Breaking News

सूरजपुर/भैयाथान@ सहकारिता में ‘हटाओ और लौटाओ’ का खेल? सोनपुर समिति में पुराने फैसलों पर फिर सवाल

Share

  • सेवा से पृथक कर्मचारी की वापसी क्यों? सोनपुर समिति की बैठक ने खोले सहकारिता तंत्र के कई राज
  • हटाओ भी,लौटाओ भी! सोनपुर सहकारी समिति में सेवा समाप्ति के बाद वापसी का खेल?
  • सहकारिता में ‘कुर्सी का खेल’! सेवा समाप्ति के बाद भी वापसी का रास्ता,सोनपुर
  • समिति में नियमों पर उठे सवाल 9 जुलाई 2025 को हटे विवेक चौरसिया
  • की अगस्त 2026 में वापसी की तैयारी? संचालक मंडल की बैठक ने खड़े किए कई सवाल
  • सोनपुर समिति में सेवा समाप्ति भी स्थायी नहीं! हटाओ, फिर बैठक बुलाओ और वापस लाओ?
  • धान खरीदी से लेकर नियुक्ति तक सवालों के घेरे में सोनपुर समिति,पुराने चेहरे फिर लौटने की तैयारी में
  • जिसे समिति से हटाया,उसी की वापसी का रास्ता तैयार? सोनपुर में संचालक मंडल की बैठक पर सवाल
  • साधना के बाद अब विवेक की वापसी!
  • सोनपुर सहकारी समिति में कार्रवाई और बहाली के खेल पर उठे सवाल


