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सरगुजा/अंबिकापुर@सट्टा का मास्टरमाइंड दीप सिन्हा गिरफ्तार लेकिन कई सवाल अब भी जिंदा

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  • दैनिक घटती-घटना की लगातार खबरों के बाद आखिर लगभग दो साल में पुलिस के हत्थे चढ़ा सट्टा सरगना
  • दो साल तक फरार रहा सरगुजा का सट्टा सरगना,क्या सिस्टम ने जानबूझकर बचाया?
  • दो साल तक फरार सट्टा माफिया दीप सिन्हा आखिर कैसे बचता रहा? गिरफ्तारी से ज्यादा बड़ा सवाल पुलिस पर
  • सट्टा माफिया दीप सिन्हा गिरफ्तार—लेकिन सवाल पुलिस पर भारी
  • करोड़ों का सट्टा, 300 फर्जी खाते…फिर भी दो साल तक फरार रहा दीप! क्या सिस्टम ने जानबूझकर बचाया?
  • दीप पकड़ा गया, लेकिन अब सवाल पुलिस से, इतने साल तक सट्टा सरगना कैसे रहा अदृश्य?
  • सट्टा मास्टरमाइंड दीप सिन्हा गिरफ्त में, अब खुलेगा पुलिस-सट्टा गठजोड़ का राज?
  • जब पूरा जिला जानता था,तब पुलिस क्यों नहीं जान पाई?
  • – दीप की गिरफ्तारी नहीं,सिस्टम की विफलता उजागर हुई
  • – दीप पकड़ा गया,अब बारी सच के पर्दाफाश की, दो साल तक फरार रहा सट्टा मास्टरमाइंड, पुलिस भूमिका पर उठे गंभीर सवाल


न्यूज डेस्क
सरगुजा/अंबिकापुर,20 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा अंचल में वर्षों से सक्रिय करोड़ों रुपये के अवैध ऑनलाइन सट्टा कारोबार के मास्टरमाइंड आयुष सिन्हा उर्फ दीप सिन्हा की गिरफ्तारी के बाद जहां पुलिस इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है, वहीं आम जनता और जागरूक नागरिकों के मन में कई गंभीर सवाल अब भी खड़े हैं। बता दे की यह वही दीप सिन्हा है, जिसे लेकर दैनिक घटती-घटना ने बीते दो वर्षों में लगातार कई बार खोजी खबरें प्रकाशित की थीं फिर भी आरोपी लगभग दो साल तक कानून की पकड़ से बाहर रहा,आखिरकार वही हुआ, जिसकी उम्मीद सरगुजा की जनता दो वर्षों से कर रही थी,करोड़ों रुपये के अवैध ऑनलाइन सट्टा कारोबार का मास्टरमाइंड आयुष सिन्हा उर्फ दीप सिन्हा अब पुलिस की गिरफ्त में है,लेकिन गिरफ्तारी से ज्यादा बड़ा सवाल यह नहीं है कि दीप पकड़ा गया, बल्कि यह है कि दीप को दो साल तक पकड़ा ही क्यों नहीं गया?
घटती-घटना ने पहले
ही कर दिया था खुलासा…

दैनिक घटती-घटना ने 12 मई 2025, 05 जुलाई 2025, 25 जुलाई 2025 के अंकों में इस सट्टा नेटवर्क को लेकर लगातार प्रमुखता से खबरें प्रकाशित की थीं, इन खबरों में स्पष्ट रूप से बताया गया था कि दीप सिन्हा ऑनलाइन सट्टा का मुख्य मास्टरमाइंड है,उसका नेटवर्क कई जिलों व राज्यों तक फैला है, 300 से अधिक फर्जी बैंक खाते संचालित किए जा रहे हैं,करोड़ों रुपये का लेन-देन डिजिटल माध्यम से हो रहा है, पुलिस कार्रवाई के बावजूद दीप फरार बना हुआ है,अखबार ने उस समय भी यह सवाल उठाया था पुलिस जब भी सटोरियों को पकड़ती है, तब सटोरिया नहीं पुलिस ही क्यों कटघरे में खड़ी हो जाती है?
दो साल तक क्यों
नहीं पकड़ पाई पुलिस?

यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि जिस आरोपी के खिलाफ पुख्ता डिजिटल सबूत,मोबाइल चैट,बैंक ट्रांजेक्शन, एटीएम कार्ड, पासबुक, सट्टा पैनल सब कुछ पहले से मौजूद था,उसे पकड़ने में पुलिस को करीब दो साल क्यों लग गए? क्या यह केवल तकनीकी कठिनाई थी? या फिर सट्टा नेटवर्क को किसी स्तर पर संरक्षण प्राप्त था?
पुलिस संरक्षण की आशंका से इनकार नहीं : स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह चर्चा रही कि दीप सिन्हा का कारोबार बिना स्थानीय संरक्षण के चल ही नहीं सकता था, इतना बड़ा नेटवर्क, इतने बड़े लेन-देन और लगातार फरारी , यह सब किसी न किसी अंदरूनी सहयोग की ओर इशारा करता है, इसी कारण घटती-घटना ने पहले ही यह सवाल उठाया था क्या सट्टा कारोबारियों को बचाने वाले चेहरे कभी सामने आएंगे?
घटती-घटना की भूमिका : यह स्पष्ट है कि यदि दैनिक घटती-घटना द्वारा लगातार यह मामला उठाया नहीं जाता,तो संभवतः यह सट्टा नेटवर्क आज भी सक्रिय रहता,अखबार ने न सिर्फ खबर छापी,बल्कि सवाल उठाए,सिस्टम को आईना दिखाया,जनता की आवाज बनी,और अंततः वही सवाल आज हकीकत बनकर सामने हैं।
इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला
– छत्तीसगढ़ जुआ प्रतिषेध अधिनियम 7, 8
– आईपीसी 467, 468, 471
– आईपीसी 120(बी)
– आईटी एक्ट 66(सी), 66(डी) पूर्व में कई आरोपी गिरफ्तार होकर जेल जा चुके थे, लेकिन मुख्य सरगना दीप सिन्हा फरार था।
अब पुणे से हुई गिरफ्तारी
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार अग्रवाल (भा.पु.से.) के निर्देशन में नगर पुलिस अधीक्षक राहुल बंसल (भा.पु.से.) के नेतृत्व में गठित टीम ने आरोपी को पुणे, महाराष्ट्र से गिरफ्तार किया, आरोपी आयुष सिन्हा उर्फ दीप सिन्हा, उम्र-32 वर्ष, निवासी – नेहरू वार्ड,अंबिकापुर को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
अब जनता पूछ रही है ये सवाल…
दीप की गिरफ्तारी के बाद सरगुजा में सबसे बड़ा सवाल यही है क्या उसके पूरे नेटवर्क का खुलासा होगा? क्या पुलिस में मौजूद सहयोगियों के नाम सामने आएंगे? या फिर मामला केवल गिरफ्तारी तक सीमित रह जाएगा? क्योंकि अगर निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह केस भी केवल फाइलों में दबकर रह जाएगा।
अब निगाहें पुलिस जांच पर हैं…
क्या यह गिरफ्तारी सिर्फ एक औपचारिक कार्रवाई बनकर रह जाएगी या फिर सचमुच सट्टा माफिया की जड़ों तक पहुंचा जाएगा यह आने वाला समय तय करेगा। जब पूरा जिला जानता था,तब पुलिस क्यों नहीं जान पाई? जिस दीप सिन्हा का नाम हर थाने में चर्चा में था,हर सट्टा खिलाड़ी जानता था,हर बुक्की उससे जुड़ा था,हर ट्रांजेक्शन उसी के पैनल से चलता था, उसे पकड़ने में सरगुजा पुलिस को 24 महीने लग गए,क्या यह महज़ संयोग है? या फिर यह सिस्टम की मिलीभगत का परिणाम?
पुलिस जब सटोरियों को पकड़ती है,
तब पुलिस ही कटघरे में क्यों खड़ी होती है?
दैनिक घटती-घटना ने बार-बार यह सवाल उठाया पुलिस जब भी सटोरियों को पकड़ती है,तब सटोरिया नहीं पुलिस ही क्यों आरोपी बन जाती है? आज वही सवाल फिर जि़ंदा है,अगर पुलिस ईमानदारी से जांच करती रही होती तो दीप महाराष्ट्र नहीं भाग पाता,वर्षों तक फरार नहीं रहता,नेटवर्क जिंदा नहीं रहता।
क्या दीप के पीछे ‘वर्दी की ढाल’ थी?-जमीनी सच्चाई यह है कि फरारी के दौरान दीप लगातार संपर्क में था,उसका सट्टा नेटवर्क बंद नहीं हुआ,लेन-देन चालू रहा, नए अकाउंट खुलते रहे,तो फिर यह सब किसकी जानकारी में हो रहा था? क्या किसी थाने में किसी अधिकारी ने कभी पूछताछ नहीं की? क्या किसी ने जानबूझकर आंखें बंद रखीं?
अब गिरफ्तारी—क्या सच सामने आएगा या फाइल दबेगी?- अब जबकि दीप पुलिस कस्टडी में है,असली परीक्षा शुरू होती है,सवाल सीधे-सीधे हैं क्या पुलिस उन अधिकारियों के नाम उजागर करेगी जिन्होंने मदद की? क्या कॉल डिटेल,बैंक लिंक, व्हाट्सएप चैट सार्वजनिक होंगी?,क्या ‘सहयोगी पुलिसकर्मी’ आरोपी बनाए जाएंगे? या फिर सारा दोष दीप पर डालकर मामला खत्म कर दिया जाएगा?
जनता को गिरफ्तारी नहीं,सच्चाई चाहिए-सरगुजा की जनता अब यह नहीं पूछ रही कि दीप पकड़ा गया या नहीं? जनता पूछ रही है दीप को भगाने वाले कौन थे? अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले,तो यह गिरफ्तारी भी सिर्फ फोटो सेशन, प्रेस नोट, वाहवाही, बनकर रह जाएगी।
यह सिर्फ सट्टा नहीं—सिस्टम फेल होने की कहानी है-यह मामला केवल जुआ अधिनियम का नहीं है,यह मामला है प्रशासनिक विफलता का,पुलिस निगरानी तंत्र की असफलता का,संभावित भ्रष्ट संरक्षण का और न्याय व्यवस्था पर जनता के टूटते भरोसे का है।
अब सवाल इतिहास तय करेगा-या तो यह मामला पूरे सट्टा सिंडिकेट को उजागर करेगा या फिर एक नामी गिरफ्तारी बनकर फाइलों में दफन हो जाएगा।
घटती-घटना पूछता रहेगा—क्योंकि सवाल पूछना ही पत्रकारिता है।


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