सुकमा, 20 नवम्बर 2025। बीते दिनों आंध्रप्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले में मुठभेड़ में मारे गए नक्सल कमांडर माड़वी हिड़मा और उनकी पत्नी मड़कम राजे का गुरूवार को उनके गृहग्राम पूवर्ती में अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। हिड़मा के बारे में बताया जाता है कि वह नक्सलियों की शीर्ष कमेटी के अकेले आदिवासी सदस्य था, जो छत्तीसगढ़ के सुकमा का रहने वाला था। दो दिन पहले हिड़मा और उनकी पत्नी समेत 7 नक्सली पुलिस मुठभेड़ में मारे गए थे। हिड़मा पर एक करोड़ से ऊपर का ईनाम था। अंतिम संस्कार के दौरान आदिवासी रीति-रिवाज़ों का पूरी तरह पालन किया गया और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में ग्रामीण दोनों को अंतिम विदाई देने पहुंचे। हिडमा के शव को काली पैंट-शर्ट और राजे के शव को लाल जोड़े से सजाया गया। सैकड़ों ग्रामीणों की मौजूदगी में दोनों की संयुक्त अंतिम यात्रा निकाली गई, जिसमें लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और कई ग्रामीण भावुक होकर रोते दिखाई दिए। हिड़मा की मां और उनके परिजनों का रोते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।
हिड़मा की मौत पर सोनी सोढ़ी ने क्या कहा : अंतिम यात्रा के बाद गांव के जंगल में दोनों को एक ही चिता पर मुखाग्नि दी गई। इस दौरान आदिवासी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी भी हिडमा के घर पहुंचीं। अंतिम दर्शन के समय वह हिडमा के शव से लिपटकर रोती-बिलखती नज़र आईं,जिससे माहौल बेहद भावुक हो गया। आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी ने एक वीडियो में कहा कि इतिहास हिड़मा को एक बागी के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसी आवाज के तौर पर याद करेगा जिसने सरकार की ज्यादतियों को चुनौती दी थी। उन्होंने मुठभेड़ के फर्जी होने का आरोप लगाया, और कहा कि उनकी हत्या को बस्तर में राज्य के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए। माड़वी हिडमा का जन्म दक्षिण सुकमा के पूवर्ती गांव के एक आदिवासी परिवार में हुआ था। वह मात्र 16 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ गया था। नक्सल संगठन की एजुकेशन सिस्टम और कल्चरल कमेटी के माध्यम से उसने पढ़ना-लिखना, गाना-बजाना और अन्य कौशल सीखे। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसकी पहली पोस्टिंग महाराष्ट्र के गढ़चिरौली इलाके में की गई,जहां से उसकी नक्सल गतिविधियों की शुरुआत हुई। हिडमा नक्सल संगठन में तेजी से उभरा और सीपीआई (माओवादी) की 21 सदस्यीय सेंट्रल कमेटी में सबसे युवा सदस्य बना। वह पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन-1 का चीफ और माओवादी स्पेशल जोनल कमेटी का भी सदस्य था। संगठन में बढ़ते प्रभाव के कारण वह नक्सलियों के सबसे खतरनाक और रणनीतिक कमांडरों की सूची में शामिल हो गया।
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