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संपादकीय@ समान नागरिक संहिता : संवैधानिक संकल्प सामाजिक संवाद और राजनीतिक चुनौती

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छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) का प्रारूप तैयार करने के लिए समिति गठित किए जाने के बाद राज्य में इस विषय पर गंभीर बहस शुरू हो गई है। उत्तराखंड के बाद अब छत्तीसगढ़ भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं,बल्कि सामाजिक,सांस्कृतिक और संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस विषय पर भावनाओं के बजाय तथ्यों,संविधान और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर चर्चा हो।
भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि यह मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि नीति-निर्देशक सिद्धांत है,फिर भी संविधान निर्माताओं की यह सोच थी कि भविष्य में देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने,उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे नागरिक मामलों में समान कानून हो। सात दशक बाद भी यह विषय पूरी तरह लागू नहीं हो सका है,क्योंकि भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता इसे जटिल बनाती है।
यूसीसी के समर्थकों का तर्क है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण समानता का सिद्धांत प्रभावित होता है। उनका मानना है कि एक समान नागरिक कानून लागू होने से सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान कानूनी संरक्षण मिलेगा। विशेष रूप से महिलाओं के अधिकार,उत्तराधिकार में समानता, विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। उनका कहना है कि जब आपराधिक कानून पूरे देश में समान हो सकते हैं, तो नागरिक कानूनों में भी समानता स्थापित की जा सकती है।
वहीं दूसरी ओर, इस विषय को लेकर कई सामाजिक, धार्मिक और जनजातीय संगठनों की चिंताएं भी सामने आती रही हैं। उनका कहना है कि भारत केवल विभिन्न धर्मों का देश नहीं,बल्कि अनेक संस्कृतियों,परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं का भी देश है। ऐसे में किसी भी कानून को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान या परंपरागत अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में,जहां बड़ी जनजातीय आबादी अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन जीती है,वहां यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकार द्वारा गठित समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीत सके। समिति यदि केवल औपचारिकता निभाएगी तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। लेकिन यदि वह विधि विशेषज्ञों, समाजशास्ति्रयों,महिला संगठनों,जनजातीय प्रतिनिधियों,धार्मिक विद्वानों और नागरिक समाज के साथ व्यापक संवाद कर सुझावों के आधार पर प्रारूप तैयार करेगी, तो यह प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और स्वीकार्य बन सकती है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी बड़े कानूनी सुधार की सफलता केवल कानून बनने से नहीं होती। कानून तभी प्रभावी होता है जब समाज उसे न्यायपूर्ण और आवश्यक मानकर स्वीकार करे। भारत में अनेक सामाजिक सुधार व्यापक जनसंवाद और सहमति के बाद सफल हुए हैं। इसलिए यूसीसी पर भी संवाद का रास्ता ही सबसे उपयुक्त माना जाना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। समर्थक इसे संविधान के एक अधूरे संकल्प को पूरा करने की दिशा में कदम मानते हैं, जबकि विरोधी इसे सामाजिक विविधता और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में देखते हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह इस विषय को राजनीतिक बहस तक सीमित न रखे,बल्कि इसे संवैधानिक और सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत करे।
छत्तीसगढ़ में समिति का गठन एक प्रारंभिक कदम है। अब राज्य की जनता की निगाहें इस बात पर होंगी कि समिति का प्रारूप कितना संतुलित, व्यावहारिक और संवेदनशील होता है। क्या उसमें महिलाओं के अधिकारों को पर्याप्त स्थान मिलेगा? क्या जनजातीय समाज की पारंपरिक व्यवस्था का सम्मान होगा? क्या सभी समुदायों से प्राप्त सुझावों को निष्पक्ष रूप से शामिल किया जाएगा? इन प्रश्नों के उत्तर ही इस पहल की सफलता तय करेंगे।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि समिति की कार्यवाही अधिकतम पारदर्शी हो। समय-समय पर सुझाव आमंत्रित किए जाएं, मसौदे के प्रमुख बिंदु सार्वजनिक किए जाएं और नागरिकों को अपनी राय रखने का अवसर मिले। इससे कानून बनने से पहले ही समाज में अनावश्यक भ्रम और आशंकाओं को दूर किया जा सकेगा।
समान नागरिक संहिता केवल कानून बदलने का विषय नहीं है, बल्कि यह संविधान की भावना,सामाजिक विविधता, लैंगिक न्याय और लोकतांत्रिक संवाद—इन सभी की परीक्षा है। यदि यह प्रक्रिया सहमति, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ती है, तो यह छत्तीसगढ़ के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहल साबित हो सकती है। लेकिन यदि संवाद की जगह जल्दबाजी या टकराव हावी हुआ, तो कानून बनने से पहले ही समाज में नई बहस और विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए इस विषय पर सबसे बड़ी आवश्यकता है—संवाद,संतुलन और संविधान की भावना के प्रति प्रतिबद्धता।


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