
‘घटती-घटना’ ने जिन सवालों को उठाया था…अब उन्हीं आरोपों की होगी आपराधिक जांच…
खोजी खबरों से एफआईआर तक…16 महीने बाद कानून के घेरे में आए तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर
जिन आरोपों पर पहले विभागीय जांच हुई,अब उन्हीं मामलों में दर्ज हुई एफआईआर
जीवित महिला को मृत बताकर जमीन नामांतरण के आरोप में 16 महीने बाद एफआईआर,तत्कालीन तहसीलदार पर कानून का शिकंजा
लगातार उठते रहे सवाल,16 महीने बाद दर्ज हुई एफआईआर… तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर पर आपराधिक जांच शुरू
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,05 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। लगभग 16 महीने तक शिकायत,जनसुनवाई, विभागीय जांच,समाचारों की श्रृंखला और प्रशासनिक इंतजार के बाद आखिरकार सूरजपुर जिले के तत्कालीन भैयाथान तहसीलदार संजय कुमार राठौर के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज हो गया है,थाना झिलमिली में दर्ज एफआईआर क्रमांक 0185/2026 केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं है,बल्कि उस पूरे घटनाक्रम का अगला चरण है जिसकी शुरुआत वर्ष 2025 में हुई थी। उस समय एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसे जीवित रहते हुए सरकारी अभिलेखों में मृत दर्शाकर उसकी कृषि भूमि का नामांतरण कर दिया गया, कथित रूप से फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार किया गया और बाद में उसी भूमि का विक्रय भी कर दिया गया,इस शिकायत ने राजस्व विभाग, प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे,इसी दौरान दैनिक घटती-घटना ने इस पूरे मामले को लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया। समाचार-पत्र ने केवल एक शिकायत प्रकाशित कर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानी, बल्कि कई महीनों तक अलग-अलग तथ्यों,दस्तावेजों और शिकायतों के आधार पर लगातार सवाल उठाए कि आखिर शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? क्या किसी जीवित व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर भूमि का नामांतरण संभव है? यदि नहीं,तो यह कैसे हुआ? यदि हुआ, तो जिम्मेदार कौन है? आज लगभग 16 महीने बाद जब इसी मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है,तब यह मामला फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।
पत्नी के नाम जमीन खरीदने का मामला भी बना चर्चा का विषय-इसी बीच संजय राठौर से जुड़ा एक और विवाद सामने आया, शिकायतों में आरोप लगाया गया कि एक विवादित भूमि प्रकरण के निराकरण के बाद उन्होंने अपनी पत्नी के नाम जमीन खरीदी, इसी विषय पर दैनिक घटती-घटना ने विस्तृत समाचार प्रकाशित करते हुए सवाल उठाया था कि क्या कोई अधिकारी जिस क्षेत्र में विवादों का निराकरण कर रहा हो, उसी क्षेत्र में उसके परिवार द्वारा भूमि खरीदे जाने की स्वतंत्र जांच नहीं होनी चाहिए? समाचार पत्र ने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि ऐसा हुआ है तो क्या इससे हितों के टकराव की स्थिति बनती है? यह मामला भी विभागीय जांच का हिस्सा बना।
लगातार प्रकाशित हुई थीं खोजी खबरें-दैनिक घटती-घटना ने इस पूरे प्रकरण में कई प्रमुख समाचार प्रकाशित किए,जिनमें प्रमुख थे—तहसीलदार पर लगे गंभीर आरोप,क्या कलेक्टर सूरजपुर उन्हें तहसील कार्यालय से पृथक कर जांच करवाएंगे? क्या तहसीलदार संजय राठौर किसी के मामले का निराकरण कर प्रतिफल स्वरूप अपनी पत्नी के नाम जमीन खरीदते हैं? 25 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं, जनदर्शन शिकायत पर प्रशासन खामोश क्यों? भैयाथान तहसीलदार मामले में दैनिक घटती-घटना की खबर का बड़ा असर, संभागायुक्त ने किया निलंबित, इन समाचारों के माध्यम से लगातार प्रशासन का ध्यान इस प्रकरण की ओर आकर्षित किया गया।
एफआईआर में किन-किन लोगों के नाम-दर्ज एफआईआर के अनुसार तत्कालीन तहसीलदार संजय कुमार राठौर के साथ अन्य व्यक्तियों को भी आरोपित बनाया गया है, पुलिस अब सभी आरोपितों की भूमिका की जांच करेगी।
अब किन बिंदुओं पर होगी पुलिस जांच? पुलिस विवेचना के दौरान निम्न प्रमुख बिंदुओं की जांच करेगी—
मृत्यु प्रमाण पत्र वास्तविक था या कथित रूप से फर्जी?
प्रमाण पत्र किसने जारी किया?
नामांतरण आदेश किन दस्तावेजों के आधार पर पारित हुआ?
दस्तावेजों का सत्यापन हुआ था या नहीं?
भूमि विक्रय की प्रक्रिया वैधानिक थी या नहीं?
राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन किस स्तर पर किया गया?
क्या पूरी प्रक्रिया में आपराधिक षड्यंत्र था?