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान 09 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता विभाग का नाम सुनते ही आम आदमी के दिमाग में किसान, समिति,धान,खाद,ऋण और नियम-कायदे आते हैं,लेकिन सूरजपुर जिले की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 के दस्तावेजों को देखकर लगता है कि यहां नियम-कायदे भी शायद मौसम की तरह हैं—कभी बरसते हैं,कभी सूख जाते हैं और कभी-कभी जरूरत के हिसाब से दिशा बदल लेते हैं,यहां कहानी इतनी सीधी नहीं है कि कर्मचारी काम पर था,फिर हटा दिया गया और मामला खत्म, यहां कहानी में एक और अध्याय है—हटाइए,फिर बैठक बुलाइए,फिर वापसी का रास्ता खोजिए,और अगर किसी को लगे कि यह केवल एक कर्मचारी की कहानी है तो सोनपुर की पुरानी फाइलें उसे तुरंत समझा देंगी कि मामला इतना छोटा भी नहीं है,क्योंकि इसी समिति से जुड़ा एक पुराना नाम साधना कुशवाहा का है,उनके संबंध में उपलब्ध सेवा समाप्ति आदेश में धान खरीदी के दौरान 3559.93 क्विंटल धान की कमी और पशुपालन ऋण वितरण में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख है, आदेश में 71 किसानों को कथित कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर लगभग 1 करोड़ 88 लाख 59 हजार रुपये के ऋण वितरण का भी उल्लेख किया गया है,अब नई कहानी में प्रवेश होता है विवेक कुमार चौरसिया का,और यहीं से सवाल पैदा होता है की क्या सोनपुर समिति में सेवा समाप्ति वास्तव में ‘समाप्ति’ होती है या फिर यह केवल अगली बैठक तक का अंतराल है?
क्या विभाग है साधना कुशवाहा पर मेहरबान?
2020-21 की धान खरीदी अनियमितता के बाद भी फिर जिम्मेदारी, 25-26 में करीब 13 हजार क्विंटल कमी का आरोप-सोनपुर समिति की तत्कालीन धान खरीदी प्रभारी साधना कुशवाहा को लेकर सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं,उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2020-21 की धान खरीदी में 3559.93 क्विंटल धान की कमी का मामला सामने आई, वर्ष 2022-23 में सोनपुर और शिवप्रसादनगर समिति से संबंधित पशुपालन ऋण वितरण में भी गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख आदेश में है,दस्तावेज के अनुसार 71 किसानों को कूटरचित दस्तावेजों के माध्यम से करीब 1 करोड़ 88 लाख 59 हजार रुपये का ऋण वितरित किए जाने की बात जांच में सामने आई थी, यानी एक तरफ धान की कमी,दूसरी तरफ ऋण वितरण की गड़बड़ी, ऐसे में सेवा समाप्ति का आदेश जारी हुआ, इसके बावजूद बाद के वर्षों में उन्हें फिर से धान खरीदी की जिम्मेदारी मिलना सवालों के घेरे में है,इतना ही नहीं,वर्ष 2024-25 और 2025-26 में भी उन्हें धान खरीदी प्रभारी बनाया गया,सबसे गंभीर सवाल वर्ष 2025-26 की धान खरीदी को लेकर है,जिसमें उन पर करीब 13 हजार क्विंटल धान की कमी का आरोप लगने के बाद निलंबन की कार्रवाई की गई,इसके बाद भी आरोप है कि वास्तविक कमी को परिवहन के कागजों में समायोजित कर शून्य शॉर्टेज दिखाने का खेल किया गया,यदि यह आरोप दस्तावेजी जांच में सही पाया जाता है तो मामला केवल धान की कमी तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि यह सरकारी रिकॉर्ड में वास्तविक स्टॉक और कागजी स्टॉक के बीच अंतर को छिपाने की गंभीर प्रशासनिक जांच का विषय बन जाएगा,सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति पर पहले ही धान खरीदी में कमी का गंभीर मामला सामने आ चुका था,उसी व्यक्ति को दोबारा धान खरीदी जैसी संवेदनशील जिम्मेदारी देने का आधार क्या था? और यदि 2025-26 में फिर हजारों क्विंटल की कमी सामने आई तो संबंधित अधिकारियों ने जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ उस अवधि में उनकी पुनर्नियुक्ति की अनुमति देने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच क्यों नहीं की? यह पूरा मामला अब एक कर्मचारी की कार्रवाई से आगे बढ़कर सहकारिता विभाग की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था का सवाल बन गया है,विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि 2020-21 की कार्रवाई के बाद साधना कुशवाहा को 2024-25 और 2025-26 में किस आदेश,किस नियम और किस अधिकारी की स्वीकृति से धान खरीदी प्रभारी बनाया गया। साथ ही 2025-26 की कथित करीब 13 हजार क्विंटल कमी के मामले में वास्तविक भौतिक सत्यापन,परिवहन अभिलेख और शून्य शॉर्टेज दर्ज किए जाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, सवाल सिर्फ यह नहीं कि धान कहां गया, सवाल यह भी है कि जिस पर पहले सवाल उठ चुके थे,उसे बार-बार उसी धान के ढेर की चाबी किसने सौंपी?
पहले हटाइए,फिर देखिए बैठक क्या कहती है!
दस्तावेजों के अनुसार विवेक कुमार चौरसिया को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक के रूप में रखा गया था,बाद में उन्हें 9 जुलाई 2025 को समिति एवं समिति के समस्त कार्यों से पृथक किए जाने की जानकारी सामने आई,अब कैलेंडर को थोड़ा आगे बढ़ाइए,साल 2026,6 अगस्त को समिति की ओर से एक पत्र जारी होता है, शीर्षक है, संचालक मंडल की बैठक में उपस्थित रहने बाबत, बैठक की तारीख 7 अगस्त 2026,समय—दोपहर 1 बजे, स्थान—समिति कार्यालय सोनपुर,अब आम आदमी का सवाल होगा की बैठक किसलिए? लेकिन सहकारिता की दुनिया शायद आम आदमी से थोड़ी अलग भाषा बोलती है,नोटिस में बैठक का विस्तृत विषय स्पष्ट नहीं है,यानी पहले बैठक बुलाइए,फिर बैठक में क्या होगा यह बैठक ही बताएगी! यह व्यवस्था लोकतांत्रिक हो सकती है,लेकिन पारदर्शिता के पैमाने पर सवाल जरूर खड़े करती है,क्योंकि अगर बैठक में किसी पूर्व कर्मचारी को वापस लेने का प्रस्ताव होना है तो समिति के सदस्यों को पहले से पता होना चाहिए कि वे किस विषय पर निर्णय लेने जा रहे हैं,वरना तो यह भी कहा जा सकता है कि एजेंडा इतना गोपनीय है कि शायद उसे बैठक शुरू होने के बाद ही खुद बैठक से पता चलेगा।
9 जुलाई 2025 से 7 अगस्त 2026 तक…कर्मचारी बाहर,फाइल अंदर!
विवेक कुमार चौरसिया के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन्हें जिस आधार पर 9 जुलाई 2025 को समिति से पृथक किया गया, उस आधार का क्या हुआ? क्या वह आदेश निरस्त हुआ? क्या उसके विरुद्ध अपील हुई? क्या किसी सक्षम अधिकारी ने बहाली का आदेश दिया? क्या न्यायालय ने कोई निर्देश दिया? क्या पूर्व नियुक्ति की वैधता की जांच की गई? क्या दोबारा नियुक्ति के लिए सेवा नियमों का पालन किया गया? या फिर ‘संचालक मंडल की बैठक’ नामक वह दरवाजा खोला गया जिसके रास्ते पुरानी फाइलों को नई जिंदगी मिल जाती है? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए, और यही इस मामले की असली परीक्षा है।
सोनपुर की फाइल पूछ रही हैमुझे पढ़ोगे या फिर रख दोगे?
सोनपुर समिति के मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि दस्तावेज खुद कई सवालों की ओर इशारा कर रहे हैं,एक तरफ साधना कुशवाहा की सेवा समाप्ति का आदेश है, जिसमें धान की कमी और ऋण वितरण की गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख है, दूसरी तरफ विवेक कुमार चौरसिया को 9 जुलाई 2025 को कार्य से पृथक किए जाने का मामला है,तीसरी तरफ 6 अगस्त 2026 को संचालक मंडल की बैठक का नोटिस है, और चौथी तरफ यह सवाल कि आखिर सेवा से हटाए गए लोगों को दोबारा कार्य में रखने की प्रक्रिया क्या है? यदि सब कुछ नियमसम्मत है तो विभाग को डरने की जरूरत नहीं,पूरी फाइल सार्वजनिक कर दीजिए,नियुक्ति आदेश दिखाइए,पृथक्करण आदेश दिखाइए,बहाली का आदेश दिखाइए,अपील है तो दिखाइए,न्यायालयीन आदेश है तो दिखाइए,सेवा नियम दिखाइए,फिर जनता खुद तय कर लेगी कि मामला नियम का है या ‘कुर्सी प्रबंधन’ का।
