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कविता @ शिक्षा अनमोल रत्न है…

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सोचा था भोर की पहली किरण संग
तेरी यादों की गठरी बना
मन्दाकिनी में विसर्जित कर आऊंगी,
ये बह जाएगी धार के साथ
और मैं अकेली लौट आऊगी
लेकिन मैं कर ही नही पाई
गठरी तो बनाई मैंने तेरी यादों की
पर बहा नही पाई क्योंकि
तेरी यादें ही तो मेरे जीने का सहारा है
बह जाएगी ये तो फिर मैं
कैसे जी पाऊगी ।


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