- सावन में शिवभक्ति का महासंगम प्राकृतिक गुफाओं,पर्वत शिखरों और प्राचीन शिवधामों में उमड़ रही आस्था
- घने जंगल, ऊंचे पर्वत और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष…शिवमय
- होगा पूरा वनांचल
- नीलकंठ, जटाशंकर, सीतामढ़ी और हसदेवेश्वर धाम में उमड़े श्रद्धालु
- जहां प्रकृति भी करती है शिव की आराधना…श्रावण मास में नीलकंठ, जटाशंकर,सीतामढ़ी और
- विहंगम वादियों में विराजे नीलकंठ महादेव, हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजे प्राचीन शिवधाम,सीतामढ़ी से सिद्ध बाबा तक उमड़ा आस्था का सैलाब
राजन पाण्डेय
सोनहत/कोरिया,02 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। देवों के देव महादेव की आराधना का सबसे पावन महीना श्रावण मास प्रारंभ होते ही कोरिया और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) अंचल का पूरा वनांचल शिवमय हो उठा है, घने साल और सागौन के जंगल,बादलों को छूती पर्वत श्रृंखलाएं,कल-कल बहती जलधाराएं और प्रकृति की गोद में बसे प्राचीन शिवधाम इन दिनों श्रद्धा और आस्था के अद्भुत संगम के साक्षी बन रहे हैं,‘हर-हर महादेव ‘,‘बोल बम’ और‘? नमः शिवाय’ के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो गया है,श्रावण मास के प्रथम दिन से ही हजारों श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल भरकर भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए विभिन्न शिवधामों की ओर पैदल यात्रा कर रहे हैं,कोरिया रियासतकालीन इतिहास, रामायणकालीन मान्यताओं और प्राकृतिक गुफाओं में विराजमान स्वयंभू शिवलिंगों के कारण यह पूरा क्षेत्र धार्मिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।
सावन का महत्व : शिव आराधना का सबसे पवित्र काल- सनातन परंपरा में श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित माना जाता है, मान्यता है कि इसी महीने भगवान शिव की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है, प्रत्येक सोमवार को विशेष पूजा-अर्चना,रुद्राभिषेक और जलाभिषेक का विशेष महत्व होता है, कोरिया और एमसीबी जिले के प्राचीन शिवधामों में इस दौरान हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के अनूपपुर,शहडोल,सीधी,उमरिया और आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
नीलकंठ महादेवः बादलों के बीच शिव का अद्भुत धाम- यदि प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम देखना हो तो नीलकंठ महादेव से बेहतर स्थान शायद ही कोई हो, सोनहत मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान की पर्वत श्रृंखलाओं के सर्वोच्च शिखर पर स्थित यह प्राचीन शिवधाम श्रद्धालुओं के लिए किसी तपोभूमि से कम नहीं है, ऊंची पहाड़ी पर पहुंचने के लिए कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, लेकिन जैसे ही श्रद्धालु शिखर पर पहुंचते हैं, चारों ओर फैली हरियाली, बादलों से ढकी पर्वत श्रृंखलाएं और दूर-दूर तक फैला वनांचल मन को अलौकिक शांति से भर देता है, सावन में यहां स्थानीय समितियों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए भोजन, पेयजल और विश्राम की विशेष व्यवस्था की जाती है।
शिवगुफा,शिवघाट और देवगढ़ : जहां इतिहास भी बोलता है-ग्राम कछार स्थित शिवगुफा एवं शिवघाट प्राकृतिक शिव साधना के प्राचीन केंद्र हैं,श्रद्धालु हसदो नदी से जल भरकर प्राकृतिक गुफा में स्थापित शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं,वहीं देवगढ़ (चामट पहाड़) में लगभग दो दशक पहले वन विभाग की खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियां और मंदिर के अवशेष मिले थे,इसके बाद यहां ग्रामीणों ने बाबा चौरसिया की स्थापना कर मंदिर का निर्माण कराया। आज यह भी सावन में श्रद्धालुओं का प्रमुख आस्था केंद्र बन चुका है।
रामायणकालीन मान्यता से जुड़ा घघरा शिव मंदिर-भरतपुर विकासखंड के घघरा गांव स्थित शिव मंदिर को लेकर स्थानीय मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास काल में यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। यही कारण है कि इस मंदिर का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
कांवड़ यात्रा से गूंज रहे जंगलों के रास्ते- सावन के दौरान श्रद्धालु नदियों, झरनों और पवित्र जलस्रोतों से जल भरकर कई किलोमीटर पैदल यात्रा करते हैं,रास्ते भर ‘बोल बम ‘,‘हर-हर महादेव’ और‘? नमः शिवाय’ के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह सेवा शिविर लगाए गए हैं,जहां श्रद्धालुओं के लिए पेयजल,चिकित्सा,प्रसाद और विश्राम की व्यवस्था की गई है।
प्राकृतिक पर्यटन को भी मिल रही नई पहचान-धार्मिक महत्व के साथ-साथ ये सभी स्थल प्राकृतिक पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं,नीलकंठ महादेव की पहाडि़यां, सीतामढ़ी और जटाशंकर की गुफाएं, हसदो नदी का उद्गम,सिद्ध बाबा की पहाड़ी और देवगढ़ की ऐतिहासिक धरोहरें हर वर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करती हैं,यदि इन स्थलों का योजनाबद्ध विकास किया जाए तो कोरिया और एमसीबी जिला धार्मिक पर्यटन के राष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना सकता है।
