खुलासा करने वाला दोषी,सिंडिकेट सुरक्षित-यह कैसी कार्रवाई?
  • सिस्टम बचाओ अभियान या सच दबाओ? नकली दवा कांड में उठे बड़े सवाल
  • ढाई लाख बनाम 25 लाखः आंकड़ों में खेल या सिस्टम का मेल?
  • एक पर कार्रवाई,बाकी पर चुप्पी-नकली दवा कांड में चयनात्मक आक्रोश
  • जांच से पहले गायब…दुकान,
  • जांच के बाद गायब…जवाब
  • एनएसयूआई की आवाज
  • या किसी का इशारा? सवालों में विरोध की दिशा
  • खुलासा करने वाला ही कठघरे में,
  • और सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम


न्यूज डेस्क
रायपुर,20 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
नकली दवा कांड अब सिर्फ अवैध कारोबार का मामला नहीं रहा,बल्कि यह ऐसा आईना बन चुका है जिसमें सिस्टम की परतें,राजनीति की मंशा और संगठनों की ‘चयनात्मक सक्रियता’ साफ दिखाई दे रही है, सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस कार्रवाई ने पूरे सिंडिकेट को उजागर किया,उसी कार्रवाई से जुड़े अधिकारी पर सबसे ज्यादा उंगली उठ रही है, सवाल यह नहीं कि कार्रवाई सही थी या गलत,सवाल यह है कि पूरा सिस्टम होते हुए भी निशाना सिर्फ एक व्यक्ति क्यों? जब एक ओर विपक्ष की बड़ी राजनीतिक ताकत खामोश नजर आती है और उसकी ही एक छात्र इकाई अचानक मुखर होकर सिर्फ एक नाम पर टिक जाती है, तो यह स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करता है, क्या यह सच में न्याय की लड़ाई है,या फिर कहानी को एक दिशा में मोड़ने की कोशिश? इसी सवाल के इर्द-गिर्द यह पूरा मामला अब एक प्रशासनिक जांच से ज्यादा एक ‘सिस्टम बनाम सच’ की लड़ाई बनता जा रहा है।
एनएसयूआई की ‘जागृति’ या चयनात्मक सक्रियता?
नकली दवा कांड में विपक्ष की भूमिका सबसे पहले सवालों के घेरे में आती है, पूरी कांग्रेस जहां इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत शांत दिखाई देती है, वहीं उसकी छात्र इकाई एनएसयूआई अचानक सक्रिय हो जाती है, रायपुर के जिलाध्यक्ष शांतनु झा जोरदार तरीके से सहायक औषधि नियंत्रक संजय कुमार नेताम पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं,मांग करना गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पूरा नकली दवा कांड सिर्फ एक व्यक्ति का मामला है? जमीनी हकीकत और विभागीय हलचल कुछ और कहानी कहती है,सूत्र बताते हैं कि यह एक पुराना सिंडिकेट है,जो वर्षों से सक्रिय रहा है, ऐसे में केवल एक अधिकारी पर कार्रवाई की मांग करना ‘चयनात्मक आक्रोश’ की श्रेणी में आता है,तो फिर विरोध भी उसी स्तर का होना चाहिए,लेकिन यहां स्थिति उलट है पूरा सिस्टम चर्चा में है, लेकिन आवाज सिर्फ एक नाम पर अटक गई है,यहां व्यंग्य यही है कि जहां पूरी किताब पढ़ने की जरूरत है,वहां सिर्फ एक पन्ना फाड़कर बहस हो रही है।
सूचना, जब्ती और आंकड़ों का खेलइस पूरे मामले में सबसे बड़ा अंतर सामने आता है जब्ती के आंकड़ों में,पहली कार्रवाई में दवाएं लगभग 2.5 लाख रुपये की बताई गईं,दूसरी कार्रवाई में यही आंकड़ा बढ़कर 25 लाख रुपये हो गया, यह अंतर केवल संख्या का नहीं है,बल्कि यह पूरी जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, अगर पहली बार सब सही था,तो दूसरी बार इतना अंतर क्यों? और अगर दूसरी बार सही था,तो पहली बार क्या हुआ?
