
- ना स्थायी पुल बचा…ना वैकल्पिक रपटा,आखिर ग्रामीण जाएं तो जाएं कैसे?
- एक साल…50 से ज्यादा खबरें…पहले पुल टूटा,फिर रपटा बहा,फिर भी समाधान अधूरा!
- ना स्थायी पुल…ना वैकल्पिक रपटा,आखिर हजारों ग्रामीणों की जिम्मेदारी किसकी?
- पहले पुल गया…फिर रपटा गया…अब जनता जाए तो जाए कैसे?
- ‘दैनिक घटती-घटना’ की 50 से ज्यादा खबरें…फिर भी पुल अधूरा,रपटा बहा और संपर्क टूटा
- एक साल में दो बार टूटा संपर्क…पहले पुल ध्वस्त,फिर बहा 15 लाख का रपटा
- 50 से ज्यादा खबरें,दर्जनों फॉलोअप…फिर भी न पुल बना,न बचा विकल्प!
ओंकार पांडेय
सूरजपुर,31 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। किसी भी विकास कार्य की सफलता का पैमाना उसका उद्घाटन नहीं,बल्कि उसकी उपयोगिता और टिकाऊपन होता है,लेकिन डुमरिया-केवरा-भैयाथान पहुंच मार्ग पर गोबरी नदी की कहानी कुछ अलग ही बयां कर रही है,यहां 30 जून 2025 को करोड़ों की लागत से बना मुख्य पुल धराशायी हो गया,उस दिन से लेकर आज तक पूरा एक वर्ष बीत चुका है,जुलाई 2026 का महीना भी समाप्त हो गया, लेकिन न तो नया स्थायी पुल बन पाया और न ही वैकल्पिक व्यवस्था टिक सकी,अब स्थिति यह है कि न स्थायी पुल बचा है और न ही वैकल्पिक रपटा, ऐसे में हजारों ग्रामीण एक बार फिर उसी सवाल के साथ खड़े हैं—‘आखिर अब जाएं तो जाएं कैसे?‘ बता दे की पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर प्रकाशित करना नहीं,बल्कि जनहित के मुद्दों को तब तक उठाना है,जब तक समाधान नहीं हो जाता,गोबरी नदी पर टूटे पुल का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है,30 जून 2025 को गोबरी नदी पर बना पुल टूटा,उसी दिन से दैनिक घटती-घटना ने इस मामले को केवल एक दुर्घटना की खबर मानकर नहीं छोड़ा, बल्कि इसे जनहित का अभियान बनाया, पिछले एक वर्ष में इस एक मुद्दे पर 50 से अधिक प्रमुख समाचार,खोजी रिपोर्ट, विश्लेषण, फॉलोअप,ग्राउंड रिपोर्ट, संपादकीय और व्यंग्यात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की गईं,हर खबर का उद्देश्य केवल एक था—हजारों ग्रामीणों को सुरक्षित आवागमन मिले और स्थायी समाधान हो,लेकिन एक वर्ष बाद स्थिति यह है कि न स्थायी पुल तैयार है और न ही वैकल्पिक व्यवस्था सुरक्षित बची है।
दैनिक घटती-घटना ने जो लिखा…वह सच साबित होता गया- जब रपटा बन रहा था,तब अखबार ने सवाल उठाया—‘क्या यह पहली बरसात झेल पाएगा?’जब सड़क अधूरी थी,तब लिखा— ‘रपटा बना…लेकिन जनता अब भी कीचड़ में।’जब डब्ल्यूएमएम शुरू हुआ,तब लिखा—‘अब पहली बरसात बताएगी निर्माण की असली कहानी।’और जब बारिश आई तो रपटा बह गया,अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल संयोग था या फिर अखबार द्वारा पहले उठाए गए तकनीकी और गुणवत्ता संबंधी प्रश्नों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया?
