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बैकुण्ठपुर/कोरिया@ 24 साल की प्रतिनियुक्ति का अंत कब? आजीवन व्यवस्था बनी तो ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?

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  • 12 दस्तावेजी खुलासे…24 साल की प्रतिनियुक्ति…फिर भी शासन मौन! आखिर ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
  • प्रतिनियुक्ति या स्थायी विरासत?
  • आजीवन व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
  • कलेक्टर बदलते रहे…सरकारें बदलती रहीं…लेकिन प्रतिनियुक्ति नहीं टूटी,आखिर ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
  • 12 दस्तावेजी खुलासों के बाद भी शासन मौन, सवाल बरकरार—खबरें गलत थीं तो खंडन क्यों नहीं? सही थीं तो जांच और कार्रवाई कब?
  • 12 दस्तावेजी खुलासे…24 साल की प्रतिनियुक्ति…फिर भी शासन मौन! आखिर यह चुप्पी किसकी हिफाजत कर रही है?
  • दूध का दूध,पानी का पानी’ कब होगा? खबरें गलत थीं तो खंडन क्यों नहीं? सही थीं तो जांच और कार्रवाई क्यों नहीं?

-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर/कोरिया,02 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
कहावत है- ‘सांच को आंच नहीं’। यदि कोई आरोप या सवाल निराधार है तो उसका सबसे सशक्त उत्तर तथ्यों और दस्तावेजों के साथ दिया जाता है,लेकिन यदि सवाल लगातार उठते रहें, दस्तावेज सामने आते रहें और शासन-प्रशासन की ओर से केवल सन्नाटा सुनाई दे,तो स्वाभाविक है कि सवाल और गहरे होते चले जाएं। कोरिया कलेक्टरेट का चर्चित स्टेनो टू कलेक्टर प्रतिनियुक्ति प्रकरण अब किसी एक कर्मचारी की सेवा यात्रा का मामला भर नहीं रह गया है। यह मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही, सेवा नियमों की विश्वसनीयता, प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की पारदर्शिता और शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है, दैनिक घटती-घटना इस पूरे मामले पर लगातार 12 दस्तावेज आधारित समाचार प्रकाशित कर चुका है ये 13 वां समाचार प्रकाशित हो रहा है, इन समाचारों में प्रतिनियुक्ति आदेश, मत्स्य महासंघ के पत्र,सेवा पुस्तिका,वेतन निर्धारण, सेवा निरंतरता, संविलियन के प्रयास,विभागीय पत्राचार तथा अन्य प्रशासनिक अभिलेखों के आधार पर कई गंभीर प्रश्न उठाए गए, लेकिन इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद भी न तो किसी तथ्य का विस्तृत आधिकारिक खंडन सामने आया,न सार्वजनिक रूप से किसी जांच की जानकारी दी गई और न ही संबंधित विभागों ने क्रमवार स्थिति स्पष्ट की,अब सवाल किसी व्यक्ति पर नहीं,बल्कि शासन की प्रतिक्रिया पर खड़ा हो गया है।
आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