और अब असली सवाल-किसकी जिम्मेदारी?
यह मामला केवल सोनपुर समिति के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, सहकारिता विभाग के उच्च अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि समिति में नियुक्ति और सेवा समाप्ति की प्रक्रिया किस नियम के तहत चल रही है,संयुक्त आयुक्त सहकारिता सरगुजा संभाग,उप आयुक्त/उप पंजीयक सहकारिता सूरजपुर और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की संबंधित शाखा को रिकॉर्ड की समीक्षा करनी चाहिए,क्योंकि अगर किसी कर्मचारी को हटाने के बाद बिना स्पष्ट प्रक्रिया के वापस रखा जाता है तो इसका सीधा असर समिति के प्रशासन और किसानों के विश्वास पर पड़ेगा,सहकारी समिति में कर्मचारी केवल फाइल नहीं संभालता। वह धान खरीदी,किसानों के रिकॉर्ड,ऋण,भुगतान और संस्था के आर्थिक व्यवहार से जुड़ा हो सकता है, इसलिए नियुक्ति का सवाल केवल नौकरी का सवाल नहीं है, यह किसानों के पैसे और संस्था के भरोसे का सवाल है।
सहकारिता का नया फार्मूला—सेवा समाप्ति प्लस बैठक बराबर पुनर्वापसी?
अगर इस पूरे घटनाक्रम को व्यंग्य की भाषा में समझें तो सहकारिता में शायद एक नया गणित विकसित हो गया है—सेवा समाप्ति + समय का अंतराल + संचालक मंडल की बैठक = पुनर्विचार! हालांकि यह केवल व्यंग्यात्मक सवाल है, वास्तविकता का निर्धारण दस्तावेज और नियम ही करेंगे,लेकिन सवाल इसलिए उठता है क्योंकि एक तरफ कर्मचारी को हटाने का आदेश है और दूसरी तरफ बाद में उसी व्यवस्था में वापसी की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं,यदि किसी कर्मचारी को गलती या अनियमितता के कारण हटाया गया है तो उसकी वापसी के लिए पहले पुराने मामले की समीक्षा होनी चाहिए,अगर वह केवल प्रशासनिक कारणों से हटाया गया था तो भी वापसी की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए,और यदि उसकी नियुक्ति ही अस्थायी थी तो पुनः रखने के लिए नई नियुक्ति प्रक्रिया क्यों नहीं? सहकारिता में ‘अस्थायी’ शब्द कहीं स्थायी अधिकार में तो परिवर्तित नहीं हो रहा? यह सवाल अब समिति के बाहर भी पूछा जा रहा है।
श्यामलाल सिंह की बैठक और दुर्गा चरण सिंह का पुराना निर्णय
इस मामले में वर्तमान प्राधिकृत अधिकारी/शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह की भूमिका भी जांच के दायरे में रखे जाने की मांग उठ रही है,उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार 6 अगस्त 2026 को उनके कार्यालय से संचालक मंडल की बैठक के लिए सभी समिति कर्मचारियों को सूचना दी गई। बैठक 7 अगस्त को रखी गई,वहीं पूर्व में विवेक कुमार चौरसिया को समिति के कार्य से पृथक करने की कार्रवाई तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी दुर्गा चरण सिंह के कार्यकाल में हुई थी,अब सवाल यह है कि क्या वर्तमान प्राधिकृत अधिकारी को पूर्व आदेश की समीक्षा करने का अधिकार और आधार है? यदि है तो प्रक्रिया क्या है? क्या बैठक से पहले पुराना आदेश पढ़ा गया? क्या नियुक्ति की मूल फाइल मंगाई गई? क्या सेवा नियमों की जांच हुई? क्या समिति के सदस्यों को सभी तथ्य बताए गए? या फिर बैठक में पहले निर्णय और बाद में कागज बनाने की परंपरा चलेगी? कागज पहले या निर्णय पहले—सहकारिता विभाग ही बताए।