‘दैनिक घटती-घटना’ का अभियान जारी रहेगा-पुल टूटने से लेकर रपटा बनने, सड़क बनने,रपटा बहने और फिर संपर्क टूटने तक दैनिक घटती-घटना ने इस जनहित के मुद्दे को लगातार प्रमुखता से उठाया है,एक वर्ष…50 से अधिक खबरें…दर्जनों ग्राउंड रिपोर्ट…फिर भी समाधान अधूरा,जब तक गोबरी नदी पर स्थायी पुल बनकर हजारों ग्रामीणों का सुरक्षित आवागमन बहाल नहीं हो जाता,तब तक यह अभियान जारी रहेगा।
एक वर्ष पहले टूटा पुल,आज भी अधूरी है कहानी-30 जून 2025 को गोबरी नदी पर बना पुल अचानक क्षतिग्रस्त होकर उपयोग के लायक नहीं रहा, प्रशासन ने तत्काल पुल पर आवागमन बंद कर दिया, यह पुल केवल एक संरचना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-43 से भैयाथान बनारस राज्यकीय राज्य मार्ग के बीच दर्जनों गांवों को जोड़ने वाली जीवनरेखा था,पुल टूटने के साथ ही डुमरिया,केवरा,भैयाथान और आसपास के अनेक गांवों का सीधा संपर्क मुख्य मार्ग से टूट गया,ग्रामीणों को कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ी, मरीजों को अस्पताल पहुंचने में अधिक समय लगने लगा,विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलेज जाने में परेशानी हुई और किसानों के परिवहन खर्च में बढ़ोतरी हो गई,उस समय कहा गया था कि जल्द नया पुल बनेगा, लेकिन एक वर्ष बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि स्थायी पुल का निर्माण कब शुरू होगा और कब पूरा होगा।
एक साल बाद मिला केवल रपटा…वह भी नहीं टिक पाया-लगातार जनदबाव और दैनिक घटती-घटना द्वारा किए गए फॉलो-अप के बाद विभाग ने लगभग 15 लाख रुपये की लागत से वैकल्पिक रपटा तैयार कराया,लोगों को लगा कि अब कम से कम बरसात के दौरान संपर्क बना रहेगा,लेकिन यह राहत अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी,लगातार तीन दिनों की बारिश के बाद रपटा क्षतिग्रस्त हो गया और आवागमन फिर बाधित हो गया,अब ग्रामीणों के सामने वही पुरानी परेशानी खड़ी हो गई है।
एक साल की पत्रकारिता…एक साल का इंतजार…
इस अभियान की शुरुआत 30 जून 2025 को पुल टूटने की पहली खबर से हुई,इसके बाद लगातार प्रकाशित खबरों में हर पहलू उठाया गया पुल क्यों टूटा? निर्माण गुणवत्ता कैसी थी? नया पुल कब बनेगा? करोड़ों के पुल की गति और 15 लाख के रपटा की सुस्ती, ग्रामीणों की परेशानी,प्रशासनिक निरीक्षण,तकनीकी सवाल,रपटा निर्माण,अधूरी एप्रोच रोड,जनता द्वारा चंदा अभियान,डब्ल्यूएमएम कार्य,पहली बरसात में रपटा की परीक्षा,रपटा का बह जाना,फिर से संपर्क टूटना,हर चरण पर दैनिक घटती-घटना ने केवल समाचार नहीं छापे,बल्कि दस्तावेज,स्थल निरीक्षण,तस्वीरें और जमीनी तथ्यों के साथ पूरा घटनाक्रम जनता के सामने रखा।
अभियान का असर भी दिखा…
लगातार प्रकाशित खबरों का असर कई बार दिखाई भी दिया, प्रशासन ने निरीक्षण किया, वैकल्पिक रपटा बनाया गया,एप्रोच रोड की समस्या उजागर होने के बाद डब्ल्यूएमएम कार्य शुरू हुआ,निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद तकनीकी चर्चा शुरू हुई,लेकिन इन सबके बावजूद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—स्थायी पुल—आज भी अधूरा है।
दैनिक घटती-घटना ने पहले ही जताई थी आशंका…
रपटा बनने के बाद 7 जुलाई 2026 को दैनिक घटती-घटना ने प्रमुखता से समाचार प्रकाशित कर सवाल उठाया था कि गोबरी नदी के तेज बहाव के सामने इस वैकल्पिक व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा पहली बरसात में होगी,समाचार में यह भी उल्लेख किया गया था कि नदी का जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ी है और बरसात में यहां पानी का बहाव अत्यंत तेज हो जाता है। यदि निर्माण पर्याप्त मजबूत नहीं हुआ तो रपटा पर खतरा पैदा हो सकता है,अब रपटा के क्षतिग्रस्त होने के बाद ग्रामीणों के बीच यही चर्चा है कि अखबार द्वारा उठाई गई आशंका सही साबित होती दिखाई दे रही है।
अब न स्थायी व्यवस्था,न विकल्प
आज सबसे बड़ी विडंबना यही है कि एक वर्ष बाद भी स्थिति वहीं आकर खड़ी हो गई है, पहले पुल टूटा, फिर वैकल्पिक रपटा बना,अब रपटा भी नहीं बचा,ऐसे में लोगों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर प्रशासन की तत्काल कार्ययोजना क्या है? क्या नया रपटा बनेगा? क्या अस्थायी पुल बनाया जाएगा? क्या बरसात खत्म होने तक लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा? इन सवालों का उत्तर फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