सबसे बड़ा सवाल—16 महीने क्यों लगे?-इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि शिकायतें वर्ष 2025 में सामने आ गई थीं,विभागीय जांच भी शुरू हो गई थी, निलंबन भी हो गया था और समाचार लगातार प्रकाशित हो रहे थे,तो एफआईआर दर्ज होने में लगभग 16 महीने क्यों लग गए? क्या दस्तावेजों के सत्यापन में समय लगा? क्या विभागीय जांच पूरी होने की प्रतीक्षा की गई? क्या पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य बाद में मिले? या फिर प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने में देरी हुई? इन प्रश्नों का उत्तर फिलहाल आधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
अब विभागीय जांच का क्या होगा?- एफआईआर दर्ज होने के बाद अब विभागीय जांच भी महत्वपूर्ण हो गई है,यदि पुलिस विवेचना में आरोप पुष्ट होते हैं तो विभागीय कार्रवाई का स्वरूप भी बदल सकता है, प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा है कि अब लंबित विभागीय जांच को शीघ्र पूरा किया जाना चाहिए।
राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्न-यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं बल्कि पूरी राजस्व व्यवस्था का भी परीक्षण है,यदि किसी जीवित महिला को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दर्शाकर नामांतरण संभव हुआ,तो यह जांच का विषय है कि—राजस्व रिकॉर्ड का सत्यापन कैसे हुआ? तहसील स्तर पर दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं हुई? पंजीयन कार्यालय ने किन दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्री की? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था में बदलाव होगा?
2025 में शुरू हुआ था पूरा घटनाक्रम
वर्ष 2025 में तत्कालीन भैयाथान तहसीलदार संजय राठौर के विरुद्ध पहली बार शिकायत सामने आई, शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि वह पूरी तरह जीवित हैं, लेकिन राजस्व अभिलेखों में उन्हें मृत दर्शाकर उनकी कृषि भूमि का नामांतरण कर दिया गया,शिकायत के अनुसार कथित रूप से फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया, उसी के आधार पर नामांतरण आदेश पारित हुआ और बाद में भूमि का पंजीकृत विक्रय भी कर दिया गया, यह आरोप सामने आने के बाद मामला केवल एक निजी भूमि विवाद नहीं रह गया,बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन गया।
जब अधिकांश लोग चुप थे,तब लगातार सवाल उठा रहा था ‘दैनिक घटती-घटना’
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि जब शिकायत केवल फाइलों में सीमित थी, तब दैनिक घटती-घटना ने लगातार इस विषय को प्रमुखता से प्रकाशित किया,समाचार पत्र ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए क्या तहसीलदार कार्यालय में बिना सत्यापन के नामांतरण हो सकता है? यदि महिला जीवित थी तो मृत्यु प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी हुआ? नामांतरण से पहले स्थानीय जांच हुई थी या नहीं? क्या शिकायतों को जानबूझकर दबाया जा रहा है? क्या संबंधित अधिकारी को बचाने का प्रयास किया जा रहा है? समाचारों के माध्यम से यह भी मांग की गई कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
विभागीय जांच हुई,निलंबन भी हुआ
लगातार शिकायतों और समाचारों के बाद सरगुजा संभाग स्तर पर विभागीय जांच प्रारंभ हुई, प्राथमिक जांच में कुछ आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर पाए जाने के बाद तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर को निलंबित किया गया,यह कार्रवाई इस बात का संकेत थी कि प्रशासन ने शिकायतों को गंभीर माना, हालांकि विभागीय जांच अभी भी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है।
फिर कोरिया जिले में हुई पदस्थापना
निलंबन के बाद संजय राठौर की पुनः पदस्थापना की गई और बाद में उनका स्थानांतरण कोरिया जिले की बचरापोड़ी तहसील में कर दिया गया,इस दौरान शिकायतकर्ता लगातार पुलिस कार्रवाई की मांग करती रहीं, सवाल यह भी उठता रहा कि यदि विभागीय जांच हो चुकी है और अधिकारी पर कार्रवाई भी हुई है,तो आपराधिक मामला दर्ज होने में इतनी देरी क्यों हुई?
16 महीने बाद अब दर्ज हुई एफआईआर
आखिरकार 03 अगस्त 2026 को झिलमिली थाना में एफआईआर क्रमांक 0185/2026 दर्ज कर ली गई,एफआईआर के अनुसार तत्कालीन तहसीलदार संजय कुमार राठौर सहित अन्य आरोपितों के विरुद्ध बीएनएस की कई धाराओं में अपराध दर्ज किया गया है,एफआईआर में कथित रूप से आरोप लगाया गया है कि जीवित महिला को मृत दर्शाया गया,कथित फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया,उसी के आधार पर नामांतरण कराया गया,बाद में भूमि का विक्रय किया गया, पूरी प्रक्रिया कथित रूप से सुनियोजित तरीके से संपन्न हुई।
क्या ‘घटती-घटना’ की पड़ताल सही दिशा में थी?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित प्रत्येक आरोप सही सिद्ध हो गया है,क्योंकि इसकी पुष्टि न्यायालय और जांच एजेंसियां करेंगी, लेकिन यह तथ्य जरूर सामने है कि जिन शिकायतों और आरोपों को लेकर वर्ष 2025 से लगातार समाचार प्रकाशित किए गए, उसी प्रकरण में अब पुलिस ने औपचारिक रूप से एफआईआर दर्ज कर आपराधिक जांच शुरू कर दी है, इससे खोजी पत्रकारिता की भूमिका और सार्वजनिक शिकायतों को लगातार सामने लाने के महत्व पर भी चर्चा तेज हो गई है।
अब आगे क्या होगा?
अब पुलिस सभी दस्तावेजों का परीक्षण करेगी,गवाहों के बयान दर्ज करेगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी,यदि जांच में पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया जाएगा,यदि आरोप सिद्ध नहीं होते हैं तो जांच एजेंसी अपनी अंतिम रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी, इसी के साथ विभागीय जांच भी अपने अंतिम चरण में पहुंच सकती है।
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