श्रद्धालुओं के लिए प्रशासन की अपील
प्रशासन और मंदिर समितियों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि दर्शन के दौरान स्वच्छता बनाए रखें,प्लास्टिक का उपयोग न करें, जंगलों में आग से बचाव करें तथा निर्धारित मार्गों का ही उपयोग करें,ताकि धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक धरोहर भी सुरक्षित रह सके।
शिव केवल आराध्य
नहीं, जीवन का दर्शन हैं…
श्रावण मास केवल पूजा-पाठ और जलाभिषेक का पर्व नहीं है, यह आत्मसंयम, सेवा, करुणा, त्याग और लोककल्याण का संदेश देने वाला आध्यात्मिक महापर्व है, भगवान शिव का नीलकंठ स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन की विषमताओं और कटु अनुभवों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करते हुए भी समाज के लिए सकारात्मक बने रहना ही सच्चा शिवत्व है, उनका त्रिशूल संतुलन और न्याय का, डमरू सृजन का, जटाओं से बहती गंगा पवित्रता का और नंदी अटूट श्रद्धा एवं सेवा का प्रतीक है, सावन हमें केवल मंदिरों तक नहीं बुलाता, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता का त्याग कर सत्य, सादगी, सद्भाव और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है, कोरिया और एमसीबी का यह वनांचल हर सावन में केवल ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से ही नहीं गूंजता, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, इतिहास और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय का जीवंत उदाहरण बनकर श्रद्धालुओं को जीवन का गहरा संदेश भी देता है।
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सीतामढ़ी धाम : जहां गुफा के गर्भ में विराजमान हैं स्वयंभू महादेव
सोनहत विकासखंड के समीप घने जंगलों के बीच स्थित सीतामढ़ी धाम पूरे क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है, कोरिया रियासतकाल में खोजे गए इस पवित्र स्थल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशाल प्राकृतिक गुफा है, गुफा के भीतर स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को अत्यंत संकरे मार्ग से घुटनों के बल रेंगकर जाना पड़ता है, भीतर पहुंचते ही प्राकृतिक चट्टानों के बीच टिमटिमाते दीपक और जल की बूंदों से निर्मित वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है, स्थानीय मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना भगवान भोलेनाथ अवश्य पूरी करते हैं, सावन में यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।
जटाशंकर धाम : कठिन रास्ता,लेकिन अटूट श्रद्धा
घनघोर जंगलों के बीच स्थित जटाशंकर धाम अपनी प्राकृतिक गुफा और दुर्गम यात्रा के लिए प्रसिद्ध है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है,करीब 21 हाथ लंबी संकरी प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थापित शिवलिंग तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु घुटनों के बल आगे बढ़ते हैं,वर्षों से यहां संत रामेश्वर प्रसाद दास बाबा एकांत साधना कर रहे हैं, उनका आश्रम भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है,सावन के दौरान यहां दिनभर ‘बोल बम’ के जयघोष गूंजते रहते हैं और श्रद्धालु प्राकृतिक जलधाराओं का जल चढ़ाकर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
हसदेवेश्वर महादेवः जहां से निकलती है जीवनदायिनी हसदो नदी
सोनहत विकासखंड के मेंड्रा गांव में स्थित हसदेवेश्वर महादेव मंदिर धार्मिक और प्राकृतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है,यह मंदिर हसदो नदी के उद्गम स्थल के सामने स्थित है, पूर्व सांसद एवं पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. चरण दास महंत के प्रयासों से निर्मित यह भव्य मंदिर अब पूरे क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है,श्रद्धालु हसदो नदी के उद्गम से जल भरकर भगवान हसदेवेश्वर का जलाभिषेक करते हैं, पूरे सावन माह यहां रुद्राभिषेक,महामृत्युंजय जाप,भजन-कीर्तन और विशाल भंडारों का आयोजन होता है।
सिद्ध बाबा पहाड़ : आस्था और पर्यटन का उभरता केंद्र
राष्ट्रीय राजमार्ग-43 से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित सिद्ध बाबा पहाड़ प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महत्व का अनूठा संगम है,पहाड़ी की चोटी पर स्थित प्राचीन शिवलिंग वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है,यहां वर्तमान में केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर विशाल शिव मंदिर का निर्माण तेजी से चल रहा है,स्थानीय लोगों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह स्थल छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में अपनी अलग पहचान बनाएगा।
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