विभाग के भीतर की खींचतान और खामोशी-सूत्र बताते हैं विभाग के अंदर ही इस मामले को लेकर दो धड़े सक्रिय थे,एक धड़ा इस मामले को उजागर करना चाहता था,जबकि दूसरा इसे दबाए रखना चाहता था,इसी कारण बताया जाता है कि नकली दवाएं करीब दो महीने तक ट्रांसपोर्ट में पड़ी रहीं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई,यह स्थिति खुद बताती है कि मामला सिर्फ बाहरी नहीं,बल्कि आंतरिक भी है,यह भी आरोप है कि कुछ विभागीय कर्मचारी इस मामले को दबाए रखना चाहते थे, यानी मामला सामने ही न आए,यही कोशिश थी, फिर अचानक कार्रवाई होती है और पूरा नेटवर्क उजागर हो जाता है, यह घटनाक्रम खुद ही कई सवाल खड़े करता है।
जांच से पहले ‘गायब’ सच्चाई और बाद में औपचारिक कार्रवाई- नकली दवा कांड का अगला और सबसे चर्चित पहलू प्रेम प्रकाश एजेंसी से जुड़ता है, जिसने पूरे घटनाक्रम को और अधिक संदिग्ध बना दिया। इस एजेंसी का नाम सामने आने के बाद माना जा रहा था कि अब जांच की दिशा साफ होगी और ठोस कार्रवाई देखने को मिलेगी,लेकिन घटनाक्रम ने यहां भी अलग ही मोड़ ले लिया, बताया जाता है कि इस एजेंसी को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए गए। यदि लगातार मीडिया,विशेषकर दैनिक घटती-घटना समाचार पत्र इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित नहीं करता,तो संभवतः यह नाम भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता,मीडिया के दबाव के बाद ही प्रशासन सक्रिय होता है और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ती है,लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा होता है जब जांच से पहले ही एजेंसी को इसकी भनक लग जाती है। परिणाम यह होता है कि जिस दुकान पर जांच होनी थी,वह रातों-रात खाली हो जाती है। जब जांच टीम मौके पर पहुंचती है,तो वहां न कोई दवा मिलती है,न कोई दस्तावेज—सिर्फ एक खाली दुकान,जांच टीम में शामिल अधिकारी ईश्वरी नारायण सिंह मौके पर पहुंचते हैं और अपने साथ औषधि निरीक्षक नीरज साहू को भी शामिल कर लेते हैं,जबकि बताया जाता है कि उस दिन नीरज साहू अवकाश पर थे,इसके बावजूद वे जांच में शामिल होते हैं और दोनों अधिकारी उस खाली दुकान में औपचारिक जांच पूरी करते हैं, परिणाम वही—कुछ नहीं मिला, कार्रवाई—फिर वही पुरानी—वेतन वृद्धि रोकना,यह पूरा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि जांच प्रक्रिया कहीं न कहीं औपचारिकता तक सीमित रह गई, सवाल यह भी उठता है कि जब जांच से पहले ही दुकान खाली हो गई थी,तो क्या यह महज संयोग था या किसी स्तर पर सूचना पहले ही पहुंचा दी गई थी?
खुलासा करने वाला ही क्यों निशाने पर?-
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिस अधिकारी की कार्रवाई से नकली दवाओं का जखीरा सामने आया, वही आज कटघरे में खड़ा है, जानकारी के अनुसार, एक सूचना पहले औषधि निरीक्षक नीरज साहू तक पहुंची, लेकिन वहां कार्रवाई सीमित रही, बाद में यही सूचना संजय कुमार नेताम तक पहुंची, जिन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी दीपक अग्रवाल के निर्देश पर कार्रवाई की और लगभग 25 लाख रुपये की दवाएं जब्त कर लीं, अब वही अधिकारी निलंबन और जांच का सामना कर रहे हैं, क्या यह व्यवस्था का तरीका है खुलासा करो और सजा पाओ?
होटल वाली मुलाकातः साजिश या संयोग?-
जिस घटना को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, वह एक होटल की है, बताया जाता है कि विभाग के एक कर्मचारी द्वारा आयोजित लंच पार्टी में संजय नेताम पहले से मौजूद थे, इसी दौरान संबंधित आरोपी वहां पहुंच जाता है और दोनों के बीच सार्वजनिक रूप से बातचीत होती है, न कोई बंद कमरा, न कोई छुपी बैठक सब कुछ खुले में, फिर एक पत्रकार वहां पहुंचता है, वीडियो बनता है और कहानी गढ़ी जाती है कि ‘लेनदेन हो रहा है’ या ‘दस्तावेज दिखाए जा रहे हैं, लेकिन वीडियो में न कोई पैसा दिखता है न कोई दस्तावेज स्पष्ट होते हैं इसके बावजूद कार्रवाई हो जाती है, यहां व्यंग्य यह है कि सबूत न होने के बाद भी फैसला पहले हो गया, और जांच बाद में शुरू हुई।


जांच टीम और ‘करीबी समीकरण’
जांच में ईश्वरी नारायण सिंह और नीरज साहू की भूमिका भी चर्चा में है,बताया जाता है कि छुट्टी के दिन भी दोनों साथ जांच करने पहुंचे, जांच का परिणाम-कुछ नहीं, कार्रवाई—वेतन वृद्धि रोकना, यानी गंभीर मामला,हल्की कार्रवाई,यह संतुलन अपने आप में एक व्यंग्य बन जाता है।
कार्रवाई में अंतरः नियम या ‘रिश्ते’?
