- धान गायब हो तो चिंता मत करिए…जांच कीजिए,अगली जांच में धान भी मिल जाएगा…
- धान कम था, रिकॉर्ड ज्यादा…फिर सब बराबर कैसे हो गया?
- सहकारिता का ‘चक्रीय खेल’! घोटाले की जांच,निलंबन और फिर बहाली की तैयारी
- क्या सूरजपुर का सहकारिता तंत्र कुछ ‘चर्चित नामों’ के इशारों पर चलता है?
- जांच हुई, सवाल उठे, कार्रवाई भी हुई…फिर वही चेहरे क्यों लौट रहे हैं?
- सहकारिता विभाग में किसकी चलती है शतरंज की चाल? किसान आज भी जवाब का इंतजार कर रहा है
- धान खरीदी से बहाली तक…क्या हर फाइल का ‘अंजाम’ पहले से तय होता है?
- क्या सूरजपुर की सहकारी समितियां कुछ लोगों की ‘जागीर’ बन गई हैं?
- सहकारिता में ‘ऑल इज़ वेल’? किसान पूछ रहा है—सच आखिर है क्या?
- सूरजपुर सहकारिता में आखिर किसकी चलती है? धान खरीदी से लेकर बहाली तक ‘चर्चित नामों’ पर उठ रहे सवाल
ओंकार पांडेय
सूरजपुर,30 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। अगर सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर कोई प्रशिक्षण संस्थान खुल जाए तो उसका पहला पाठ शायद यही होगा की घबराइए मत, हर कमी की दूसरी जांच होती है,और यदि दूसरी जांच भी हो जाए,तो पहली जांच को भूल जाइए,आखिर व्यवस्था का अपना गणित है, जिले के सहकारी तंत्र में वर्षों से कुछ नाम चर्चा में रहते हैं,भैयाथान शाखा के अंतर्गत संचालित कुछ समितियां और धान खरीदी केंद्र हर खरीदी सीजन में किसी न किसी वजह से सुर्खियों में आ जाते हैं,किसान बदलते हैं, मौसम बदलता है,लेकिन चर्चा के पात्र कम ही बदलते हैं। बता दे की सूरजपुर जिले के सहकारिता क्षेत्र और धान खरीदी केंद्रों में अनियमिताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है,विशेष रूप से भैयाथान शाखा के अंतर्गत आने वाली समितियों और शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में भ्रष्टाचार और धांधली के आरोप एक बार फिर सुर्खियों में हैं,चर्चा है कि जिले की कुछ सोसाइटियों पर कुछ रसूखदार नामों का एकछत्र वर्चस्व कायम है, जिनकी शह पर खुलेआम फर्जीवाड़े को अंजाम दिया जा रहा है।
घोटाले की ‘मोडस ऑपरेंडी’ः कम धान, फर्जी स्टॉक और बेनामी संपत्ति
प्राप्त जानकारी के अनुसार, धान खरीदी सीजन के दौरान केंद्रों में कागजों पर तो भारी खरीदी दर्ज कर ली गई,लेकिन भौतिक सत्यापन के दौरान फड़ में धान का स्टॉक काफी कम पाया गया, घोटाले को छिपाने के लिए प्रभारियों और प्रबंधकों ने कथित तौर पर बिचौलियों के जरिए कम दरों पर धान खरीदकर फड़ में जमा कराया और शासन की ओर से निर्धारित समर्थन मूल्य की पूरी राशि डकार ली,चौंकाने वाला मामलाः शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में तो कथित तौर पर वित्तीय गबन इस सीमा तक हुआ कि घोटाले के पैसे से विवादास्पद और बैंकों में बंधक जमीनों की खरीद-फरोख्त तक कर ली गई, इसके बावजूद,ठोस दंडात्मक कार्रवाई के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