साधना से विवेक तक-क्या सोनपुर में ‘रिटर्न ऑफ द रिमूव्ड’ चल रहा है?
व्यंग्य में कहें तो सोनपुर समिति में शायद नई योजना शुरू हो गई है— कार्य से पृथक कर्मचारी पुनर्वास योजना,पहले कर्मचारी हटेगा, फिर कुछ समय तक फाइल शांत रहेगी,फिर कोई बैठक होगी,फिर प्रस्ताव आएगा, फिर नियम खोजे जाएंगे,और अंत में यदि सब कुछ ठीक बैठ गया तो कर्मचारी फिर उसी कुर्सी पर दिखाई दे सकता है,लेकिन यह केवल व्यंग्य है,वास्तविकता तभी सामने आएगी जब संबंधित अधिकारी यह बताएंगे कि विवेक कुमार चौरसिया की पुनर्नियुक्ति या पुनर्बहाली के लिए कौन-सा वैधानिक प्रावधान लागू किया गया।
जवाब जरूरी है,क्योंकि सवाल अब सार्वजनिक है…
सोनपुर समिति की कहानी में अभी किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा,उपलब्ध दस्तावेज कई गंभीर प्रश्न जरूर उठाते हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही निकल सकता है,इसलिए संबंधित अधिकारियों से सीधे सवाल हैं क्या विवेक कुमार चौरसिया को 9 जुलाई 2025 को समिति से पृथक किया गया था? यदि हां,तो किस आधार पर? क्या उन्हें अब दोबारा कार्य पर रखने का निर्णय लिया गया है? यदि हां,तो किस आदेश और किस नियम के तहत? क्या 7 अगस्त 2026 की संचालक मंडल बैठक में उनकी बहाली का प्रस्ताव रखा गया? क्या उनके विरुद्ध पूर्व कार्रवाई की समीक्षा हुई? क्या उनकी मूल नियुक्ति नियमसम्मत थी? क्या किसी न्यायालय ने बहाली का आदेश दिया है? और साधना कुशवाहा के मामले में—2023 में सेवा समाप्ति के बाद उनकी बाद की सेवा स्थिति क्या रही? क्या सेवा समाप्ति आदेश कभी निरस्त हुआ? यदि हां,तो किस सक्षम अधिकारी ने और किस आधार पर? इन सवालों के जवाब आने चाहिए।
‘बैठक’ लोकतंत्र की ताकत है,लेकिन एजेंडा भी तो चाहिए!
संचालक मंडल की बैठक किसी भी सहकारी संस्था में महत्वपूर्ण प्रक्रिया है,बैठक में निर्णय लिए जाते हैं, प्रस्ताव रखे जाते हैं और संस्था के हित में कार्रवाई की जाती है, लेकिन बैठक का विषय स्पष्ट न हो तो सवाल पैदा होना स्वाभाविक है,क्योंकि अगर बैठक में कर्मचारी बहाली का प्रस्ताव होना है तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय है,अगर वित्तीय निर्णय होना है तो उसका भी एजेंडा होना चाहिए, अगर नियुक्ति या सेवा संबंधी निर्णय होना है तो संबंधित नियमों का उल्लेख होना चाहिए,और अगर कुछ भी नहीं है तो सवाल यह है कि बैठक आखिर किसलिए? कहीं ऐसा तो नहीं कि एजेंडा भी वही है जो बैठक के बाद तैयार होगा? व्यंग्य अलग है, लेकिन प्रशासनिक पारदर्शिता का सवाल वास्तविक है।
कुर्सी किसी की निजी संपत्ति नहीं
सहकारिता विभाग में अधिकारी और कर्मचारी आते-जाते रहेंगे, प्राधिकृत अधिकारी बदलेंगे, शाखा प्रबंधक बदलेंगे,संचालक मंडल बदलेगा, लेकिन समिति किसानों की रहेगी, इसलिए कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है कुर्सी की जवाबदेही,सोनपुर की कहानी फिलहाल यही पूछ रही है-क्या नियम कर्मचारी को हटाते हैं या अधिकारी? क्या बैठक निर्णय लेती है या निर्णय के लिए बैठक बुलाई जाती है? क्या सेवा समाप्ति वास्तव में समाप्ति है या केवल कुछ समय के लिए ‘विराम’? और सबसे महत्वपूर्ण-अगर सब कुछ नियम से हो रहा है तो नियम की पूरी किताब जनता के सामने रखने में आखिर दिक्कत क्या है? क्योंकि सहकारिता में किसान को सबसे ज्यादा जरूरत धान के सही वजन की नहीं,बल्कि व्यवस्था के सही वजन की है,और जब तराजू व्यवस्था का हो, तो उसकी दोनों पलड़े बराबर रहना ही असली सहकारिता है।


Share

Check Also

GHATATI-GHATANA PAPER PDF 10 AUGUST 2026

Share 10 AUGUST 2026 AMBIKAPUR GG NEWS PAPER1 11Download Share

Leave a Reply