इस पूरे प्रकरण में कार्रवाई का पैटर्न भी सवाल खड़ा करता है, कुछ अधिकारियों पर सिर्फ वेतन वृद्धि रोकने की कार्रवाई होती है, जबकि अन्य पर निलंबन, एक ही मामले में अलग-अलग सजा- क्या यह नियम है या रिश्तों का असर?
विभाग के ‘वजीर’ और सिस्टम पर नियंत्रण की चर्चा
इस पूरे प्रकरण में विभाग के भीतर प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका को लेकर भी लगातार चर्चा हो रही है,सूत्रों के अनुसार,बेणीराम साहू को औषधि विभाग में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है,जो पर्दे के पीछे रहकर पूरे सिस्टम को प्रभावित करते हैं,कहा जाता है कि विभाग के कई निर्णय उनके प्रभाव में लिए जाते हैं और उनके करीबी अधिकारियों को संरक्षण मिलता है,यही कारण बताया जा रहा है कि गंभीर मामलों में भी सख्त कार्रवाई के बजाय सीमित दंड जैसे वेतन वृद्धि रोकने तक ही बात सिमट जाती है, यहां तक चर्चा है कि यदि विभाग में सक्रिय कुछ प्रमुख नाम—जैसे नीरज साहू,ईश्वरी नारायण सिंह और अन्य संबंधित अधिकारियों को एक साथ उस संभाग से हटाकर अन्यत्र पदस्थ कर दिया जाए,तो नकली दवाओं के इस नेटवर्क पर बड़ा असर पड़ सकता है,लेकिन ऐसा होना अभी दूर की बात नजर आता है,सूत्र यह भी बताते हैं कि पहले एक बार बेणीराम साहू को हटाने का प्रयास किया गया था और उन्हें कोरिया भेजा गया था,लेकिन प्रभाव इतना मजबूत रहा कि वे वहां ज्वाइन किए बिना ही पुनः रायपुर में अपनी स्थिति मजबूत कर लौट आए और पहले से अधिक प्रभाव के साथ काम करने लगे,यह घटनाक्रम अपने आप में कई सवाल खड़े करता है क्या विभागीय व्यवस्था में कुछ लोग इतने प्रभावशाली हो चुके हैं कि उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई करना संभव नहीं रह गया है? और यदि ऐसा है,तो फिर इस पूरे सिस्टम में निष्पक्षता की उम्मीद कितनी यथार्थ है? इन दोनों पहलुओं को जोड़कर देखें, तो नकली दवा कांड केवल अवैध कारोबार का मामला नहीं,बल्कि एक ऐसे तंत्र की कहानी बन जाता है, जहां कार्रवाई से ज्यादा चर्चा ‘संरक्षण’ और ‘प्रभाव’ की हो रही है।
एनएसयूआई की भूमिकाः विरोध या ‘मैनेजमेंट’?
अब फिर लौटते हैं एनएसयूआई पर प्रश्न यही है क्या यह विरोध निष्पक्ष है? अगर मामला इतना बड़ा है,तो विरोध भी व्यापक होना चाहिए, लेकिन यहां विरोध एक व्यक्ति तक सीमित है,इससे यह धारणा बनती है कि कहीं यह विरोध ‘मैनेज’ तो नहीं किया जा रहा? कुछ सूत्र तो यह भी संकेत देते हैं कि कुछ अधिकारी और बाहरी प्रभावशाली लोग इस विरोध की दिशा तय कर रहे हैं।
सच और चयन के बीच फंसा मामला
नकली दवा कांड अब एक ऐसा प्रकरण बन चुका है,जहां सच सामने है सवाल भी सामने हैं लेकिन जवाब कहीं नहीं हैं जब कार्रवाई चयनात्मक हो,विरोध सीमित हो,और जांच पर भरोसा डगमगाने लगे,तो यह मामला सिर्फ अपराध का नहीं रहता— यह पूरे सिस्टम की साख का मामला बन जाता है,अंत में सवाल वही ‘क्या यह सच की लड़ाई है,या सिर्फ एक चेहरे की? ‘


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