- : कार्रवाई से ज्यादा जांच पर सवाल,
- सिस्टम की साख दांव पर
- कार्रवाई करने वाला कठघरे में,जांच करने वाले सवालों से बाहर क्यों?
- नकली दवा केस में उलझी कहानी : जब्ती, जांच और जिम्मेदारी सब संदिग्ध
- एक ही केस,दो तरह की कार्रवाई-नकली दवा कांड में न्याय पर सवाल
- जांच या आत्म-जांच? विवादित अधिकारियों के हाथ में पूरा मामला
- ढाई लाख बनाम 25 लाखः आंकड़ों के खेल में फंसा नकली दवा कांड
- गायब दुकान,मौजूद जांच—प्रेम प्रकाश एजेंसी केस में बड़ा सवाल
- कार्रवाई की आड़ में विरोधाभासः
- नकली दवा कांड में कौन जिम्मेदार?
- नकली दवा नेटवर्क पर चोट या सच
- पर परदा? जांच पर उठे गंभीर सवाल
- एनएसयूआई का विरोध एक पर क्यों? पूरे सिस्टम पर चुप्पी क्यों?
-न्यूज डेस्क-
रायपुर,19 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में सामने आया नकली दवा कांड अब एक साधारण आपराधिक मामला नहीं रह गया है, यह प्रकरण धीरे-धीरे एक ऐसे जटिल घटनाक्रम में बदल गया है,जहां कार्रवाई,जांच और विरोध—तीनों ही अपने-अपने स्तर पर सवालों के घेरे में हैं,एक ओर विभाग अपनी कार्रवाई को बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है,वहीं दूसरी ओर जांच की निष्पक्षता, आंकड़ों की पारदर्शिता और राजनीतिक संगठनों की भूमिका को लेकर गंभीर संदेह उभर रहे हैं, यह मामला अब केवल नकली दवाओं के नेटवर्क तक सीमित नहीं है,बल्कि यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है। नकली दवा कांड अब केवल अवैध दवाओं की जब्ती और गिरफ्तारी तक सीमित मामला नहीं रह गया है,बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली,जांच की निष्पक्षता और राजनीतिक संगठनों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला प्रकरण बन चुका है, शुरुआत में इसे एक बड़ी कार्रवाई और संगठित नेटवर्क के खुलासे के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन जैसे-जैसे परतें खुलती गईं,मामले ने एक जटिल और विरोधाभासी रूप ले लिया, सबसे अहम बात यह है कि जिस कार्रवाई से इस पूरे मामले का खुलासा हुआ,उसी कार्रवाई से जुड़े अधिकारी को अब मुख्य रूप से निशाने पर लिया जा रहा है। यह स्थिति अपने आप में सवाल खड़ा करती है कि क्या जवाबदेही तय करने का दायरा सीमित किया जा रहा है? क्योंकि जांच के दौरान सामने आए तथ्यों में कई ऐसे बिंदु हैं,जो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया और उसमें शामिल अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग करते हैं, मामले में जब्ती के आंकड़ों में भारी अंतर,जांच के समय और परिस्थितियों को लेकर उठते सवाल,और एक ही प्रकरण में अलग-अलग स्तर पर की गई कार्रवाई—ये सभी पहलू संकेत देते हैं कि मामला सतही नहीं, बल्कि गहराई से समझे जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही, जांच में शामिल कुछ अधिकारियों पर पहले भी कार्रवाई हो चुकी होने के बावजूद उन्हें ही पुनः जिम्मेदारी सौंपे जाने से निष्पक्षता को लेकर संदेह और बढ़ जाता है, दूसरी ओर,इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक संगठन एनएसयूआई की भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। संगठन द्वारा उठाई जा रही आवाज जहां एक ओर जवाबदेही की मांग करती दिखती है, वहीं दूसरी ओर यह आरोप भी उभर रहा है कि विरोध केवल एक व्यक्ति तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह धारणा बनती है कि पूरे सिस्टम की बजाय एक सीमित दायरे में सवाल उठाए जा रहे हैं,ऐसे में यह मामला केवल नकली दवाओं का नहीं,बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता,जवाबदेही और निष्पक्षता की परीक्षा बन गया है,अब जरूरत इस बात की है कि सवाल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर समान रूप से उठें,ताकि सच्चाई सामने आए और जनता का भरोसा कायम रह सके।
