- नकली दवा,असली संरक्षण : छत्तीसगढ़ में कौन है मास्टरमाइंड?
- बिल असली,माल नकलीः भाटापारा से फैलता ‘हेल्थ घोटाला’
- जांच जारी है…पर एफआईआर गायबः दवा कांड का अनकहा सच
- चार नाम, एक नेटवर्क? औषधि विभाग पर उठते गंभीर सवाल
- दवा के नाम पर धोखाः सिस्टम की सेहत ठीक, मरीज बेहाल
- सफेद कोट की सियासतः नकली दवाइयों का कथित खेल
- लैब में फेल,फाइल में पासः छत्तीसगढ़ का दवा रहस्य इलाज या इल्युज़न? नकली दवा सिंडिकेट की परतें
- स्वास्थ्य से खिलवाड़ः किसके संरक्षण में फल-फूल रहा दवा का कारोबार?
न्यूज डेस्क
रायपुर,26 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। कहते हैं दवा कड़वी हो तो असर करती है,मगर छत्तीसगढ़ में इन दिनों जो ‘दवा’ बाजार में घूम रही है,वह इतनी मीठी है कि सिस्टम को कुछ नहीं होता—बस मरीजों की सेहत पर ही कड़वाहट उतरती है,नकली या संदिग्ध गुणवत्ता वाली दवाइयों का कथित सिंडिकेट सालों से फल-फूल रहा है,और हर बार की तरह सवाल पूछने वालों को ‘जांच जारी है’ की गोली देकर शांत कर दिया जाता है।
भाटापाराः जहां बिल असली,माल ‘कलात्मक’
सूत्रों की मानें तो इस कथित खेल का केंद्र भाटापारा (जिला बलोदा बाजार) बताया जाता है,यहां का मॉडल बड़ा वैज्ञानिक है—बिल असली कंपनी का,पैकेट नकली,और भरोसा जनता का,दिसंबर 2025 में ट्रांसपोर्ट से पकड़ी गई खेप लैब में फेल हो गई,पर केस फाइल शायद‘पास’हो गई—क्योंकि आज तक एफ आई आर नहीं। ट्रांसपोर्टर,सप्लायर, रिसीवर—तीनों के खिलाफ कार्रवाई की सुई जैसे ‘लो ब्लड प्रेशर’ में अटकी रह गई।
कारोबार का कथित ‘वैज्ञानिक’ मॉडल
– बाहर के राज्यों से सस्ती/संदिग्ध दवाइयों की खेप।
– ट्रांसपोर्ट में‘आराम’—जब तक कागज़ी योगासन पूरे न हों।
– असली कंपनियों के बिलों का ‘क्रिएटिव’ उपयोग।
– चुनिंदा होल सेलरों के जरिए बाजार में एंट्री।
– शिकायत पर सीमित कार्रवाई, पर एफआईआर से परहेज—ताकि सबकी सेहत ठीक रहे।
सिस्टम इतना फिट है कि मरीज ही
अनफिट पड़ जाता है।
CGMSC की परछाईं-छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन में कथित अनियमितताओं की जांच ने पहले भी सुर्खियां बटोरीं। सवाल उठता है—यदि गंभीर आरोपों के बाद भी कुर्सियां सुरक्षित हैं, तो जनता की दवा कितनी सुरक्षित होगी?यहां फाइलें शायद एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट हो गई हैं—कोई भी कार्रवाई उन पर असर नहीं करती।
‘जांच जारी है’ की शुगर-फ्री गोली- दिसंबर 2025 की जब्ती के बाद लैब रिपोर्ट में दवा नकली पाई गई,मोबाइल में कथित सबूत,बिल में असली कंपनी का नाम—सब कुछ मिला,बस एफआईआर नहीं मिली, क्या वजह है? प्रक्रियात्मक देरी? सबूतों की ‘डोज़’ कम? या फिर संरक्षण की ‘ओवरडोज़’?जब जवाब नहीं मिलता,तो व्यंग्य ही बचता है।
