दस साल तक सरगुजा संभाग से मोह,अतिरिक्त प्रभारों की बरसात,पदोन्नति में भी ‘घर वापसी’…आखिर यह प्रशासनिक दक्षता है या अदृश्य जुगाड़ तंत्र?


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर/रायपुर,06 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। कहते हैं कि सरकारी नौकरी में तबादला एक ऐसी नियति है,जिससे कोई बच नहीं सकता, लेकिन हर नियम का एक अपवाद होता है और यदि औषधि एवं खाद्य प्रशासन विभाग में अपवाद खोजा जाए तो चर्चा सबसे पहले नितेश कुमार मिश्रा के नाम से शुरू होती है, आम अधिकारी पांच साल में पांच जिले बदल लेते हैं, लेकिन यदि किसी अधिकारी का पूरा दशक लगभग एक ही जिले में और संभाग के इर्द-गिर्द गुजर जाए अन्य जिले के प्रभार में,तो इसे संयोग कहें, सौभाग्य कहें या फिर ‘प्रशासनिक योग्यता’ का ऐसा उदाहरण, जिसकी पढ़ाई शायद लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में भी नहीं कराई जाती, दिसंबर 2015 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी बने और उसके बाद बलरामपुर, सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया…जिले बदलते रहे, लेकिन संभाग नहीं बदला। ऐसा प्रतीत होता है मानो विभाग ने सरगुजा संभाग की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति को नहीं,बल्कि आजीवन पट्टे पर सौंप दी हो।
एक अफसर…कई जिले…और हर जगह वही चेहरा-किसी जिले में मूल पदस्थापना, दूसरे जिले में अतिरिक्त प्रभार, तीसरे जिले में निरीक्षण और चौथे जिले में निर्णय, यदि विभागीय फाइलें बोलने लगें तो शायद यही कहें…‘जहां देखो,वहां नितेश मिश्रा,’ सरकार को शायद लगा होगा कि जब एक ही अधिकारी इतने काम कर सकता है तो बाकी अधिकारियों की जरूरत ही क्या है? बलरामपुर उनका मूल जिला रहा,सरगुजा अतिरिक्त, सूरजपुर अतिरिक्त,कोरिया अतिरिक्त,फिर प्रमोशन हुआ तो गृह क्षेत्र के आसपास ही नई जिम्मेदारी, इतनी प्रशासनिक निरंतरता तो कई मंत्रियों को भी नसीब नहीं होती।
नियम बदलते नहीं…बदलवा दिए जाते हैं?- विभाग में पिछले कई वर्षों से खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की नियमित भर्ती नहीं हुई, लेकिन पद खाली भी नहीं रहे, क्योंकि समाधान खोज लिया गया—पदोन्नति,अब आरोप यह है कि नियमों की व्याख्या भी परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही,पहले 10 प्रतिशत,फिर 25 प्रतिशत,फिर नई सूची,फिर नई उम्मीद,और फिर नई बहस, यदि नियम रास्ते में आ जाएं तो शायद नियमों को ही नया रास्ता दिखा दिया जाता है।
स्थापना शाखा का खेल भी कम दिलचस्प नहीं-सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि खाद्य प्रशासन की स्थापना शाखा आखिर खाद्य प्रशासन के अनुभवी अधिकारी क्यों नहीं संभाल रहे? यदि औषधि विभाग का अधिकारी खाद्य विभाग की स्थापना संभालेगा तो विवाद तो उठेंगे ही,यही कारण है कि आज अधिकांश न्यायिक विवाद,शिकायतें और पदोन्नति के प्रश्न खाद्य प्रशासन से जुड़े दिखाई देते हैं, जबकि औषधि विभाग अपेक्षाकृत शांत नजर आता है,क्या यह महज संयोग है? या फिर व्यवस्था में कहीं कोई गंभीर खामी है?
हर शिकायत का अंत… ‘जांच जारी है’…
इस विभाग की एक और विशेषता है,शिकायतें आती हैं, समाचार प्रकाशित होते हैं,दस्तावेज सामने आते हैं,मामले न्यायालय तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई? वह शायद किसी लंबी छुट्टी पर चली जाती है,लगता है विभाग का नया आदर्श वाक्य है—शिकायत स्वीकार है, कार्रवाई विचाराधीन है।
इतना प्रभाव आखिर कैसे?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है,एक अधिकारी दस वर्षों तक लगभग एक ही संभाग में कैसे बना रहता है? कई जिलों का अतिरिक्त प्रभार कैसे मिलता है? महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां बार-बार उसी के हिस्से में कैसे आती हैं? क्या विभाग में उससे अधिक सक्षम अधिकारी नहीं हैं? या फिर व्यवस्था किसी अदृश्य शक्ति से संचालित होती है?
अब अगला सवाल…संपत्ति और प्रभाव का- यदि किसी अधिकारी का प्रभाव इतना व्यापक बताया जा रहा है कि पदस्थापना से लेकर प्रयोगशाला और पदोन्नति तक उसकी चर्चा हो, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठता है कि दस वर्षों के इस प्रभावशाली कार्यकाल में क्या-क्या बदला? कौन-कौन सी संपत्तियां अर्जित हुईं? किन-किन लोगों को लाभ मिला? कौन-कौन से फैसले विवादों में आए?
विभाग का ‘ऑल इन वन पैकेज’
सरकारी विभागों में सामान्यतः एक अधिकारी एक पद संभालता है, लेकिन यहां तो कहानी कुछ और ही दिखाई देती है, खाद्य सुरक्षा अधिकारी…सहायक आयुक्त का प्रभार…प्रयोगशाला का प्रभार…जिलों का अतिरिक्त प्रभार… ऐसा लगता है जैसे विभाग का विज्ञापन हो— ‘वन मैन… मल्टीपल सर्विसेज।
प्रयोगशाला भी अपनी… रिपोर्ट भी अपनी?
सूत्रों के अनुसार विभाग के भीतर एक ऐसा प्रभावशाली नेटवर्क काम कर रहा है, जिसकी चर्चा खुलेआम होती है, आरोप यह है कि राज्य की खाद्य प्रयोगशाला में भी ऐसे लोगों को महत्व दिया गया,जिन पर सवाल उठ रहे हैं,यदि यह आरोप सही हैं तो फिर सवाल यह भी है कि—सैंपल कौन लेगा? जांच कौन करेगा? रिपोर्ट कौन बनाएगा? और यदि इन तीनों चरणों पर एक ही प्रभाव हावी हो जाए तो निष्पक्षता कहां बचेगी? हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
अगले भाग में ‘दस वर्षों की कमाई का हिसाब?
नौकरी के बाद कहां-कहां बनी संपत्तियां…किन लोगों से जुड़ा कथित नेटवर्क और विभाग में प्रभाव का पूरा तंत्र…
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