कोरिया जिले में वर्षों से चर्चा का विषय बनी यह प्रतिनियुक्ति आखिर कब समाप्त होगी? क्या यह प्रतिनियुक्ति भी एक दिन अपने नियमानुसार समाप्त होकर संबंधित कर्मचारी की मूल विभाग में वापसी के साथ खत्म होगी,या फिर इसे प्रशासनिक इतिहास में ‘आजीवन प्रतिनियुक्ति’ के एक नए मॉडल के रूप में दर्ज किया जाएगा? उपलब्ध दस्तावेजों और वर्षों से उठ रहे सवालों के बीच अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि प्रतिनियुक्ति एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है, तो इसका स्वाभाविक अंत कब होगा? क्या संबंधित विभाग स्वयं इसे समाप्त कर कर्मचारी को उसके मूल विभाग में वापस भेजेगा,या यह व्यवस्था बिना किसी स्पष्ट निर्णय के अनिश्चितकाल तक चलती रहेगी? प्रशासनिक गलियारों में अब व्यंग्य के साथ यह चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि ‘आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील आखिर कौन ठोकेगा?’ क्या यह कील सेवा नियम ठोकेंगे, सक्षम प्राधिकारी ठोकेंगे,विभागीय समीक्षा ठोकेगी, या फिर यह प्रतिनियुक्ति कभी समाप्त ही नहीं होगी और प्रशासनिक फाइलों में हमेशा के लिए बंद होकर रह जाएगी? लोकतंत्र में किसी भी प्रतिनियुक्ति का उद्देश्य व्यवस्था को चलाना होता है,न कि उसे स्थायी परंपरा बना देना। इसलिए अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या वर्षों से चल रही इस व्यवस्था का नियमानुसार समापन होगा और यदि होगा,तो वह निर्णय आखिर कौन करेगा? यही प्रश्न आज पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल बनकर सामने खड़ा है।
मत्स्य विभाग का कर्मचारी…लेकिन पहचान राजस्व विभाग की-उपलब्ध दस्तावेजों से यह प्रश्न उठता है कि संबंधित कर्मचारी का मूल संबंध मत्स्य विभाग/मत्स्य महासंघ से रहा, इसके बावजूद वर्षों तक वह कलेक्टर कार्यालय में स्टेनो टू कलेक्टर के रूप में कार्यरत रहे, अब कई प्रशासनिक प्रश्न सामने हैं—यदि मूल विभाग मत्स्य था, तो राजस्व विभाग में इतनी लंबी अवधि तक सेवा किस नियम के तहत जारी रही? यदि संविलियन हुआ,तो उसका स्पष्ट आदेश कहां है? यदि संविलियन नहीं हुआ, तो प्रतिनियुक्ति समाप्त क्यों नहीं हुई? यदि प्रतिनियुक्ति जारी रही, तो उसका समय-समय पर नवीनीकरण किन आदेशों से हुआ? इन प्रश्नों का उत्तर केवल सक्षम विभाग ही दे सकता है।
जब शासन मौन हो जाए…तो सवाल और बुलंद हो जाते हैं…
लोकतंत्र में पत्रकारिता का दायित्व प्रश्न पूछना है और शासन का दायित्व तथ्यों के आधार पर उत्तर देना,यदि कोई समाचार तथ्यात्मक रूप से गलत है तो उसका खंडन करना शासन के लिए कठिन नहीं होता,यदि किसी मामले में प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता हो,तो जांच की घोषणा भी की जा सकती है, लेकिन इस प्रकरण में लगातार बारह समाचार प्रकाशित होने के बाद भी सार्वजनिक स्तर पर न खंडन सामने आया,न जांच की स्थिति स्पष्ट हुई और न ही रिकॉर्ड के आधार पर उठे प्रश्नों का बिंदुवार उत्तर दिया गया,यह स्थिति स्वाभाविक रूप से जनचर्चा को जन्म देती है, लोग पूछ रहे हैं क्या खबरें गलत थीं? यदि गलत थीं तो आधिकारिक खंडन क्यों नहीं? यदि सही थीं तो जांच क्यों नहीं? यदि जांच हुई तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का आधार है।
प्रतिनियुक्ति या आजीवन व्यवस्था?
