

- रेंजर,डीएफओ सब बौने,चाबुक पर नाचता सिस्टम!
- निर्माण में इंजीनियरिंग,संरक्षण में सन्नाटा…प्रभार के लिए भटका रेंजर,अब खुल रही परतें
- रेंजर भटका, साहब अटका…सोनहत में प्रभार बना ‘पावर गेम’
- डीएफओ भी मूकदर्शक? सोनहत रेंज में प्रभारी का ‘सुपर पावर’ खेल
- जंगल संरक्षण छोड़ ‘निर्माण’ में व्यस्त साहब, अब प्रभार विवाद ने खोली पोल
- सोनहत में नियम नहीं,‘साहब’ चलते हैं—रेंजर बना दर्शक
- किसके संरक्षण में फल-फूल रहा दबदबा?सोनहत में प्रभार विवाद से उठे बड़े सवाल
- प्रभार के लिए भटका रेंजर,सिस्टम रहा खामोश—सोनहत रेंज में बड़ा विवाद
-रवि सिंह-
कोरिया,12 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत परिक्षेत्र में इन दिनों वन विभाग नहीं, बल्कि‘एक व्यक्ति का शासन’ चलता दिखाई दे रहा है,प्रभारी रेंजर महेश टुंडे पर आरोप है कि उन्होंने विभागीय व्यवस्था को इस तरह साध लिया कि रेंजर,डीएफओ और यहां तक कि संचालक स्तर के आदेश भी उनके आगे बौने नजर आने लगे, जंगल और वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाले ‘साहब’ का ध्यान पेड़ों से ज्यादा कंक्रीट पर रहा, और वह भी ऐसी गुणवत्ता के साथ,जिसकी चर्चा अब दबे स्वर में नहीं, खुलकर हो रही है,स्थिति तब और विडंबनापूर्ण हो गई जब नवपदस्थ रेंजर को प्रभार लेने के लिए मानो ‘दरबार’ लगाना पड़ा,और अंततःउन्हें मजबूरी में एकतरफा चार्ज लेना पड़ा,पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक तंत्र मूकदर्शक बना रहा और ‘चाबुक’ एक ही हाथ में दिखा,अब सवाल यह है कि आखिर यह दबदबा किसके संरक्षण में पनपा और क्या इस ‘जंगलराज’ की कभी निष्पक्ष जांच हो पाएगी?
बता दे की कोरिया जिले के सोनहत परिक्षेत्र में इन दिनों वन विभाग की कहानी कुछ ऐसी चल रही है,मानो जंगल में ‘राजा’ शेर नहीं, बल्कि एक ही अधिकारी का ‘सिक्का’ चलता हो, प्रभारी रेंजर महेश टुंडे को लेकर विभागीय गलियारों में जो चर्चाएं हैं, वे किसी साधारण प्रशासनिक व्यवस्था की नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘सिस्टम’ की तस्वीर पेश करती हैं जहां आदेश ऊपर से आते जरूर हैं, लेकिन मानने या न मानने का अधिकार नीचे बैठे एक ही व्यक्ति के पास होता है, कहते हैं कि नियम-कायदों की किताबें अलमारियों में धूल खा रही हैं और ज़मीन पर एक अलग ही ‘लोकल संविधान’ लागू है,रेंजर से लेकर डीएफओ तक की भूमिका यहां औपचारिक नजर आती है,जबकि असली नियंत्रण किसके हाथ में है,यह किसी से छुपा नहीं,वन और वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी जिस पद पर होती है, वहां निर्माण कार्यों का ऐसा ‘इंजीनियरिंग मॉडल’ खड़ा हो गया कि जंगल कम और ठेकेदारी ज्यादा दिखाई देने लगी,जो बना,कैसे बना, किस गुणवत्ता से बना, यह सब भी उतना ही सार्वजनिक रहस्य है जितना यह कि इसकी जांच करेगा आखिर