कार्रवाई की कहानी शुरुआत गोगांव गोल्डन ट्रांसपोर्ट से शुरू होती
10 दिसंबर 2025 को रायपुर के गोगांव स्थित गोल्डन ट्रांसपोर्ट से नकली दवाओं की बड़ी खेप जब्त की गई,इस कार्रवाई को अंजाम दिया था सहायक औषधि नियंत्रक संजय नेताम ने एक ऐसी कार्रवाई,जिसे उस समय विभाग ने अपनी ‘बड़ी सफलता’ के रूप में प्रस्तुत किया, विडंबना यहीं से शुरू होती है,जिस अधिकारी की पहल पर यह पूरा मामला सामने आया, वही आज इस प्रकरण में निलंबित है,आधिकारिक भाषा में यह ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ हो सकती है, लेकिन घटनाक्रम को देखने वाले इसे एक अलग नजर से पढ़ रहे हैं जैसे किसी तैयार पटकथा में नायक को ही बीच में खलनायक बना दिया गया हो,यदि उस दिन संजय नेताम कार्रवाई नहीं करते,तो संभवतः यह पूरा नेटवर्क परतों के नीचे ही दबा रह जाता और विभाग के पास आज अपनी ‘सफलता’ का कोई आधार भी नहीं होता,लेकिन व्यवस्था की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं और कभी-कभी वे प्राथमिकताएं परिणाम से ज्यादा भूमिकाओं को तय करती हैं, यहां एक ऐसा चक्रव्यूह नजर आता है, जिसमें प्रवेश तो कार्रवाई करने वाले अधिकारी ने किया,लेकिन बाहर निकलने का रास्ता शायद पहले से तय नहीं था,सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई सही थी या गलत,बल्कि यह है कि उसके बाद घटनाओं की दिशा किसने तय की,विभाग ने इस जब्ती को संगठित नेटवर्क के खुलासे के रूप में पेश किया और यहीं से इस पूरे मामले की कहानी शुरू हुई। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई,हर नया अध्याय अपने साथ नए सवाल लेकर आता गया—और सबसे पहला सवाल उसी बिंदु पर खड़ा हो गया, जहां से यह कहानी शुरू हुई थी।
जांच से पहले प्रेम प्रकाश एजेंसी दुकान गायब कैसे हुआ था?
इस पूरे प्रकरण में सुरेन्द्र कमनानी की प्रेम प्रकाश एजेंसी एक ऐसा केंद्र बिंदु बनकर उभरती है, जिसने मामले को साधारण जांच से उठाकर संदेह और व्यंग्य के दायरे में ला खड़ा किया,दिलचस्प तथ्य यह है कि यदि दैनिक घटती-घटना समाचार-पत्र इस एजेंसी को लेकर लगातार खबरें प्रकाशित नहीं करता,तो संभवतः यह नाम भी उन फाइलों में दबा रह जाता,जहां कई मामले धीरे-धीरे ‘ठंडे’ हो जाते हैं,लगातार खबरों और सवालों के बाद ही प्रशासन हरकत में आता है और प्रेम प्रकाश एजेंसी पर कार्रवाई की दिशा बनती है,लेकिन तब तक घटनाक्रम एक अलग ही मोड़ ले चुका होता है,जांच से ठीक पहले दुकान का रातों-रात खाली हो जाना इस पूरे मामले का सबसे रहस्यमय हिस्सा बन जाता है, अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं,लेकिन सामने सिर्फ एक खाली दुकान होती है न दवाओं का कोई निशान,न कारोबार का कोई प्रमाण, यहीं से यह कहानी अपने सबसे व्यंग्यात्मक रूप में प्रवेश करती है,ईश्वरी नारायण सिंह को जांच की जिम्मेदारी मिलती है,और वे अपने ‘करीबी सहयोगी’ नीरज साहू को उसके