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रायपुर,@ धान भुगतान पर सियासी संग्राम, मालामाल’ की राजनीति या मेहनत का हक?

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  • धान भुगतान पर सियासी ‘मालामाल’ जंग : किसान का हक¸ या श्रेय की होड़?
  • किसान के खाते में पैसा, नेताओं में बयानबाज़ी का बवाल…
  • मालामाल’ पोस्टर से गरमाई राजनीति,कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने…
  • धान अंतर राशि पर सियासी टकराव : भुगतान से ज्यादा प्रचार पर बहस
  • सरकार बदली,योजना वहीः धान भुगतान पर क्यों मचा श्रेय संग्राम¸?
  • किसान की मेहनत बनाम राजनीति का मसालाः ‘मालामाल’ विवाद की पूरी कहानी
  • धान उगाया किसान ने, ‘मालामाल’ हो गए नेता!
  • किसान की कमाई पर सियासी तकरारः माल किसका, श्रेय किसका?

-न्यूज डेस्क-
रायपुर,02 मार्च 2026(घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में 28 फरवरी को धान की अंतर राशि किसानों के खातों में पहुंचते ही सियासत गरमा गई, भाजपा समर्थित सोशल मीडिया पोस्टों और बैनरों में यह प्रचार किया गया कि कांग्रेस के बड़े नेता भी भाजपा सरकार में मालामाल हो गए, जवाब में कांग्रेस ने इसे किसानों की मेहनत के पैसे पर राजनीति बताया, मामला अब सिर्फ भुगतान का नहीं, बल्कि श्रेय लेने की होड़ और मालामाल शब्द की राजनीतिक व्याख्या का बन गया है।
धान का भुगतान कोई दया या उपहार नहीं,बल्कि किसान की उपज का मूल्य है, नेता चाहे किसी भी दल का हो, यदि वह किसान है और धान बेचता है, तो भुगतान उसका अधिकार है, इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यही है की क्या किसान को समय पर और पूरा भुगतान मिल रहा है? यदि हाँ,तो यह किसानों की जीत है,यदि नहीं, तो बहस मालामाल से आगे बढ़कर नीतियों की समीक्षा तक जानी चाहिए,राजनीति अपने स्थान पर है, लेकिन खेत में खड़ा किसान दल नहीं देखता है की वह सिर्फ मेहनत और उसकी कीमत देखता है।
भुगतान की पृष्ठभूमि
राज्य सरकार द्वारा धान खरीदी और अंतर राशि का भुगतान एक स्थापित व्यवस्था के तहत किया जाता है,किसान धान बेचते हैं,समर्थन मूल्य और घोषित बोनस/अंतर की राशि सीधे उनके बैंक खातों में अंतरित की जाती है,इस बार भुगतान के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट वायरल हुए,जिनमें यह दिखाने की कोशिश की गई कि,पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खाते में कितनी राशि आई,वरिष्ठ कांग्रेस नेता चरण दास महंत को कितना भुगतान मिला,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के खाते में कितनी अंतर राशि डाली गई,इन पोस्टों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश हुई कि भाजपा सरकार आने के बाद कांग्रेस नेता भी मालामाल हो गए।
भूपेश बघेल का पलटवार
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा हाँ जी, हुए मालामाल! किसान हैं तो माल उगाया और बेचा तो माल आया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान विष्णु देव साय सरकार ने पर्याप्त खाद और बिजली उपलब्ध नहीं कराई,इसके बावजूद किसानों ने मेहनत से फसल तैयार की, उनका कहना है कि धान का भुगतान किसी सरकार की कृपा नहीं,बल्कि किसान का अधिकार है,बघेल ने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस सरकार ने किसानों को बोनस और समर्थन मूल्य के जरिए आर्थिक सुरक्षा देने की कोशिश की थी। साथ ही उन्होंने भाजपा शासन के 15 वर्षों में किसानों की स्थिति और आत्महत्याओं का मुद्दा उठाया।
भाजपा का पक्ष
भाजपा समर्थकों का तर्क है कि वर्तमान सरकार ने वादा निभाते हुए अंतर राशि का भुगतान सुनिश्चित किया,कांग्रेस नेता भी किसान हैं तो उन्हें भी समान रूप से लाभ मिला,इससे साबित होता है कि सरकार बिना भेदभाव के भुगतान कर रही है,हालांकि,आलोचकों का कहना है कि व्यक्तिगत खातों की राशि का प्रचार राजनीतिक संदेश देने का प्रयास है।
असली सवाल क्या है?
क्या किसान को उसकी उपज का पूरा भुगतान मिल रहा है? क्या यह भुगतान किसी दल विशेष की कृपा है या नीतिगत प्रक्रिया? क्या पूर्व सरकार में भाजपा नेताओं को भुगतान नहीं मिलता था? यदि भाजपा या कांग्रेस का कोई भी नेता किसान है और उसने धान बेचा है, तो उसे भुगतान मिलना स्वाभाविक है,यही वह बिंदु है जहाँ से व्यंग्य शुरू होता है सरकार बदलती है,किसान वही रहता है, फसल वही रहती है,भुगतान की प्रक्रिया भी लगभग वही रहती है,लेकिन श्रेय की राजनीति बदल जाती है।
मालामाल शब्द पर विवाद
कांग्रेस का कहना है कि किसानों की मेहनत की कमाई को माल कहना अपमानजनक है, भूपेश बघेल ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कोई पनामा या घोटाले का पैसा नहीं, बल्कि खेत में पसीना बहाकर कमाई गई राशि है, दूसरी ओर भाजपा समर्थक इसे राजनीतिक व्यंग्य बताते हैं।


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