2025-26 की धान खरीदी…जहां गणित भी शर्मिंदा हो जाए-कहा जाता है कि गणित कभी झूठ नहीं बोलता,लेकिन 2025-26 की धान खरीदी ने शायद गणित को भी सोचने पर मजबूर कर दिया,चर्चाएं हुईं कि कहीं रिकॉर्ड में धान ज्यादा था और गोदाम में कम। फिर जांच हुई,जांच में कमी मिली, इसके बाद फिर जांच हुई,और फिर वही कमी…पता नहीं कैसे… पूरी भी हो गई,यदि यह किसी जादूगर का शो होता तो दर्शक ताली बजाते। लेकिन यह सरकारी धान खरीदी थी,इसलिए जनता ने सवाल पूछे।
धान खुद चलकर आया या जवाब अभी बाकी है?-सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कमी मिली थी या नहीं,सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पहली जांच सही थी तो बाद में स्टॉक कैसे पूरा हो गया? क्या धान रातों-रात उग आया? क्या गोदामों में कोई चमत्कार हुआ? या फिर किसी ने कम दाम में धान खरीदकर सरकारी रिकॉर्ड से हिसाब बराबर कर दिया? इन सवालों के जवाब जनता आज भी तलाश रही है।
टीमें आईं…रिपोर्ट बनी…फिर सब सामान्य!-तहसीलदार आए, एसडीएम आए, खाद्य विभाग की टीम आई, सहकारिता विभाग की टीमें आईं और निरीक्षण हुआ,रिपोर्ट बनी और फिर धीरे-धीरे ऐसा सन्नाटा छा गया मानो कुछ हुआ ही न हो,यदि पहली रिपोर्ट गलत थी तो उसे बनाने वालों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी, यदि पहली रिपोर्ट सही थी तो दूसरी रिपोर्ट के आधार क्या थे? यही वह प्रश्न हैं जिनका उत्तर सार्वजनिक होना चाहिए।
जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति?
राजस्व,एसडीएम,तहसीलदार और सहकारिता विभाग की संयुक्त टीमों ने जब जांच शुरू की,तो शुरुआती चरण में भारी कमी और गड़बड़ी उजागर हुई,लेकिन आरोप है कि बाद में ‘अदृश्य संरक्षण’ के चलते कागजी कमी को पूरा दिखाकर पूरी जांच प्रक्रिया को ही रफा-दफा कर दिया गया,जिन समिति प्रबंधकों और धान खरीदी केंद्र प्रभारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित किया गया था,अब नए धान खरीदी सीजन के नजदीक आते ही उप आयुक्त सहकारिता एवं उप-निबंधक सहकारी संस्थाएं (जिला सूरजपुर) द्वारा उन्हें पुनः बहाल करने की अंदरूनी पटकथा तैयार कर ली गई है।
शीर्ष अधिकारियों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल…
इस पूरे मामले में साधना,हदीस,सोहराब जैसे स्थानीय चर्चित चेहरों का नाम लगातार सामने आ रहा है,सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक तंत्र की भूमिका पर खड़ा हो रहा है,जब शासन का पैसा बचाने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने का समय था,तब जिम्मेदार पदों पर बैठे आला अधिकारी मूकदर्शक बने रहे जिसमे संभागीय आयुक्त,सुनील तिवारी,उप आयुक्त सहकारिता, बैंक सीईओ (जिला सहकारी बैंक मर्यादित अंबिकापुर) श्रीकांत चंद्राकर, संभागीय अध्यक्ष (जिला सहकारी बैंक) रामकिशन सिंह शामिल है आरोप है कि इन सभी अधिकारियों ने घोटाले को उजागर करने के बजाय चुप्पी साधे रखी और निचले स्तर के षड्यंत्रकारियों को परोक्ष संरक्षण प्रदान किया।
निलंबन भी हुआ… अब बहाली भी होगी?