छुट्टी के दिन साथ लेकर पहुंचते हैं,खाली दुकान में बैठकर जांच की औपचारिकता पूरी की जाती है, मानो सब कुछ नियमों के तहत हो रहा हो, फिर इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरें सामने आती हैं,और उसके बाद कार्रवाई की दिशा तय होती है, यानी पहले दृश्य सार्वजनिक होता है,फिर निर्णय आकार लेता है यह क्रम खुद ही कई सवालों को जन्म देता है,लगातार मीडिया दबाव खासतौर पर दैनिक घटती-घटना की रिपोर्टिंग के बाद प्रेम प्रकाश एजेंसी और उससे जुड़े इंदौर स्थित मां बिजासन मेडिकोज पर कार्रवाई होती है,लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है क्या यह कार्रवाई समय पर हुई,या तब जब अब बचाव की संभावनाएं खत्म हो चुकी थीं? सबसे बड़ा और असहज प्रश्न अब भी हवा में तैर रहा है दुकान खाली होने की सूचना किसे पहले थी? और अगर थी, तो वह बाहर कैसे पहुंची? इस ‘गायब’ दुकान ने इस पूरे मामले में जितने तथ्य उजागर किए,उससे कहीं ज्यादा संदेह पैदा कर दिए—और शायद यही इस कहानी का सबसे सटीक सार है।
गिरफ्तारी हुई, लेकिन क्या पूरा नेटवर्क सामने आया?
जांच के दौरान तीन प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया गया रोचक अग्रवाल (बिजासन मेडिकोज, इंदौर), सुरेन्द्र कमनानी (प्रेम प्रकाश एजेंसी, भाटापारा) खेमराज बानी (सरस्वती मेडिकल स्टोर, सारंगढ़) विभाग का दावा है कि यह कार्रवाई नेटवर्क की रीढ़ तोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है क्या यही पूरा नेटवर्क है? या अभी भी कई नाम सामने आना बाकी हैं?
कार्रवाई से खुला मामला,लेकिन कार्रवाई करने वाला ही सवालों में…
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 10 दिसंबर 2025 को रायपुर के गोगांव स्थित गोल्डन ट्रांसपोर्ट से नकली दवाओं की बड़ी खेप की जब्ती से हुई,इस कार्रवाई को सहायक औषधि नियंत्रक संजय नेताम ने अंजाम दिया,उस समय इसे विभाग की बड़ी सफलता के रूप में प्रचारित किया गया और इसे एक संगठित नेटवर्क के खिलाफ बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन घटनाक्रम ने जल्द ही एक अलग मोड़ ले लिया,जिस अधिकारी की पहल पर यह पूरा मामला सामने आया,वही बाद में निलंबन की कार्रवाई का सामना करता है,यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है क्या कार्रवाई करने वाला अधिकारी ही सबसे बड़ी गलती का जिम्मेदार है,या फिर मामला कुछ और संकेत दे रहा है? यह विरोधाभास पूरे प्रकरण की दिशा को समझने के लिए अहम बन जाता है।
जब्ती के आंकड़ों में बड़ा अंतर…
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा जब्त दवाओं की कीमत को लेकर हो रही है,एक ओर दावा किया जा रहा है कि जब्ती करीब 25 लाख रुपये की थी,वहीं दस्तावेजों में यह आंकड़ा घटाकर लगभग 2.25 लाख रुपये दर्शाया गया है,यह अंतर केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं माना जा सकता,यदि यह गलती है,तो यह असामान्य है, और यदि यह जानबूझकर किया गया है, तो यह गंभीर अनियमितता का संकेत देता है,यह मुद्दा पूरे मामले की विश्वसनीयता को सीधे प्रभावित करता है।

जांच उन्हीं के हाथ में…जिन पर पहले उठे सवाल
