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बैकुंठपुर/कोरिया @ कोरिया पुलिस में ‘आपसी सहमति’ का नया सिस्टम? बिना आदेश आरक्षक की अदला-बदली पर उठे सवाल

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लाइन में पदस्थ आरक्षक थाने में…और थाने का आरक्षक लाइन में…क्या सब कुछ मौखिक व्यवस्था से चल रहा है… या विभागीय रिकॉर्ड में भी दर्ज है?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,06 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिला पुलिस में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस लाइन में पदस्थ एक आरक्षक को बिना किसी सार्वजनिक स्थानांतरण आदेश के पटना थाना में कार्य करने भेज दिया गया है,जबकि पटना थाना में पदस्थ एक आरक्षक को पुलिस लाइन बुला लिया गया है,बताया जा रहा है कि यह पूरी व्यवस्था कथित तौर पर ‘आपसी सहमति’से संचालित हो रही है,यदि यह जानकारी सही है तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस विभाग में पदस्थापना और कार्यस्थल का निर्धारण अब लिखित आदेशों के बजाय मौखिक सहमति से होने लगा है?
पुलिस विभाग में हर आदेश का होता है रिकॉर्ड-पुलिस विभाग अनुशासन और लिखित आदेशों पर आधारित व्यवस्था माना जाता है,किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की पदस्थापना,कार्यमुक्ति, नवीन पदस्थापना अथवा अस्थायी संबद्धता तक का स्पष्ट आदेश जारी किया जाता है,जिसका रिकॉर्ड विभागीय अभिलेखों में सुरक्षित रहता है,ऐसे में यदि कोई आरक्षक अपने मूल पदस्थापना स्थल से हटकर दूसरे स्थान पर कार्य कर रहा है, तो स्वाभाविक रूप से यह जानना आवश्यक हो जाता है कि उसका विभागीय आदेश कहां है।
क्या कोई लिखित आदेश जारी हुआ?-सूत्रों का दावा है कि लाइन में पदस्थ आरक्षक वर्तमान में पटना थाना में कार्य कर रहा है और पटना थाना का आरक्षक लाइन में है,यदि ऐसा है तो प्रश्न उठता है— क्या इस संबंध में पुलिस अधीक्षक कार्यालय से कोई लिखित आदेश जारी किया गया? यदि आदेश जारी हुआ तो उसकी प्रति कहां उपलब्ध है? यदि आदेश जारी नहीं हुआ तो किस अधिकार के तहत कार्यस्थल बदला गया? क्या संबंधित कर्मचारियों की उपस्थिति पंजिका भी उसी आधार पर संचालित हो रही है?
’आपसी सहमति’ क्या विभागीय प्रक्रिया का विकल्प हो सकती है?-पुलिस विभाग में प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी का कार्यस्थल स्पष्ट रूप से निर्धारित होता है, यदि‘आपसी सहमति’ के आधार पर कर्मचारी अपनी सुविधा अनुसार थाने और लाइन के बीच कार्य करने लगें तो इससे विभागीय अनुशासन, जवाबदेही और प्रशासनिक नियंत्रण पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है,यदि यह केवल अस्थायी व्यवस्था है, तब भी उसके लिए सक्षम अधिकारी का लिखित आदेश होना आवश्यक माना जाता है।
जवाबदेही किसकी?-यदि वास्तव में बिना आदेश के यह व्यवस्था संचालित हो रही है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इसकी अनुमति किस अधिकारी ने दी? संबंधित थाना प्रभारी की क्या भूमिका है? क्या पुलिस लाइन के प्रभारी अधिकारी को इसकी जानकारी है? क्या पुलिस अधीक्षक कार्यालय इस व्यवस्था से अवगत है?
विभागीय पारदर्शिता पर उठे सवाल-पुलिस जैसी अनुशासित सेवा में पारदर्शिता और अभिलेखीय व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता मानी जाती है,इसलिए यदि कोई कर्मचारी उस स्थान पर कार्य कर रहा है जहां उसकी विधिवत पदस्थापना नहीं है,तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया की दृष्टि से जांच का विषय बन सकता है।
विभाग से अपेक्षित है स्पष्ट स्थिति-इस पूरे मामले में अभी तक पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, यदि सूत्रों से प्राप्त जानकारी सही है तो विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित आरक्षकों की वास्तविक पदस्थापना कहां है? क्या उनके कार्यस्थल परिवर्तन का कोई लिखित आदेश जारी किया गया है? यदि नहीं,तो यह व्यवस्था किस आधार पर संचालित की जा रही है? फिलहाल यह मामला सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है,यदि विभाग इस संबंध में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या दस्तावेज जारी करता है, तो वही अंतिम और प्रमाणिक स्थिति मानी जाएगी।


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