उस समय कुछ समिति प्रबंधकों और धान खरीदी केंद्र प्रभारियों पर कार्रवाई हुई,अब चर्चा यह है कि वही लोग फिर से आगामी धान खरीदी में जिम्मेदारी संभाल सकते हैं,यदि ऐसा होता है तो जनता पूछ रही है क्या निलंबन केवल औपचारिकता था? यदि दोषी थे तो बहाली क्यों? यदि दोषी नहीं थे तो निलंबन क्यों?
शिवप्रसादनगर : जहां सवाल अभी खत्म नहीं हुए…
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र को लेकर भी वर्षों से चर्चाएं होती रही हैं,स्थानीय स्तर पर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए, कुछ लोगों ने संपत्ति खरीद को लेकर भी प्रश्न उठाए। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी सक्षम प्राधिकारी का अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है,यदि शिकायतें निराधार थीं तो उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज क्यों नहीं किया गया? यदि शिकायतें गंभीर थीं तो उनकी जांच का परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?
नाम भी चर्चा में…लेकिन जवाब कौन देगा?
स्थानीय चर्चाओं में साधना,हदीस और सोहराब जैसे नाम बार-बार लिए जाते रहे हैं। इन नामों का उल्लेख विभिन्न शिकायतों और चर्चाओं में हुआ है,हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित व्यक्तियों का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है।
बड़े अधिकारी क्या केवल दर्शक थे?
जब पूरा मामला चर्चा में था,तब प्रशासनिक जिम्मेदारी वाले पदों पर संभागीय आयुक्त सुनील तिवारी,प्रभारी उप आयुक्त सहकारिता अनिल कुमार बनज,जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के अध्यक्ष रामकिशन सिंह कार्यरत थे,सवाल यह नहीं कि वे दोषी हैं,सवाल यह है कि जब शिकायतें थीं,जांच थी और कार्रवाई भी हुई,तब उनकी निगरानी में अंतिम परिणाम क्या निकला? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ तो जनता को पूरा रिकॉर्ड दिखाया जाए।
बैंक अध्यक्ष की पात्रता पर भी चर्चा…
जनचर्चा में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के अध्यक्ष रामकिशन सिंह की पात्रता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं,इन चर्चाओं पर किसी सक्षम प्राधिकारी का अंतिम सार्वजनिक निर्णय उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पारदर्शिता के हित में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि शिकायतें हुई थीं तो उनका निस्तारण किस प्रकार किया गया।
और अब नई बाजी…
सोनपुर समिति में बोर्ड की शक्तियों में बदलाव के बाद फिर चर्चा शुरू हो गई है,लोग कह रहे हैं—सहकारिता विभाग में फाइलें नहीं चलतीं, शतरंज की चालें चलती हैं,यह केवल जनचर्चा है,लेकिन यदि ऐसी धारणा बन रही है तो उसे दूर करना भी विभाग की जिम्मेदारी है।
अब जनता का सवाल…
जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है?
कमी मिली थी तो दोषी कौन?
दोषी नहीं थे तो कार्रवाई क्यों?
कार्रवाई हुई थी तो बहाली किस आधार पर?
और यदि सब कुछ ठीक था,तो हर साल वही केंद्र और वही नाम चर्चा में क्यों आते हैं?
दैनिक घटती-घटना की मांग…
इन सभी प्रश्नों का समाधान केवल एक स्वतंत्र,निष्पक्ष और दस्तावेज़ आधारित जांच से ही संभव है,यदि शिकायतें निराधार हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट मिले, यदि शिकायतों में तथ्य हैं,तो जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित न रहकर पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की भी जांच होनी चाहिए।
जनता और किसानों की मांग…
सूरजपुर के किसानों और स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि जिन लोगों ने शासन के करोड़ों रुपये की हेराफेरी की,वे आज भी कार्रवाई से बेअसर हैं,क्षेत्र की जनता अब इस पूरे मामले की ईओडब्ल्यू या हाईकोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है,ताकि पर्दे के पीछे छिपे असली संरक्षकों के चेहरों से नकाब हट सके।
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