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कोरिया/बैकुंठपुर@ 17 करोड़ का एसईसीएल सब स्टेशन बना भ्रष्टाचार की बुनियाद,नई मिट्टी पर खड़ा हो रहा करोड़ों का ढांचा

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  • कटकोना में नियमों की धज्जियां: बिना क्योरिंग-बिना निगरानी बन रहा 17 करोड़ का विद्युत सब स्टेशन
  • नई मिट्टी पर कॉलम, गिरती दीवारें और गायब इंजीनियर — एसईसीएल का 17 करोड़ का प्रोजेक्ट सवालों में
  • बरसात से पहले ही दरकने लगा 17 करोड़ का निर्माण, एसईसीएल निगरानी पूरी तरह नदारद
  • घटिया निर्माण की भेंट चढ़ा एसईसीएल का ड्रीम प्रोजेक्ट, ठेकेदार की मनमानी चरम पर
  • कॉलम हवा में, नींव कमजोर — 17 करोड़ की लागत से बन रहा सब स्टेशन खतरे में
  • जनधन का खुला दुरुपयोग? बिना तकनीकी जांच बन रहा एसईसीएल विद्युत सब स्टेशन
  • नई मिट्टी पर भविष्य की बिजली व्यवस्था टिकी, कभी भी ध्वस्त हो सकता है 17 करोड़ का ढांचा

-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुंठपुर, 21 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र अंतर्गत कटकोना में 17 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा विद्युत सब स्टेशन अब विकास का नहीं,बल्कि भारी भ्रष्टाचार,तकनीकी लापरवाही और खुले नियम उल्लंघन का प्रतीक बनता जा रहा है,जिस परियोजना से भविष्य में खदानों का बड़ा विस्तार और कोयला उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि होनी है,वही परियोजना आज घटिया निर्माण और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।
यह सब स्टेशन खदानों में लगने वाली अत्याधुनिक भारी मशीनों को विद्युत आपूर्ति के लिए तैयार किया जा रहा है,आगामी समय में दो खदानों के संयुक्त संचालन से कोयला उत्पादन कई गुना बढ़ाया जाना है, इसके लिए बिजली और पानी की अत्यधिक आवश्यकता होगी, इसी उद्देश्य से कटकोना क्षेत्र में विशाल जलाशय तथा 17 करोड़ रुपये की लागत से विद्युत सब स्टेशन निर्माण कार्य चल रहा है,निर्माण का ठेका आरआर प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है, लेकिन जिस तरीके से काम किया जा रहा है, उसने कंपनी की कार्यशैली और एसईसीएल की निगरानी व्यवस्था दोनों की पोल खोल दी है,कटकोना का यह विद्युत सब स्टेशन अब विकास की उम्मीद नहीं, बल्कि भ्रष्ट सिस्टम की चेतावनी बन चुका है,यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई,तो आने वाले दिनों में यह मामला एसईसीएल के इतिहास का सबसे बड़ा निर्माण घोटाला साबित हो सकता है।
नई मिट्टी पर खड़ा किया जा रहा करोड़ों का ढांचा- जानकारी के अनुसार सब स्टेशन जिस भूमि पर बनाया जा रहा है, वह कुछ ही दिन पहले तालाब गहरीकरण से निकली मिट्टी से पटी हुई है, न तो मिट्टी की उचित क्यूरिंग कराई गई,
न ही मिट्टी के बैठने के लिए एक बरसात का इंतजार किया गया, इसके बावजूद उसी कच्ची, नई और अस्थिर मिट्टी पर गहरे गड्ढे खोदकर कॉलम (पिलर) खड़े कर दिए गए, सबसे गंभीर तथ्य यह है कि पुरानी मजबूत मिट्टी तक खुदाई ही नहीं की गई, विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब तक कॉलम मजबूत प्राकृतिक जमीन तक न पहुंचे, तब तक ऐसा निर्माण पूरी तरह अवैज्ञानिक और खतरनाक माना जाता है। दीवारें अभी से दरकने लगीं, भविष्य की तबाही का संकेत- निर्माण स्थल पर बनाई जा रही लगभग 8 फीट ऊंची बाउंड्री वॉल अभी से दरकने और गिरने लगी है, यह कोई सामान्य तकनीकी चूक नहीं, बल्कि इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मिट्टी बैठी नहीं है, नींव कमजोर है, निर्माण गुणवत्ता शून्य है, जानकारों का कहना है कि बरसात आते ही मिट्टी धंसेगी, जिससे कॉलम टेढ़े हो जाएंगे, दीवारों में बड़ी दरारें आएंगी, सब स्टेशन की पूरी संरचना खतरे में पड़ जाएगी, और तब करोड़ों रुपये का यह प्रोजेक्ट सफेद हाथी बनकर रह जाएगा।
बिना इंजीनियर, बिना टेक्निकल टीम, ठेकेदार की मनमानी चरम पर- सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि न साइट पर कोई एसईसीएल इंजीनियर मौजूद है, न कोई नियमित तकनीकी निरीक्षण हो रहा है, न गुणवत्ता जांच की कोई प्रक्रिया दिखाई दे रही है, पूरा निर्माण कार्य ठेकेदार के भरोसे छोड़ दिया गया है, मानो 17 करोड़ रुपये जनता का नहीं, किसी निजी जेब का पैसा हो, स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे एसईसीएल प्रबंधन ने देखो–समझो–पूछो की जिम्मेदारी से पूरी तरह हाथ खड़े कर दिए हों।
विवादित स्थल पर निर्माण, नियमों की खुली अवहेलना- जिस स्थान पर आज सब स्टेशन बनाया जा रहा है, वहां वर्षों से दुर्गा पूजा पंडाल, सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रम, सार्वजनिक आयोजन आयोजित होते रहे हैं, अब बिना समुचित भू-तकनीकी परीक्षण और बिना सामाजिक सहमति के उसी स्थल को सब स्टेशन में तब्दील कर दिया गया है, यह न केवल तकनीकी नियमों का उल्लंघन है, बल्कि प्रबंधन की संवेदनहीनता का भी उदाहरण है।
जनधन का खुला दुरुपयोग या संगठित लापरवाही?- निर्माण की मौजूदा स्थिति को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है, निर्माण नियमों को ताक पर रखा गया है, करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का खुला दुरुपयोग हो रहा है, यदि समय रहते उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो यह परियोजना भविष्य में भारी तकनीकी दुर्घटना विद्युत आपूर्ति ठप होने का खतरा और करोड़ों की अतिरिक्त मरम्मत लागत का कारण बन सकती है।
अब उठ रहे हैं तीखे सवाल
क्या 17 करोड़ की परियोजना बिना निगरानी के यूं ही चलती रहेगी?
क्या एसईसीएल प्रबंधन जानबूझकर आंख मूंदे बैठा है?
क्या घटिया निर्माण पर किसी की जवाबदेही तय होगी?
या फिर बरसात के बाद ढांचा गिरने पर ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?


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