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कोरिया/रामानुजगंज/बिलासपुर@क्या लापरवाही बन गई कार्यशैली? हाईकोर्ट की नाराजगी,सत्र न्यायालय का जुर्माना और स्थानांतरण के बाद भी कोरिया में मौजूदगी पर सवाल

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  • एक विवेचक…दो न्यायालय…और कई अनुत्तरित सवालों के घेरे में विनोद पासवान
  • हाईकोर्ट ने डीजीपी से मांगा जवाब,सत्र न्यायालय ने लगाया जुर्माना,स्थानांतरण के बाद भी कोरिया में मौजूदगी पर चर्चा
  • न्यायालयों की नाराजगी के केंद्र में एक ही विवेचक, हाईकोर्ट की सख्ती,सत्र न्यायालय का अर्थदंड और फिर भी नहीं छोड़ा कोरिया जिला
  • गवाही में गैरहाजिरी,न्यायालय की फटकार और स्थानांतरण के बाद भी डटे निरीक्षक,विनोद पासवान पर उठे कई सवाल, जवाब का इंतजार
  • कोर्ट की फटकार से स्थानांतरण तक…आखिर क्यों चर्चा में हैं निरीक्षक विनोद पासवान?
  • कोरिया से नारायणपुर तबादला,फिर भी नहीं छोड़ा जिला!

