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बैकुंठपुर@ भीषण गर्मी में जनगणना प्रशिक्षण.

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  • पंखे ठप्प थाली हल्की और कागजों में ‘मलाई’ भारी?
  • जनगणना प्रशिक्षण में ‘गर्मी’ से ज्यादा ‘कटौती’ का असर,थाली में कमी और बिल में बढ़ोत्तरी
  • पंखे ठप्प,शिक्षक तपे-200 की थाली में 70 का खाना,बाकी किसका खजाना?
  • जनगणना में आंकड़े सही, लेकिन खाने के हिसाब में गड़बड़ी?
  • भीषण गर्मी में प्रशिक्षण,व्यवस्था ठंडी-थाली से ‘मलाई’ गायब या कहीं और पहुंची?
  • कर्तव्य निभाते शिक्षक,‘कट’ निकालती व्यवस्था—जनगणना प्रशिक्षण पर सवाल
  • पसीने में प्रशिक्षण,कागजों में पोषण-200 की थाली का असली सच
  • मेन्यू में पनीर,थाली में कहानी-जनगणना प्रशिक्षण में खर्च का खेल
  • भूख समय पर,खाना देर से—और बिल पूरा,यह कैसा सिस्टम?
  • जनगणना के नाम पर ‘कमीशन गणना’? प्रशिक्षण व्यवस्था कटघरे में


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,20 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले में चल रहे जनगणना प्रशिक्षण ने एक साथ दो तस्वीरें सामने रख दी हैं एक तस्वीर कर्तव्यनिष्ठ प्रशिक्षु शिक्षकों की,जो 40 डिग्री से ऊपर की गर्मी में भी पूरी तन्मयता से प्रशिक्षण ले रहे हैं,और दूसरी तस्वीर उस व्यवस्था की, जो इसी प्रशिक्षण के नाम पर सुविधाओं में कटौती कर ‘मलाई’ निकालने में जुटी दिखाई देती है, यह मामला अब केवल अव्यवस्था का नहीं रहा,बल्कि यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य में भी ‘कट’ और ‘कमीशन’ की गुंजाइश निकाल ली गई है।
प्रशिक्षण कक्ष या तपता हुआ कमरा?
प्रशिक्षण केंद्रों की हालत ऐसी है कि वहां बैठना ही अपने आप में परीक्षा बन गया है,पंखे लगे जरूर हैं,लेकिन वे हवा कम और उम्मीद ज्यादा दे रहे हैं घूमते तो हैं,पर ठंडक देने की उनकी क्षमता जैसे छुट्टी पर चली गई हो,भीषण गर्मी में प्रशिक्षु शिक्षक पसीने से तरबतर होकर प्रशिक्षण ले रहे हैं,चेहरे पर पसीना,हाथ में नोट्स और मन में जिम्मेदारी यह दृश्य बताता है कि शिक्षक अपना कर्तव्य निभाने में पीछे नहीं हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या व्यवस्था का भी कोई कर्तव्य है,या वह सिर्फ आदेश जारी करने तक सीमित है?
200 रुपये की थाली का ‘गणित’
सबसे ज्यादा चर्चा भोजन व्यवस्था को लेकर है। बताया जा रहा है कि प्रत्येक प्रशिक्षु के लिए प्रतिदिन 200 रुपये चाय-नाश्ता और भोजन के लिए निर्धारित हैं,अब जरा थाली पर नजर डालिए दो रोटी,थोड़ा सा चावल,नाम मात्र की सब्जी और कभी-कभार एक पापड़,शिक्षकों का कहना है कि यह थाली 60 से 70 रुपये से ज्यादा की नहीं हो सकती,अब यहां असली गणित शुरू होता है थाली 70 की, बिल 200 का…बाकी 130 का हिसाब कौन देगा? यहां व्यंग्य खुद ही लिखता है— ‘गणना जनगणना की हो रही है,लेकिन असली जोड़-घटाव कहीं और चल रहा है। ‘
भोजन का समयः भूख इंतजार करे, व्यवस्था नहीं-प्रशिक्षण का समय तय है, अवकाश का समय तय है, लेकिन भोजन का समय ‘अनिश्चित’ है,दोपहर का अवकाश डेढ़ बजे,लेकिन खाना पहुंचता है तीन बजे के बाद, तब तक शिक्षक कुछ न कुछ खाकर अपनी भूख शांत कर लेते हैं,जब भोजन आता है,तब जरूरत कम और औपचारिकता ज्यादा रह जाती है, यानी भूख समय पर लगती है,लेकिन व्यवस्था को समय से कोई मतलब नहीं।
कोरिया मिलेट्स की जिम्मेदारी, लेकिन गुणवत्ता पर सवाल
भोजन आपूर्ति की जिम्मेदारी ‘कोरिया मिलेट्स’ को दी गई है,लेकिन जिस तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं,उससे यह सवाल उठता है कि क्या गुणवत्ता की निगरानी हो रही है या सिर्फ सप्लाई की गिनती? भीषण गर्मी में एक साथ तैयार किया गया भोजन प्लास्टिक के डिब्बों में बंद होकर विभिन्न केंद्रों तक पहुंचता है, सवाल यह है कि क्या वह भोजन तब तक खाने योग्य रह भी जाता है? शिक्षकों का कहना है कि कई बार खाना न ताजा लगता है, न संतोषजनक।
मेन्यू में पनीर,थाली में ‘नाम मात्र’
पहले दिन तो पनीर का नाम ही नहीं था,दूसरे दिन मेन्यू में शामिल हुआ,लेकिन थाली में उसकी मौजूदगी ‘ढूंढने’ लायक रही,चार टुकड़े पनीर और एक चम्मच सब्जी—बस इतना ही ‘विशेष भोजन’ था,यहां व्यंग्य सीधा है— ‘मेन्यू में पनीर, थाली में कहानी। ‘
कटौती का खेल थाली से जेब तक?
पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यही है कि अगर 200 रुपये की राशि तय है,तो खर्च कम क्यों हो रहा है? अगर वास्तविक खर्च कम है और बिल भी उसी हिसाब से लगाया जा रहा है, तो कोई समस्या नहीं,लेकिन यदि बिल 200 का लगाया जा रहा है और खर्च 70 का हो रहा है,तो यह सीधा-सीधा कटौती का मामला बनता है, यानी—प्रशिक्षुओं की थाली हल्की और किसी की जेब भारी।
कर्तव्य बनाम ‘कमाई का अवसर’
जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य के दौरान यह स्थिति दिखाती है कि जहां एक ओर कर्मचारी अपने कर्तव्य के प्रति गंभीर हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे ‘कमाई का अवसर’ मानकर चल रहे हैं, शिक्षक गर्मी में पसीना बहा रहे हैं,और व्यवस्था ठंडे दिमाग से हिसाब लगा रही है, यह विरोधाभास ही पूरे मामले का सार है।
जनगणना में आंकड़े गिने जाएंगे, ‘कट’ का हिसाब कौन देगा?
यह मामला सिर्फ पंखों या भोजन तक सीमित नहीं है,यह उस सोच को उजागर करता है,जहां हर योजना में ‘कमीशन’ की गुंजाइश ढूंढ ली जाती है,जरूरत है कि खर्च की पारदर्शी जांच हो,भोजन की गुणवत्ता और समय सुनिश्चित किया जाए और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय हो वरना यह सवाल बना रहेगा-‘जनगणना में जनता गिनी जाएगी,लेकिन इस ‘कटौती’ का हिसाब कौन देगा?


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