10 किलोमीटर का सफर अब कई किलोमीटर लंबा
जो दूरी पहले लगभग 10 किलोमीटर में पूरी हो जाती थी, अब लोगों को कई किलोमीटर अतिरिक्त घूमकर तय करनी पड़ रही है,इसका सीधा असर आम लोगों की जेब और समय दोनों पर पड़ रहा है,ईंधन की खपत बढ़ गई, यात्रा का समय बढ़ गया,किसानों का परिवहन खर्च बढ़ गया,मरीजों के लिए अस्पताल पहुंचना कठिन हो गया,विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई प्रभावित हो रही है,एक पुल टूटने का असर केवल सड़क तक सीमित नहीं रहता,बल्कि पूरे ग्रामीण जीवन पर पड़ता है।
डुमरिया-केवरा-भैयाथान मार्ग की जीवनरेखा ठप्प
लगभग 18 किलोमीटर लंबे डुमरिया-केवरा-भैयाथान मार्ग पर राष्ट्रीय राजमार्ग-43 से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित यह पुल वर्षों से क्षेत्र की मुख्य कड़ी था,हजारों लोग प्रतिदिन इसी रास्ते से आवागमन करते थे,पुल टूटने के बाद लोगों ने सोचा था कि कुछ महीनों की परेशानी होगी, लेकिन अब एक वर्ष बीत चुका है और स्थायी समाधान अभी भी दूर दिखाई दे रहा है।
व्यंग्यः विकास की नई परिभाषा
सरकारी फाइलों में शायद यह लिखा होगा कि वैकल्पिक व्यवस्था कर दी गई,जमीनी हकीकत कहती है पहले पुल टूटा…फिर कहा गया—रपटा बनेगा,रपटा बना…फिर कहा गया—सड़क बनेगी,सड़क बनी…फिर कहा गया—अब समस्या खत्म, लेकिन तीन दिन की बारिश ने सारी घोषणाओं का ऐसा ‘निरीक्षण’ किया कि पूरी व्यवस्था फिर वहीं पहुंच गई,जहां से यात्रा शुरू हुई थी,अब ग्रामीण मजाक में कह रहे हैं यहां विकास का काम पानी के भरोसे होता है,अगर पानी ने मंजूर कर लिया तो निर्माण चलेगा,नहीं तो फिर नई घोषणा होगी।
चुप्पी भी सवाल बन गई…
जब पुल टूटा था तब अधिकारी पहुंचे थे,जब रपटा बना तब निरीक्षण हुए थे,जब सड़क बनी तब तस्वीरें खिंची थीं,लेकिन अब जब रपटा भी क्षतिग्रस्त हो गया है,तब सबसे अधिक चर्चा किसी बयान की नहीं,बल्कि खामोशी की है,ग्रामीण पूछ रहे हैं क्या अब कोई जिम्मेदार अधिकारी बताएगा कि आगे क्या होगा? क्या कोई समय-सीमा घोषित होगी? क्या स्थायी पुल के निर्माण की तिथि सार्वजनिक की जाएगी?
अब जवाबदेही तय होनी चाहिए…
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, यदि रपटा वास्तव में तेज बहाव के कारण क्षतिग्रस्त हुआ है,तो यह तकनीकी समीक्षा का विषय है,क्या नदी के बहाव का पर्याप्त अध्ययन किया गया था? क्या डिजाइन परिस्थितियों के अनुरूप थी? क्या निर्माण के बाद नियमित निरीक्षण हुआ? क्या भविष्य के लिए बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाएगी? इन सभी प्रश्नों पर विभाग को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
’घटती-घटना’ के बड़े सवाल
एक वर्ष बाद भी स्थायी पुल निर्माण कब शुरू होगा?
वैकल्पिक रपटा के क्षतिग्रस्त होने के बाद तत्काल आवागमन की क्या व्यवस्था है?
हजारों ग्रामीणों को कब तक लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा?
क्या निर्माण की तकनीकी जांच कराई जाएगी?
क्या जिम्मेदारी तय होगी?
क्या सरकार और संबंधित विभाग इस मार्ग को फिर से चालू करने की समय-सीमा घोषित करेंगे?
अंतिम सवाल…एक वर्ष पहले कहा गया था…
‘कुछ समय की परेशानी है,आज एक वर्ष बाद सवाल बदल चुका है जब न स्थायी पुल बचा, न वैकल्पिक रपटा,तो आखिर हजारों ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी किसके भरोसे चले? यही प्रश्न अब केवल ग्रामीणों का नहीं,बल्कि उस पूरे प्रशासनिक तंत्र के सामने है,जिसे विकास कार्यों को समय पर पूरा करने और आम लोगों का जीवन सुगम बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अब सवाल सिर्फ पुल का नहीं,जवाबदेही का है…
एक वर्ष में 50 से अधिक खबरें प्रकाशित होने के बाद भी यदि स्थिति वहीं की वहीं है, तो सवाल केवल निर्माण एजेंसी पर नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर उठता है,क्या जिम्मेदारी तय होगी? क्या निर्माण गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच होगी? क्या दोषी अधिकारियों और एजेंसी पर कार्रवाई होगी? क्या स्थायी पुल की समय-सीमा सार्वजनिक की जाएगी?
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