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- शिक्षक बनाम अधीक्षक,आदेश किनारे-रसूख हावी!
- बलरामपुर से सूरजपुर तक बवाल…वसूली,दोहरे लाभ और पुरस्कार पर उठे सवाल,जांच की मांग तेज
- आदेश किनारे,‘कुर्सी’ पर कब्जा,छात्रावासों में मंडल संयोजक को लेकर बवाल
- वसूली,दबाव और दोहरा लाभ! मंडल संयोजक पद बना ‘कमाई का केंद्र’
- शिक्षक बने मंडल संयोजक,अधीक्षक नाराज़
- विभागीय आदेशों की उड़ रही धज्जियां
- पुरस्कार भी,पद भी मंडल संयोजक रहते शिक्षकों
- को मिला सम्मान,उठे सवाल
- कुर्सी की लड़ाई में ‘छात्र’ गायब,मंडल संयोजक पद पर मचा घमासान
- बलरामपुर से सूरजपुर तक विरोध,मंडल
- संयोजक पद पर अधीक्षकों की मांग तेज
-ओंकार पाण्डेय-
बलरामपुर/सूरजपुर,12 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। आदिवासी विकास विभाग के छात्रावासों में इन दिनों पढ़ाई से ज्यादा ‘पद’ की राजनीति गरमा गई है,बलरामपुर और सूरजपुर जिलों में छात्रावास अधीक्षक मंडल संयोजक पद को लेकर खुलकर मैदान में उतर आए हैं। आरोप है कि विभागीय आदेशों को दरकिनार कर शिक्षकों को इस पद पर बिठाया गया है,जिससे न सिर्फ नियमों की अनदेखी हो रही है बल्कि वसूली,दबाव और दोहरे लाभ का खेल भी चल रहा है,हालात ऐसे हैं कि अब अधीक्षक लामबंद होकर कलेक्टर, सहायक आयुक्त और जिला शिक्षा अधिकारी तक गुहार लगा चुके हैं, सवाल सीधा है क्या विभाग अपने ही आदेशों का पालन करेगा या फिर ‘रसूख’ ही नियम तय करेगा?
बात ये की बलरामपुर और सूरजपुर में मंडल संयोजक पद को लेकर उठी यह लड़ाई अब केवल विभागीय विवाद नहीं रही,बल्कि यह सिस्टम की पारदर्शिता,जवाबदेही और राजनीतिक हस्तक्षेप पर बड़ा सवाल बन गई है, अब देखना यह है कि क्या विभाग अपने आदेशों का पालन कर अधीक्षकों को न्याय देगा,या फिर यह ‘कुर्सी की जंग’ यूं ही रसूख के सहारे चलती रहेगी? फिलहाल इतना तय है कि यह मामला अब दबने वाला नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है।
वसूली और दबाव के आरोप
सबसे गंभीर आरोप यह है कि मंडल संयोजक बने शिक्षक अधीक्षकों पर अनावश्यक दबाव बनाते हैं और वसूली का प्रयास करते हैं, अधीक्षकों का कहना है कि उन्हें भयग्रस्त माहौल में काम करना पड़ रहा है और यह स्थिति केवल इसलिए बनी हुई है क्योंकि शिक्षकों के पीछे राजनीतिक संरक्षण है, यह आरोप यदि सही हैं, तो यह मामला केवल पद विवाद नहीं,बल्कि एक संगठित व्यवस्था की ओर इशारा करता है।
छात्रों के हक पर ‘कटौती’ का आरोप
अधीक्षकों का आरोप है कि इस पूरे खेल का असर सीधे छात्रावासी बच्चों पर पड़ रहा है, उनका कहना है कि सुविधाओं में कटौती कर ‘लाभ’निकालने की कोशिश की जाती है, जिससे छात्रों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, यदि यह सही है,तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि इसमें सीधे बच्चों के हितों से समझौता जुड़ा है।
मंडल संयोजक पद बना ‘पावर सेंटर’
आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत आने वाले छात्रावासों में मंडल संयोजक का पद इन दिनों सबसे ज्यादा ‘मांग वाला’ पद बन चुका है, अधीक्षकों का आरोप है कि यह पद अब जिम्मेदारी से ज्यादा ‘लाभ’ का माध्यम बन गया है, जिसके चलते इस पर कब्जे की लड़ाई छिड़ गई है, सूत्रों के अनुसार, इस पद के जरिए छात्रावासों के संचालन और निरीक्षण पर नियंत्रण रहता है, जिससे ‘प्रभाव’ और ‘कमाई’ दोनों की संभावनाएं जुड़ी होती हैं।
विभागीय आदेश बनाम जमीनी हकीकत
अधीक्षकों का दावा है कि आदिवासी विकास विभाग के स्पष्ट आदेश हैं कि मंडल संयोजक पद पर केवल विभाग के अधीक्षक या लिपिक को ही संलग्न किया जा सकता है, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर शिक्षकों को इस पद पर बैठाया गया है, जो नियमों के विपरीत है, यही कारण है कि अधीक्षक अब खुलकर विरोध में उतर आए हैं और इसे हटाने की मांग कर रहे हैं।
दोहरा लाभ और पुरस्कार पर सवाल
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि कई शिक्षक,जो मंडल संयोजक पद पर संलग्न रहे, उन्हें राज्यपाल शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया,अधीक्षकों का सवाल है यदि शिक्षक अपने मूल शैक्षणिक कार्य से दूर हैं,तो उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मान कैसे मिला? क्या यह पुरस्कार योग्यता का परिणाम है या फिर प्रभाव और पहुंच का?
बलरामपुर भी जुड़ा,आंदोलन हुआ व्यापक
यह मुद्दा पहले सूरजपुर में उठा था,लेकिन अब बलरामपुर के अधीक्षक भी इसमें शामिल हो गए हैं, दो जिलों के अधीक्षकों के एकजुट होने से यह आंदोलन अब व्यापक रूप लेता नजर आ रहा है। ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं और आगे भी आंदोलन तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
राजनीतिक पकड़ ही असली ‘योग्यता’?
विभागीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि मंडल संयोजक बनने के लिए योग्यता से ज्यादा राजनीतिक पहुंच काम आती है, जिसकी पकड़ मजबूत,वही पद पर काबिज-और फिर निरीक्षण के नाम पर ‘व्यवस्था’ चलती रहती है,यही वजह है कि अधीक्षकों और शिक्षकों के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है।
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