सबसे बड़ा दुष्प्रभाव : जनता-टीबी, कैंसर,डायबिटीज के मरीजों को नकली दवा—सीधा जीवन से खिलवाड़,एंटीबायोटिक की नकली खुराक—रेसिस्टेंस का खतरा,गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर जानलेवा असर,यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं,यह भरोसे की हत्या है,दवा पर भरोसा टूटे तो अस्पताल की दीवारें भी संदिग्ध लगने लगती हैं।
सरकार के लिए ‘हेल्थ चेक-अप’- चाहे सरकार किसी भी दल की हो,यदि वर्षों से यह कथित नेटवर्क चलता रहा तो यह सामूहिक विफलता है,जरूरत है—स्वतंत्र SIT/ACB जांच की,जब्ती के हर केस में अनिवार्य एफआईआर की समयसीमा तय करने की,लाइसेंसिंग और पोस्टिंग में पारदर्शिता की,व्हिसलब्लोअर सुरक्षा की,अगर आरोप झूठे हैं तो पारदर्शी जांच से क्लीन चिट दीजिए,अगर सच हैं तो कठोर कार्रवाई कीजिए—ताकि अगली बार कोई दवा से दग़ा न कर सके।
कड़वी सच्चाई की जरूरत
छत्तीसगढ़ में दवा का बाजार सिर्फ कारोबार नहीं,जीवन की उम्मीद है,मगर जब उम्मीद पर ही ‘डुप्लीकेट’ का ठप्पा लगे,तो सवाल उठना लाजिमी है—मास्टरमाइंड कौन? संरक्षण किसका? जनता को अब ‘जांच जारी है’ की नहीं, जवाबदेही की दवा चाहिए,वरना यह सफेद कोट का बुखार बढ़ता ही जाएगा—और इलाज के नाम पर फिर वही मीठी गोली मिलती रहेगी।
अगले अंक में…
अगले अंक में पढि़ए—‘बेनी राम साहू की राजनीतिक पकड़ और कथित कारनामे’ कौन हैं संरक्षणकर्ता? कैसे बनी नेटवर्क की परतें? और सत्ता-सिस्टम के बीच क्या है कनेक्शन? जुड़े रहिए… क्योंकि कहानी अभी बाकी है।
डिस्क्लेमर
इस समाचार में प्रकाशित तथ्यों,नामों और घटनाओं का आधार प्राप्त दस्तावेज़ों,सूत्रों,शिकायतों एवं उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है,उल्लेखित आरोप संबंधित व्यक्तियों/संस्थाओं के विरुद्ध लगाए गए कथित आरोप हैं, जिनकी अंतिम पुष्टि सक्षम जांच एजेंसी अथवा न्यायालय के निर्णय से ही होगी,समाचार का उद्देश्य जनहित के मुद्दे को उठाना एवं पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करना है, न कि किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाना,यदि संबंधित पक्ष अपना स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया देना चाहते हैं,तो उन्हें यथोचित स्थान प्रदान किया जाएगा।
सिंडिकेट का कथित ‘चार स्तंभ’- सूत्रों के दावों में चार नाम बार-बार तैरते हैं…
– बेणीराम-स्थानांतरण के बाद भी प्रभाव कायम रखने की चर्चा।
– नीरज-एक ही जगह पर वर्षों से ड्रग इंस्पेक्टर,अनुभव इतना कि सिस्टम भी उनसे सलाह ले ले।
– रविंद्र गेंदले-जांजगीर चंपा में पदस्थ, एसीबी ने रिश्वत लेते पकड़ा था पर चर्चा रायपुर तक।
– हिरण पटेल -जिनका नाम पहले छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन से जुड़े कथित 750 करोड़ के घोटाले में उछला। (स्पष्ट रहेः ये आरोप सूत्रों पर आधारित हैं; आधिकारिक पुष्टि/न्यायिक निर्णय लंबित हैं।) व्यंग्य यही है कि अगर यह सब अफवाह है तो अफवाह बहुत संगठित है—और अगर सच है तो सच बहुत सुरक्षित है।
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