नई दिल्ली,23 सितम्बर 2026 । सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह इस महत्वपूर्ण सवाल की जांच करेगा कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के पास विश्वविद्यालयों और विधि महाविद्यालयों को नियंत्रित करने तथा कानूनी शिक्षा के नियमन की शक्ति है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि बीसीआई कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने वाला विशेषज्ञ निकाय किस आधार पर है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि बीसीआई सामान्य दिशा-निर्देश तय कर सकता है, जैसे विधि पाठ्यक्रम की अवधि चार या पांच वर्ष निर्धारित करना, लेकिन कानूनी शिक्षा पर उसका पूर्ण नियंत्रण होने के सवाल की जांच आवश्यक है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि सबसे पहले यह देखा जाएगा कि क्या बीसीआई के पास विधि विश्वविद्यालयों और विधि महाविद्यालयों को नियंत्रित करने का वैधानिक अधिकार है। पीठ के अनुसार, यदि इस मूल प्रश्न का उत्तर मिल जाता है तो मामले से जुड़े अन्य मुद्दों का समाधान भी हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि बीसीआई को कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में विशेषज्ञ निकाय मानने का आधार क्या है। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में कानून के विद्वानों और शिक्षाविदों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। पीठ ने कहा कि बीसीआई विधि शिक्षा के संबंध में सामान्य दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। वह यह निर्धारित कर सकता है कि विधि पाठ्यक्रम चार वर्ष का हो या पांच वर्ष का तथा कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक कदम भी उठा सकता है। हालांकि, पीठ ने सवाल उठाया कि क्या इन अधिकारों के आधार पर बीसीआई विधि शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ बीसीआई-पर्ल फर्स्ट ट्रस्ट के कामकाज और ट्रस्ट द्वारा कानूनी शिक्षण संस्थान स्थापित किए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि बीसीआई ने अपने पहले के ट्रस्ट को समाप्त करने और उसकी धनराशि एवं संपत्तियों को एक नए ट्रस्ट में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव पारित किया था। उन्होंने इस संबंध में लंबित केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच का भी उल्लेख किया।
भूषण ने बाद में बीसीआई-पर्ल फर्स्ट ट्रस्ट के गठन पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह ट्रस्ट बार परीक्षा संचालित करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने स्वयं को ट्रस्ट का आजीवन न्यासी घोषित किया है।
प्रशांत भूषण ने दावा किया कि ट्रस्ट ने बाद में गोवा में एक और आंध्र प्रदेश में एक विधि महाविद्यालय स्थापित किया। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि बीसीआई विधि महाविद्यालयों को किस अधिकार के तहत नियंत्रित कर सकता है। पीठ ने कहा कि यह मूल प्रश्न है कि विधि महाविद्यालयों को नियंत्रित करने का अधिकार बीसीआई के पास है या नहीं। पीठ ने यह भी कहा कि बीसीआई की भूमिका और अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट किए बिना इस मामले के अन्य पहलुओं पर आगे बढऩा उचित नहीं होगा। सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जिस तरह पूर्व में चिकित्सा क्षेत्र की नियामक व्यवस्था चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सकों के पंजीकरण से संबंधित मामलों को देखती रही है, उसी प्रकार बीसीआई को भी कानूनी शिक्षा के नियमन का अधिकार होना चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में कानून के शिक्षाविदों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए। एक अन्य अधिवक्ता ने दलील दी कि कानूनी शिक्षाविद इस व्यवस्था का हिस्सा हैं तथा पूर्व न्यायाधीश और प्रसिद्ध अधिवक्ता भी इसमें शामिल रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मुद्दा केवल यह नहीं है कि किसी निकाय की संरचना में कौन-कौन लोग शामिल हैं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि बीसीआई को कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने वाला विशेषज्ञ निकाय मानने का कानूनी आधार क्या है। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने बीसीआई के प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रस्ताव में कहा गया था कि पुराना ट्रस्ट समाप्त हो चुका था और वह बीसीआई पर वित्तीय बोझ बन गया था। इसलिए उसे समाप्त कर उसकी संपत्तियां एक नए ट्रस्ट में स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के लिए दान मांगा जाता है और नए विधि महाविद्यालयों को मंजूरी दिलाने के लिए ट्रस्ट में करोड़ों रुपये का दान आता है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित आवेदनों पर नोटिस जारी किया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जवाब मांगा। अब मामले में बीसीआई के जवाब के बाद अदालत इस बात पर आगे विचार करेगी कि कानूनी शिक्षा और विधि संस्थानों के नियमन में बीसीआई की वैधानिक शक्तियों की सीमा क्या है।
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