-न्यूज डेस्क-
कोरिया/रामानुजगंज/बिलासपुर,02 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। पुलिस विभाग में विवेचक (जांच अधिकारी) की भूमिका किसी भी आपराधिक मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है,एक विवेचक की सक्रियता और समयबद्ध कार्यवाही से न केवल अपराध की जांच प्रभावित होती है, बल्कि न्यायालय में मुकदमे के निष्पादन की गति भी उसी पर निर्भर करती है,लेकिन जब एक ही अधिकारी का नाम बार-बार न्यायालय की नाराजगी, लंबित गवाही,प्रशासनिक सवालों और चर्चित मामलों से जुड़ने लगे,तब मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। कोरिया जिले में पदस्थ रहे निरीक्षक विनोद पासवान इन दिनों ठीक ऐसे ही कारणों से चर्चा में हैं,बीते कुछ दिनों के भीतर दो अलग-अलग न्यायालयों की टिप्पणियों ने उनकी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं, एक ओर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को एनडीपीएस के एक मामले में विवेचक की अनुपस्थिति पर सीधे पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से व्यक्तिगत शपथपत्र तलब करना पड़ा, वहीं दूसरी ओर रामानुजगंज सत्र न्यायालय ने लगातार गवाही के लिए अनुपस्थित रहने और न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने पर उनके विरुद्ध 500 रुपये का अर्थदंड लगाया,अब इन दोनों घटनाक्रमों के बीच उनका स्थानांतरण और उसके बाद भी कोरिया जिले में बने रहने की चर्चा ने कई नए सवाल पैदा कर दिए हैं।
अब स्थानांतरण पर भी उठ रहे सवाल- इसी बीच पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश में क्रमांक 51 पर निरीक्षक विनोद पासवान का जिला कोरिया से जिला नारायणपुर स्थानांतरण किया गया है,कार्यालयीन सूत्रों के अनुसार उन्हें 11 जुलाई 2026 को कोरिया जिले से कार्यमुक्त (रिलीव) भी कर दिया गया था, हालांकि इस संबंध में रिलीविंग आदेश की प्रति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हो सकी है और पुलिस विभाग की ओर से भी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, यदि सूत्रों की जानकारी सही है,तो कई प्रशासनिक प्रश्न खड़े होते हैं कार्यमुक्त होने के बाद भी वे कोरिया जिले में किस आदेश के तहत कार्य कर रहे हैं? क्या उन्हें किसी विशेष विवेचना के लिए रोका गया है? यदि हां,तो क्या इसका कोई लिखित आदेश है? यदि नहीं, तो स्थानांतरण आदेश का पालन अब तक क्यों नहीं हुआ?
क्या सीबीआई जांच वजह है?- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि वे कुछ महत्वपूर्ण मामलों के कारण अभी भी कोरिया में हैं, हालांकि इस संबंध में न तो सीबीआई और न ही पुलिस विभाग की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि की गई है,इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी जांच एजेंसी का कार्य किसी एक अधिकारी पर निर्भर है,यदि वास्तव में किसी प्रशासनिक या जांच संबंधी कारण से उन्हें रोका गया है,तो इसका आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि अनावश्यक अटकलों पर विराम लग सके।
दो न्यायालयों की टिप्पणी,एक अधिकारी पर बढ़ते सवाल- महज कुछ दिनों के भीतर दो अलग-अलग न्यायालयों की कार्यवाही ने एक ही अधिकारी की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं,एक मामले में हाईकोर्ट को डीजीपी से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगना पड़ा, दूसरे मामले में सत्र न्यायालय ने अर्थदंड लगाकर वेतन से राशि काटने का आदेश दिया,इन दोनों घटनाओं ने पुलिस विभाग में विवेचकों की जवाबदेही और न्यायालय के प्रति उत्तरदायित्व पर नई बहस छेड़ दी है।
सबसे बड़ा सवाल पुलिस विभाग से- यदि एक अधिकारी के संबंध में न्यायालय को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े,गवाही के लिए अनुपस्थिति पर डीजीपी से जवाब मांगना पड़े, दूसरे न्यायालय को आर्थिक दंड लगाना पड़े,और स्थानांतरण के बाद भी उसकी मौजूदगी पर सवाल उठने लगें,तो यह केवल व्यक्तिगत कार्यशैली का मामला नहीं रह जाता,यह प्रशासनिक निगरानी, जवाबदेही और अनुशासन की व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़ा करता है,अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस मुख्यालय और कोरिया पुलिस इन घटनाक्रमों को केवल एक सामान्य प्रशासनिक प्रकरण मानते हैं या फिर पूरे मामले की विभागीय समीक्षा कर यह स्पष्ट करते हैं कि न्यायालयों की टिप्पणियों के बाद क्या जवाबदेही तय की गई और स्थानांतरण आदेश के बावजूद संबंधित अधिकारी की वर्तमान स्थिति क्या है।
पहला मामला : विवेचक नहीं पहुंचे तो हाईकोर्ट ने डीजीपी से मांगा जवाब
कोरिया जिले के पटना थाना में दर्ज एनडीपीएस एक्ट के एक प्रकरण में आरोपी अभिषेक सारथी उर्फ बाबू सितंबर 2024 से जेल में बंद है। मुकदमे की सुनवाई अंतिम चरण में पहुंच चुकी थी, अभियोजन के 13 गवाहों में से 12 के बयान दर्ज हो चुके थे, लेकिन विवेचक का बयान शेष था। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि विवेचक ट्रायल कोर्ट में उपस्थित नहीं हो रहे थे, जिससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही थी, मामले को गंभीर मानते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 28 जुलाई 2026 को डीजीपी से व्यक्तिगत शपथपत्र तलब किया, इसके बाद पुलिस अधीक्षक, कोरिया द्वारा संबंधित विवेचक से स्पष्टीकरण मांगा गया और 29 जुलाई को उन्हें ट्रायल कोर्ट में प्रस्तुत कर उनका बयान दर्ज कराया गया, हालांकि हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि आरोपी से बरामद मादक पदार्थ व्यावसायिक मात्रा से अधिक है, लेकिन आदेश में विवेचक की अनुपस्थिति और उसके बाद हुई कार्रवाई स्पष्ट रूप से दर्ज है।
दूसरा मामला : सत्र न्यायालय ने लगाया अर्थदंड
हाईकोर्ट का मामला अभी चर्चा में ही था कि रामानुजगंज सत्र न्यायालय ने भी निरीक्षक विनोद पासवान के खिलाफ सख्त आदेश पारित कर दिया, सत्र न्यायाधीश हेमंत सराफ ने एम.जे.सी. (क्रि.) क्रमांक 41/2026 में पाया कि विभिन्न सत्र प्रकरणों में समन,जमानतीय वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद संबंधित अधिकारी गवाही के लिए न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए, तत्कालीन उपनिरीक्षक विनोद पासवान ने न्यायालय में उपस्थित होकर यह स्पष्टीकरण दिया कि वे थाना सोनहत के एक मामले की विवेचना तथा सीबीआई को केस डायरी सौंपने की प्रक्रिया में व्यस्त थे और इसी कारण न्यायालय नहीं पहुंच सके। उन्होंने अपनी त्रुटि के लिए क्षमा भी मांगी,लेकिन न्यायालय ने यह स्पष्टीकरण स्वीकार नहीं किया,आदेश में उल्लेख किया गया कि उन्हें समन विधिवत तामील कराया गया था तथा बाद में जमानतीय वारंट भी जारी किया गया, फिर भी वे पूर्व सूचना दिए बिना अनुपस्थित रहे,जिससे न्यायिक कार्यवाही प्रभावित हुई, इसी आधार पर न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 389 के तहत 500 रुपये का अर्थदंड लगाया तथा कोरिया पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि उक्त राशि अधिकारी के वेतन से काटकर न्यायालय में जमा कराई जाए।
लगातार विवादों में रहा कार्यकाल
यह पहला अवसर नहीं है जब निरीक्षक विनोद पासवान का नाम विवादों के साथ सामने आया हो, कोरिया जिले में उनके कार्यकाल के दौरान कई संवेदनशील मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे,पटना थाना क्षेत्र में एक नाबालिग द्वारा थाना से जाने के बाद आत्महत्या का मामला हो या फिर सोनहत थाना क्षेत्र का चर्चित नौगई तिहरा हत्याकांड,इन मामलों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर पुलिस की भूमिका और विवेचना को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं,इन मामलों में विभिन्न स्तरों पर सवाल उठे हैं,हालांकि उन पर न्यायालय द्वारा इस समाचार में वर्णित मामलों जैसी कोई टिप्पणी इस रिपोर्ट के आधार पर उपलब्ध नहीं है।


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