- जिला अस्पताल बैकुंठपुर में उठे संपत्ति और पदोन्नति के गंभीर सवाल
- रात की रखवाली से करोड़ों की कमाई तक: अस्पताल के चौकीदार की अमीरी ने मचाया हड़कंप
- जिला अस्पताल का चौकीदार कैसे बन गया जिले के सबसे अमीर कर्मचारियों में शामिल?
- चतुर्थ श्रेणी की नौकरी, करोड़ों की संपत्ति — बैकुंठपुर अस्पताल में बड़ा सवाल
- आय से अधिक संपत्ति का मामला? चौकीदार से लिपिक बने कर्मचारी पर उठे कई संदेह चौकीदार की चौकी से करोड़ों की चाबी तक. जिला अस्पताल बैकुंठपुर में करोड़ों की संपत्ति वाला चौकीदार चर्चा में
- रात की पहरेदारी से लेकर एकड़ो जमीन, करोड़ों के विवाह भवन और पदोन्नति तक —
- एक साधारण कर्मचारी कैसे बन गया जिले का सबसे अमीर व्यक्ति?
-राजन पाण्डेय-
कोरिया/बैकुंठपुर,28 जनवरी 2026(घटती-घटना)। आमतौर पर अस्पताल परिसरों में रात-रात भर पहरा देने वाले चौकीदारों का जीवन संघर्ष,सीमित आय और साधारण जरूरतों के बीच गुजरता है,उनकी जिम्मेदारी अस्पताल की सुरक्षा तक सीमित मानी जाती है,लेकिन जिला अस्पताल बैकुंठपुर में पदस्थ एक चौकीदार की कहानी इन सभी धारणाओं को पूरी तरह बदलती नजर आ रही है,यह कोई अफवाह या कल्पना नहीं,बल्कि शिकायत,दस्तावेजी जानकारियों और विभागीय चर्चाओं के आधार पर सामने आया मामला है, जिसने न केवल स्वास्थ्य विभाग बल्कि पूरे जिले को हैरानी में डाल दिया है,यह वही चौकीदार है,जो कुछ वर्ष पहले तक अस्पताल गेट पर पहरा देता था और आज कोरिया जिले के सबसे अमीर लोगों की सूची में उसका नाम लिया जा रहा है।
बता दे की एक साधारण चौकीदार का एकड़ो जमीन का मालिक बन जाना,करोड़ों के विवाह भवन की तैयारी करना और जिले के अमीरों से आगे निकल जाना सवाल खड़े करता है,अब यह शासन और प्रशासन पर निर्भर करता है कि क्या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा या सच्चाई सामने लाई जाएगी,क्योंकि जब पहरेदार ही महल बना ले,तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
चौकीदार नहीं, एक असाधारण कहानी- यह मामला तब सार्वजनिक हुआ जब उक्त चौकीदार को पदोन्नति देते हुए तृतीय श्रेणी लिपिक बनाया गया, पदोन्नति सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थी, लेकिन जैसे ही उसका सेवा रिकॉर्ड और संपत्ति विवरण चर्चा में आया, अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक सभी चौंक गए, क्योंकि उसकी संपत्ति लिपिक बनने के बाद अर्जित नहीं हुई, बल्कि उस समय अर्जित हुई जब वह केवल चतुर्थ श्रेणी चौकीदार था, यहीं से यह मामला सामान्य से असामान्य बन गया।
वरिष्ठता को दरकिनार कर हुई पदोन्नति?- इस पदोन्नति को लेकर एक वरिष्ठ चौकीदार ने विभाग में शिकायत दर्ज कराई है, शिकायत में उल्लेख है कि वह वरिष्ठता सूची में पहले स्थान पर था, वर्षों से सेवा दे रहा था, फिर भी उसे पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उसकी जगह ऐसे कर्मचारी को पदोन्नत किया गया जिसकी आर्थिक हैसियत जिले के बड़े कारोबारियों से भी अधिक बताई जा रही है, अब सवाल उठ रहा है कि क्या पदोन्नति योग्यता से हुई? या फिर प्रभाव, संपर्क और आर्थिक ताकत ने रास्ता बनाया?
अचल संपत्तियों का अंबार- सूत्रों के अनुसार चौकीदार द्वारा अर्जित अचल संपत्तियों की संख्या असाधारण है, जानकारी के मुताबिक बैकुंठपुर शहर, पटना–बैकुंठपुर मार्ग, कोरिया ग्रामीण क्षेत्र, तथा पड़ोसी जिला सूरजपुर में स्वयं और पत्नी के नाम पर एकड़ो भूमि दर्ज है, ये जमीनें बाजार मूल्य पर खरीदी गईं, जिनकी कीमत करोड़ों में आंकी जा रही है प्रश्न यह नहीं कि जमीन खरीदी गई, प्रश्न यह है कि एक चौकीदार इतनी पूंजी कहां से लाया?
