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खड़गवां,@ जहां विरोध होना था,वहां मांग उठी

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जिल्दा में शराब दुकान खोलने की जिद,‘माफिया बनाम सरकारी दुकान’ की जंग
पहले विरोध, अब समर्थन—ग्रामीणों का यू-टर्न; अवैध शराब कारोबार पर लगाम के लिए शासकीय दुकान की मांग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,12 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
खड़गवां क्षेत्र के ग्राम पंचायत जिल्दा में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने शराब नीति को लेकर बनी पारंपरिक सोच को उलट कर रख दिया है,जहां आमतौर पर शराब दुकानों के विरोध में ग्रामीण सड़कों पर उतरते हैं, वहीं यहां ग्रामीण खुद शराब दुकान खोलने की मांग कर रहे हैं, दिलचस्प यह है कि कुछ दिन पहले यही ग्रामीण इसके खिलाफ ज्ञापन सौंप चुके थे,अब उनका आरोप है कि अवैध शराब कारो बारियों ने उन्हें भड़काकर विरोध करवाया था,बदलते घटनाक्रम ने प्रशासन के सामने एक जटिल स्थिति खड़ी कर दी है क्या वैध दुकान खोलकर अवैध धंधे पर लगाम लगाई जाए या सामाजिक प्रभावों को देखते हुए निर्णय टाला जाए?
जिल्दा का यह मामला अब केवल शराब दुकान खोलने या न खोलने का नहीं रह गया है,बल्कि यह अवैध कारोबार,सामाजिक प्रभाव और प्रशासनिक निर्णय क्षमता की परीक्षा बन गया है,जहां एक ओर ग्रामीण अवैध शराब माफिया के खिलाफ वैध व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, वहीं यह भी देखना होगा कि क्या इससे वास्तव में समस्या का समाधान होगा या नई चुनौतियां सामने आएंगी,फिलहाल, जिल्दा में उठी यह मांग एक बड़ा सवाल छोड़ रही है क्या अवैध को रोकने के लिए वैध रास्ता ही एकमात्र विकल्प है?
हर दिन लाखों का अवैध कारोबार?
ग्रामीणों का दावा है कि क्षेत्र में रोजाना 4 से 5 लाख रुपये तक की अवैध शराब,खासकर मध्यप्रदेश से लाई गई अंग्रेजी शराब, बेची जा रही है, यदि यह आंकड़ा सही है,तो यह केवल स्थानीय स्तर का नहीं,बल्कि बड़े नेटवर्क का संकेत देता है,ग्रामीणों का कहना है कि वैध दुकान खुलने से इस अवैध कारोबार पर लगाम लग सकती है।
तर्कः‘सरकारी दुकान से रुकेगा अवैध धंधा’
ग्रामीणों का मानना है कि यदि गांव में अधिकृत शराब दुकान खुलती है,तो बाहर से आने वाली अवैध शराब की तस्करी अपने आप बंद हो जाएगी,उनका कहना है कि अभी दुकान न होने के कारण लोग मजबूरी में अवैध शराब खरीदते हैं, जिससे माफियाओं का कारोबार फल-फूल रहा है।
सामाजिक बनाम प्रशासनिक दुविधा
यह मामला प्रशासन के लिए एक नई तरह की चुनौती बन गया है, एक तरफ ग्रामीणों की मांग है कि वैध दुकान खोलकर अवैध कारोबार पर रोक लगाई जाए, वहीं दूसरी तरफ शराब दुकान के सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, आमतौर पर जहां शराब दुकानों का विरोध होता है, वहां यह समर्थन प्रशासन के लिए निर्णय को और जटिल बना रहा है।
अधिकारियों का रुख :- ‘जांच के बाद फैसला’
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीणों की मांग और पूरे मामले का गंभीरता से परीक्षण किया जा रहा है, सभी पहलुओं—कानूनी, सामाजिक और आर्थिक—को ध्यान में रखते हुए ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
विरोध से समर्थन तक—ग्रामीणों का बदला रुख
ग्राम पंचायत जिल्दा में शराब दुकान को लेकर पहले विरोध प्रदर्शन देखने को मिला था,महिला और पुरुष ग्रामीण जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर दुकान नहीं खोलने की मांग कर चुके थे,लेकिन अब वही ग्रामीण समस्या समाधान शिविर में पहुंचकर शराब दुकान खोलने की मांग करते नजर आए। इस यू-टर्न ने पूरे मामले को और ज्यादा चर्चित बना दिया है।
अवैध शराब माफिया पर गंभीर आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि अवैध शराब बेचने वाले माफिया उन्हें गुमराह कर रहे थे,बताया गया कि माफिया लोगों को यह कहकर भड़काते हैं कि यदि शासकीय दुकान खुल जाएगी तो महुआ शराब का स्थानीय व्यवसाय बंद हो जाएगा,ग्रामीणों का कहना है कि इसी बहकावे में आकर पहले विरोध किया गया,लेकिन अब सच्चाई सामने आने के बाद वे खुद वैध दुकान की मांग कर रहे हैं।
चक्काजाम और एफआईआर मामला हुआ गंभीर
बीते दिनों जिल्दा में शराब दुकान के विरोध में चक्काजाम किया गया था, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी,सूचना मिलने पर बैकुंठपुर से पुलिस बल पहुंचा और जाम को हटाया गया,इस मामले में करीब 30 लोगों के खिलाफ बिना अनुमति चक्काजाम करने पर एफआईआर दर्ज की गई है और जांच जारी है,यह घटना इस बात का संकेत है कि मामला केवल मांग या विरोध तक सीमित नहीं,बल्कि कानून-व्यवस्था से भी जुड़ चुका है।


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