सरकारी सेवा नियमों में प्रतिनियुक्ति को अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था माना गया है,सामान्यतः इसकी अवधि तीन वर्ष होती है और विशेष परिस्थितियों में इसे सीमित अवधि तक बढ़ाया जा सकता है,लेकिन इस पूरे प्रकरण में चर्चा तीन या पांच वर्ष की नहीं, बल्कि लगभग 24 वर्षों की हो रही है,यहीं से व्यंग्य जन्म लेता है, जिले में लोग कहते हैं- यह प्रतिनियुक्ति नहीं,स्थायी पता बन गई है, तो कोई मुस्कुराते हुए कहता है ‘लगता है इस कुर्सी पर फेविकोल की ऐसी परत चढ़ी है कि समय भी उसे अलग नहीं कर पाया ‘,ये टिप्पणियां तथ्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक चुप्पी के बीच विकसित हुई जनचर्चा का हिस्सा हैं।
कलेक्टर बदलते रहे…लेकिन व्यवस्था नहीं बदली
पिछले दो दशकों में कोरिया जिले में अनेक कलेक्टर आए और गए,शासन बदला, प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदलीं, लेकिन जिस व्यवस्था पर आज सवाल उठ रहे हैं,वह लगातार बनी रही,यही कारण है कि कर्मचारियों के बीच व्यंग्य में कहा जाने लगा— ‘कलेक्टर का तबादला सरकारी प्रक्रिया है, लेकिन स्टेनो की कुर्सी शायद स्थायी धरोहर है ‘,यह व्यंग्य इस बात का संकेत है कि लंबे समय तक किसी व्यवस्था पर उठते सवालों का उत्तर न मिले,तो सार्वजनिक धारणाएं बनना स्वाभाविक है।
सेवा पुस्तिका ने खोल दी पुरानी फाइल
जब मत्स्य महासंघ ने सेवा पुस्तिका और सेवा निरंतरता प्रमाण-पत्र की मांग की, तब यह पूरा मामला एक बार फिर चर्चा में आया, यहीं से प्रश्न उठा यदि कर्मचारी वर्षों से दूसरे विभाग में कार्यरत था, तो सेवा पुस्तिका का नियमित संधारण किसने किया? वार्षिक सत्यापन किस विभाग ने किया? क्या सभी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हुईं?
संविलियन हुआ या केवल प्रयास?
दस्तावेज संकेत देते हैं कि राजस्व विभाग में संविलियन की दिशा में प्रयास हुए थे, लेकिन आज भी स्पष्ट प्रश्न मौजूद है यदि संविलियन हुआ तो आदेश कहां है? यदि नहीं हुआ, तो प्रतिनियुक्ति समाप्त क्यों नहीं हुई?
‘फेविकोल मॉडल’ की चर्चा क्यों?
जिले में अब यह पूरा प्रकरण व्यंग्य का विषय भी बन गया है, कुछ लोग कहते हैं की यह प्रतिनियुक्ति नहीं, फेविकोल मॉडल है, एक बार कुर्सी मिली तो फिर वर्षों तक कोई हिला नहीं सकता, यह व्यंग्य प्रशासनिक चुप्पी से उपजी जनभावना का प्रतीक है, न कि किसी तथ्य का निष्कर्ष।
व्यवस्था कर्मचारी के लिए या कर्मचारी व्यवस्था के लिए?
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति का नहीं रह गया है, यह उन हजारों कर्मचारियों का भी प्रश्न है जो नियमों के अनुसार प्रतिनियुक्ति पर जाते हैं और समय पूरा होने पर अपने मूल विभाग लौट आते हैं, यदि किसी मामले में अलग व्यवस्था अपनाई गई, तो उसका आधार भी सार्वजनिक होना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में न्याय तभी दिखाई देता है जब नियम सभी पर समान रूप से लागू होते दिखाई दें।
आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
अब इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है, क्या शासन स्वयं सामने आकर इस पूरे मामले का तथ्यात्मक उत्तर देगा? क्या संबंधित विभाग उपलब्ध दस्तावेजों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे? क्या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा पूरे प्रकरण की प्रशासनिक समीक्षा होगी? या फिर यह मामला भी वर्षों तक फाइलों में दबा रह जाएगा? कहावत है की सच को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता, लोकतंत्र में सवाल पूछना पत्रकारिता का दायित्व है और उत्तर देना शासन की जिम्मेदारी, अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या कोरिया का यह चर्चित प्रतिनियुक्ति प्रकरण केवल एक कर्मचारी की सेवा कहानी बनकर रह जाएगा, या फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की ऐसी मिसाल बनेगा, जहां ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ वास्तव में होकर रहेगा, और अंत में वही प्रश्न, जो अब पूरे प्रकरण का केंद्रीय प्रश्न बन चुका है—आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील आखिर कौन ठोकेगा?


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