एकड़ो जमीन, लेकिन आय का स्रोत अस्पष्ट- यदि सरकारी वेतन की बात करें तो चौकीदार का वेतन सीमित होता है, उससे परिवार चलाना ही मुश्किल होता है, ऐसी स्थिति में करोड़ों की जमीन, महंगे रजिस्ट्री शुल्क, टैक्स और निर्माण निवेश, कैसे संभव हुआ यह सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है।
भांडी में करोड़ों का विवाह भवन- सूत्रों के अनुसार कोरिया जिले के भांडी क्षेत्र में एक भव्य विवाह भवन (मैरेज पैलेस) के निर्माण की तैयारी की जा रही है, बताया जाता है कि निर्माण की लागत करोड़ों रुपये में है, नक्शा और प्रारंभिक तैयारी पूरी हो चुकी है, भवन आधुनिक सुविधाओं से युक्त होगा, यह जानकारी सामने आने के बाद चर्चा और तेज हो गई, क्योंकि जहां कई अधिकारी 30 वर्ष की नौकरी के बाद भी ऐसा भवन नहीं बना पाते, वहां एक चौकीदार द्वारा ऐसा निवेश असामान्य माना जा रहा है।
क्या विभागीय अनुमति ली गई?- शासकीय सेवा नियम स्पष्ट कहते हैं कोई भी सरकारी कर्मचारी अचल संपत्ति खरीदने से पहले, विभागीय अनुमति लेना अनिवार्य है, अब सवाल यह है कि क्या चौकीदार ने प्रत्येक जमीन खरीद के लिए अनुमति ली? क्या संपत्ति विवरण वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन में दर्शाया गया? यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह— सेवा शर्तों के गंभीर उल्लंघन और आय से अधिक संपत्ति का मामला बनता है।
चौकीदार या अस्पताल का बाबू?- सूत्रों के अनुसार यह कर्मचारी पद से चौकीदार था, लेकिन कार्य व्यवहार में वह वर्षों तक लिपिक की भूमिका निभाता रहा, बताया जाता है कि उसे जिला चिकित्सालय की कई शाखाओं का प्रभार मिला, विशेष रूप से मेडिकल बिल रिंबर्समेंट शाखा, यह वही शाखा है जहां से शासकीय कर्मचारियों के इलाज के बिल, लाखों रुपये की फाइलें, द्वितीय अभिमत जैसी संवेदनशील प्रक्रियाएं संचालित होती हैं।
मेडिकल बिल रिंबर्समेंट बना कथित कमाई का जरिया- सूत्रों का दावा है कि मेडिकल बिल के द्वितीय अभिमत के लिए, प्रति बिल कम से कम 10 प्रतिशत राशि मांगी जाती थी, यह राशि नकद, तत्काल, बिना रसीद ली जाती थी, बिना भुगतान के फाइल आगे नहीं बढ़ती थी।
कर्मचारी मजबूरी में देते थे पैसा- शासकीय कर्मचारियों का कहना है कि मेडिकल क्लेम पहले ही वर्षों अटका रहता है, बीमारी के समय कर्ज लेकर इलाज होता है, यदि द्वितीय अभिमत रोका जाए तो भुगतान असंभव हो जाता है, इस मजबूरी का फायदा उठाकर यह “परंपरा” वर्षों तक चलती रही।
कहा जाता है – सिस्टम आज भी वही है– सूत्र बताते हैं कि चौकीदार के पदोन्नत होने के बाद, वही प्रक्रिया आज भी किसी न किसी रूप में जारी है यानी व्यक्ति बदला, पर व्यवस्था नहीं।
आरएसएस से सक्रिय जुड़ाव भी चर्चा में- हाल के दिनों में कर्मचारी का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सक्रिय जुड़ाव भी चर्चाओं में है, स्थानीय लोगों का कहना है पहले ऐसा जुड़ाव सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आता था, अब अचानक कार्यक्रमों और गतिविधियों में उपस्थिति बढ़ी है, लोग सवाल कर रहे हैं क्या यह सामाजिक आस्था है या संभावित जांच से बचाव का प्रयास? हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
अब उठ रही है उच्चस्तरीय जांच की मांग- मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन, और शासन स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है, मांग की जा रही है आय से अधिक संपत्ति की जांच, पदोन्नति प्रक्रिया की समीक्षा, मेडिकल बिल शाखा की ऑडिट, बैंक खातों और रजिस्ट्री की पड़ताल
यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं- यह प्रकरण केवल एक चौकीदार तक सीमित नहीं है, यह सवाल खड़ा करता है अस्पतालों में कौन किस पद पर काम कर रहा है?, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को संवेदनशील शाखाएं कैसे मिलीं? वर्षों तक ऑडिट क्यों नहीं हुआ? यदि आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह स्वास्थ्य विभाग के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार मामला बन सकता है।
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