मामले का सबसे विवादित पक्ष जांच अधिकारियों को लेकर सामने आता है,ड्रग इंस्पेक्टर ईश्वरी नारायण सिंह और नीरज साहू को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है,आरोप यह है कि इन्हीं अधिकारियों पर पहले इसी मामले में लापरवाही के चलते कार्रवाई हो चुकी है और उनकी वेतन वृद्धि रोकी गई थी,ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पहले से विवादित अधिकारी ही निष्पक्ष जांच कर सकते हैं? यह स्थिति पूरे प्रकरण को ‘जांच या आत्म-जांच’ जैसे सवालों की ओर ले जाती है।
छुट्टी के दिन जांच और बढ़ते संदेह
एक और पहलू जो लगातार चर्चा में है,वह है छुट्टी के दिन जांच का किया जाना, बताया जाता है कि नीरज साहू,जो उस समय अवकाश पर थे,वे ईश्वरी नारायण सिंह के साथ प्रेम प्रकाश एजेंसी की जांच में शामिल हुए,सामान्य परिस्थितियों में इसे तत्परता के रूप में देखा जा सकता था,लेकिन जब पूरा मामला पहले से विवादित हो,तो यही कदम संदेह को और गहरा करता है, खासकर तब,जब जांच स्थल पर कोई ठोस साक्ष्य मौजूद ही नहीं था।
कार्रवाई में असमानता : एक ही मामले में अलग-अलग सजा
इस पूरे प्रकरण में कार्रवाई के स्तर पर भी असमानता देखने को मिली है, ईश्वरी नारायण सिंह और नीरज साहू पर केवल वेतन वृद्धि रोकने की कार्रवाई की गई,जबकि रायगढ़ के अधिकारियों अमित राठौर और विजय राठौड़ को निलंबित कर दिया गया,यह अंतर कई सवाल खड़े करता है क्या सभी की जिम्मेदारी समान नहीं थी? यदि मामला एक ही है,तो कार्रवाई अलग-अलग क्यों? यह स्थिति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
जांच टीम की भूमिका भी सवालों में…
इस कार्रवाई में डॉ. सुरेश कुमार साहू और डॉ. टेकचंद धीरहे की भी भूमिका रही है,हालांकि मुख्य विवाद अन्य अधिकारियों को लेकर है,लेकिन जांच एक सामूहिक प्रक्रिया होती है, इसलिए पूरी टीम की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

एनएसयूआई की भूमिकाः विरोध या चयनात्मक सवाल?
इस पूरे मामले में राजनीतिक संगठन एनएसयूआई की भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। संगठन द्वारा संजय नेताम पर कार्रवाई की मांग उठाई गई है,लेकिन यह विरोध एक व्यक्ति तक सीमित नजर आता है, यहां सवाल यह है कि क्या विरोध केवल एक अधिकारी के खिलाफ होना चाहिए? क्या पूरे सिस्टम की जांच की मांग नहीं उठनी चाहिए? वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि विरोध व्यापक नहीं है, बल्कि सीमित दायरे में केंद्रित है। इससे संगठन की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जनता के भरोसे पर असर
नकली दवाओं का मामला सीधे जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। ऐसे में यदि जांच प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें,तो इसका असर केवल इस केस तक सीमित नहीं रहता,बल्कि पूरे सिस्टम पर जनता के भरोसे को प्रभावित करता है,जब कार्रवाई से ज्यादा चर्चा जांचकर्ताओं और प्रक्रिया पर होने लगे,तो यह स्थिति किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक होती है।
जवाब अभी बाकी है…नकली दवा कांड में कार्रवाई हुई,गिरफ्तारी हुई,जांच जारी है…
लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या यह जांच निष्पक्ष और पारदर्शी है? जब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता,यह मामला केवल एक आपराधिक केस नहीं रहेगा,बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न बना रहेगा।
फिलहाल,पूरे घटनाक्रम का सबसे स्थायी और आधिकारिक जवाब यही है— ‘जांच जारी है… ‘
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