कौन? स्थिति की विडंबना तब और गहरी हो गई जब सोनहत के लिए नियुक्त नए रेंजर को प्रभार लेने के लिए ‘पद’ से ज्यादा ‘परिस्थिति’ से जूझना पड़ा, हालात ऐसे बने कि मानो विभागीय कार्यालय कोई प्रशासनिक इकाई नहीं,बल्कि एक ‘सर्कस’ हो जहां एक के हाथ में चाबुक और दूसरे को उसी इशारे पर घूमना पड़े, बताया जाता है कि नए रेंजर को अंततः वही करना पड़ा,जो वे करना नहीं चाहते थे एकतरफा प्रभार लेना और फिर शिकायतों का पुलिंदा ऊपर तक पहुंचाना,अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसने क्या किया, बल्कि यह है कि इतने लंबे समय तक यह सब चलता कैसे रहा? क्या यह केवल एक अधिकारी का प्रभाव है,या फिर इसके पीछे कोई अदृश्य संरक्षण तंत्र भी सक्रिय है? विभागीय चुप्पी,अधिकारियों की खामोशी और लगातार उठते आरोप ये सब मिलकर एक ऐसे‘काले अध्याय’की ओर इशारा कर रहे हैं,जिसकी परतें खुलीं तो कहानी शायद और भी चौंकाने वाली होगी।
सोनहत में ‘एकछत्र राज’,आदेश बने औपचारिकता
सोनहत परिक्षेत्र में प्रभारी रेंजर महेश टुंडे का प्रभाव इस कदर बताया जा रहा है कि विभागीय आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए, रेंजर और डीएफओ जैसे पद जहां व्यवस्था के स्तंभ माने जाते हैं, वहीं यहां वे भी प्रभावहीन नजर आए,सूत्रों के अनुसार,लंबे समय से टुंडे का दबदबा ऐसा रहा कि उनके सामने कोई भी अधिकारी खुलकर निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था,यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
जंगल कम,‘निर्माण’ ज्यादा—भूमिका बदली या प्राथमिकता?
वन विभाग का मूल उद्देश्य जहां जंगल और वन्यजीवों का संरक्षण होता है,वहीं सोनहत में तस्वीर कुछ अलग नजर आई, प्रभारी रेंजर पर आरोप है कि उन्होंने अपनी भूमिका को ‘संरक्षक’ से ज्यादा ‘निर्माता’ बना लिया। स्टाफ डैम,तालाब और अन्य निर्माण कार्यों पर उनका विशेष फोकस रहा,लेकिन इन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे,स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कई कार्य मानकों के अनुरूप नहीं हैं, और इनकी जांच की जरूरत है,अब बड़ा सवाल यही है क्या ये निर्माण विकास का हिस्सा थे या किसी और कहानी की नींव?
प्रभार का ‘ड्रामा’ः रेंजर बना इंतजार में खड़ा किरदार
नवपदस्थ रेंजर को सोनहत परिक्षेत्र में भेजा गया, लेकिन यहां स्थिति किसी प्रशासनिक प्रक्रिया से ज्यादा ‘व्यक्तिगत नियंत्रण’ की कहानी बन गई, रेंजर को प्रभार लेने के लिए लगातार प्रयास करना पड़ा, बताया जाता है कि वे प्रभारी रेंजर के पीछे-पीछे घूमते रहे,जबकि प्रभारी रेंजर उन्हें टालते रहे, आखिरकार, जब हालात असहनीय हो गए,तो रेंजर ने मजबूरी में एकतरफा प्रभार ग्रहण किया। यह कदम अपने आप में दर्शाता है कि व्यवस्था कितनी असामान्य स्थिति में पहुंच चुकी थी।
‘चाबुक’ और ‘सर्कस’ वाली स्थिति?
विभागीय सूत्रों के अनुसार,पूरे घटनाक्रम में स्थिति इतनी विचित्र थी कि इसे ‘सर्कस’ से तुलना की जा रही है,कहा जा रहा है कि प्रभारी रेंजर के हाथ में ‘चाबुक’ था और बाकी सिस्टम उसी के इशारों पर चलता नजर आ रहा था,सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे घटनाक्रम में उच्च अधिकारी भी मूकदर्शक बने रहे,अब सवाल उठता है—क्या यह केवल लापरवाही थी या फिर किसी बड़े संरक्षण का संकेत?
शिकायत पहुंची ऊपर तक,अब जांच की मांग
एकतरफा प्रभार लेने के बाद रेंजर ने पूरे मामले की शिकायत उच्च स्तर तक पहुंचाई है,शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि पूर्व कार्यकाल में कई अनियमितताएं हुई हैं,जिनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,यह मामला अब केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे विभागीय ढांचे की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
‘दूसरे अखिलेश मिश्रा’ बनने की चर्चा
वन विभाग के गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि महेश टुंडे खुद को जिले के प्रभावशाली अधिकारी अखिलेश मिश्रा की तरह स्थापित करना चाहते हैं, हालांकि जहां मिश्रा की पहचान उनके प्रशासनिक प्रभाव के लिए रही, वहीं टुंडे के मामले में विवाद और आरोप ज्यादा चर्चा में हैं,यह तुलना भी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, क्या प्रभाव और विवाद का यह मिश्रण भविष्य में और बड़े विवादों को जन्म देगा?
‘सिक्का’ जमाने की कोशिश,अब रेहन्द पर नजर
सोनहत में विवादों के बीच अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि महेश टुंडे की नजर रेहन्द परिक्षेत्र पर है,बताया जा रहा है कि वे किसी अन्य रेंजर के अधीन काम करने को तैयार नहीं हैं और स्वतंत्र प्रभार पाने के लिए प्रयासरत हैं,यदि ऐसा होता है,तो यह विभागीय व्यवस्था के लिए एक और चुनौती बन सकता है।
जांच होगी या मामला दबेगा?
सोनहत परिक्षेत्र का यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रहा, बल्कि संभावित बड़े वित्तीय घोटाले का संकेत बन चुका है,यदि इस मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच होती है,तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं,लेकिन यदि इसे भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया गया,तो यह वन विभाग की साख पर गहरा असर डालेगा,अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि टाइगर रिजर्व प्रबंधन और शासन इस ‘रिकॉर्ड कांड’ पर क्या कार्रवाई करता है सख्ती या फिर खामोशी।
सबसे बड़ा सवाल : संरक्षण किसका?
पूरे मामले का सबसे अहम और संवेदनशील सवाल यही है आखिर यह सब किसके संरक्षण में हो रहा था? यदि सात वर्षों तक शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल व्यक्तिगत प्रभाव का मामला नहीं हो सकता, यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर ही ऐसी खामियां या सांठगांठ मौजूद है, जिसने इस स्थिति को जन्म दिया, सोनहत परिक्षेत्र का यह मामला अब केवल एक अधिकारी के प्रभाव या प्रभार विवाद तक सीमित नहीं रहा, यह वन विभाग की कार्यप्रणाली,जवाबदेही और पारदर्शिता पर सीधा सवाल है,यदि इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होती है, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं, लेकिन यदि इसे भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया गया, तो यह ‘जंगलराज’ का एक और अध्याय बनकर रह जाएगा, अब देखना यह है कि सिस्टम जागता है या फिर ‘चाबुक’ का असर यूं ही चलता रहेगा।
उठते सवाल,बढ़ती चिंता
छह साल का रिकॉर्ड आखिर कहां गया?
क्या यह वित्तीय अनियमितताओं को छुपाने की साजिश है?
क्या विभाग के अन्य अधिकारी भी इसमें शामिल हैं?
क्या इस बार निष्पक्ष जांच होगी?
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