- संगठनात्मक असहमति, निर्वाचन प्रक्रिया पर उठे सवाल, समाज में विभाजन की आशंका
- साहू समाज कोरिया में अध्यक्ष पद को लेकर बढ़ा अंतर्विरोध, संगठनात्मक एकता पर संकट
- अध्यक्ष पद की खींचतान में उलझा साहू समाज, अंदरूनी मतभेद हुए तेज
- कोरिया में साहू समाज नेतृत्व संकट की ओर, दो गुटों में बंटने की आशंका
- सामाजिक संगठन या राजनीतिक मंच? अध्यक्ष चुनाव ने खड़ा किया बड़ा सवाल
- अध्यक्ष पद की लड़ाई में बढ़ी तल्खी, साहू समाज में गहराया असंतोष
- जिला अध्यक्ष पद को लेकर गहराया विवाद, समाज में बढ़ी बेचैनी
- नेतृत्व की होड़ में उलझा साहू समाज, संगठन टूटने की चर्चा तेज


कोरिया,20 जनवरी 2026(घटती-घटना)। जिला कोरिया में साहू समाज के जिलाध्यक्ष पद को लेकर उत्पन्न विवाद लगातार गहराता जा रहा है,समाज के भीतर चल रही असहमति अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुकी है। विभिन्न बैठकों,सामाजिक संवादों और आंतरिक समूहों में सामने आ रही प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अध्यक्ष पद को लेकर समाज एकमत नहीं है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए समाज के दो अलग-अलग संगठनों में विभाजित होने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
जिला कोरिया में वर्तमान समय में साहू समाज के जिलाध्यक्ष पद को लेकर अंदरूनी मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं,जो अब आक्रोश का रूप लेते दिखाई दे रहे हैं, समाज के भीतर यह चर्चा आम है कि अध्यक्ष पद को लेकर प्रतिस्पर्धा केवल संगठनात्मक नहीं रह गई है,बल्कि इसके साथ राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी जुड़ती प्रतीत हो रही हैं, समाज के कुछ सदस्यों का कहना है कि जगदीश साहू के अध्यक्ष बनने को लेकर जिस प्रकार सक्रियता दिखाई जा रही है, उससे यह आभास होता है कि सामाजिक एकता से अधिक भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है, समाजजनों की दबी जुबान में यह भी चर्चा है कि यदि समाजहित सर्वोपरि होता,तो लगभग 25 हजार सदस्यों वाले समाज में व्यापक स्तर पर आजीवन सदस्यता अभियान चलाकर कम से कम 5 हजार नए सदस्य जोड़े जा सकते थे,हालांकि इस दिशा में अपेक्षित उपलब्धि सामने नहीं आ सकी,समाज के एक वर्ग का यह भी मानना है कि अब तक की भूमिका मुख्यतः प्रतिनिधित्व तक सीमित रही,जबकि समाज को संगठित करने,नई योजनाएं लाने,सामूहिक निर्णय प्रणाली को मजबूत करने तथा समाज को वास्तविक रूप से सशक्त बनाने जैसे प्रयास अपेक्षानुसार दिखाई नहीं दिए,इन्हीं कारणों से समाज के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है और अध्यक्ष पद को लेकर जगदीश साहू की सक्रियता अब कुछ लोगों को खटकने लगी है, समाज के बीच यह चर्चा भी तेज हो रही है कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें अध्यक्ष बनाया जाता है, तो साहू समाज के दो अलग-अलग संगठनों में विभाजित होने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यहां तक कि जिले में एक नए संगठन के गठन की संभावनाओं पर भी बातचीत होने लगी है, यह बातें किसी एक व्यक्ति का मत नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा निजी संवादों और आंतरिक बैठकों में व्यक्त की जा रही सामूहिक चर्चाओं का हिस्सा बताई जा रही हैं।
अध्यक्ष पद को लेकर बढ़ता असंतोष- समाज के कुछ वरिष्ठ एवं सक्रिय सदस्यों का कहना है कि वर्तमान समय में अध्यक्ष पद केवल संगठनात्मक दायित्व न रहकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से जुड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है, समाज के भीतर यह चर्चा है कि कुछ पदाधिकारी सामाजिक सेवा की अपेक्षा राजनीतिक स्वीकार्यता को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं, हालांकि यह बातें समाज के अंदरूनी विमर्श का हिस्सा हैं और इनका कोई आधिकारिक पुष्टि समाज संगठन द्वारा नहीं की गई है।
सामाजिक सरोकार बनाम राजनीतिक महत्वाकांक्षा- समाज के एक वर्ग का मानना है कि संगठन का उद्देश्य सामाजिक एकता, पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया तथा अधिक से अधिक सदस्यों को जोड़ना होना चाहिए, इसी संदर्भ में यह प्रश्न भी उठाया जा रहा है कि लगभग 25 हजार सदस्यों वाले समाज में आजीवन सदस्यता अभियान अपेक्षित गति क्यों नहीं पकड़ सका? समाज से जुड़े लोगों के अनुसार यदि संगठनात्मक प्रयास व्यापक होते तो बड़ी संख्या में नए आजीवन सदस्य जोड़े जा सकते थे, यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह आकलन समाज के कुछ सदस्यों द्वारा व्यक्त विचारों पर आधारित है, न कि किसी आधिकारिक आंकड़े या जांच रिपोर्ट पर।
संगठनात्मक एकता पर असर- समाज के भीतर यह चर्चा भी प्रबल हो रही है कि बीते कुछ वर्षों में संगठनात्मक संवाद कमजोर पड़ा है, कई सामाजिक निर्णय सर्वसम्मति के बजाय सीमित स्तर पर लिए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, परिणामस्वरूप समाज के कुछ वर्ग स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से अलग महसूस कर रहे हैं, समाज के जानकारों का कहना है कि यदि असहमति का समाधान संवाद के माध्यम से नहीं किया गया, तो भविष्य में अलग संगठन के गठन की स्थिति बन सकती है, हालांकि अभी तक किसी भी प्रकार के नए संगठन की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
व्हाट्सएप समूह संचालन को लेकर असंतोष- सामाजिक संवाद के प्रमुख माध्यम बने व्हाट्सएप समूहों के संचालन को लेकर भी असंतोष की बातें सामने आई हैं, कुछ सदस्यों का कहना है कि समूहों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समान रूप से नहीं मिल पा रही है, वहीं संगठन से जुड़े कुछ लोगों का यह भी कहना है कि समूह अनुशासन बनाए रखने के लिए सीमित प्रशासनिक निर्णय आवश्यक होते हैं, इस विषय पर अब तक समाज की ओर से कोई लिखित दिशा-निर्देश या आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
मतदाता सूची को लेकर उठे प्रश्न– अध्यक्ष निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान जारी मतदाता सूची भी विवाद का कारण बनी, समाज के सदस्यों द्वारा यह प्रश्न उठाया गया कि सूची में सीमित संख्या में नाम सम्मिलित किए गए, कुछ सदस्यों ने यह भी बताया कि उन्होंने नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया था, लेकिन उन्हें आगामी प्रक्रिया का हवाला देकर प्रतीक्षा करने को कहा गया, इस विषय ने निर्वाचन की पारदर्शिता को लेकर शंकाएं उत्पन्न कीं, हालांकि निर्वाचन समिति की ओर से इस पर कोई औपचारिक लिखित प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई।
चुनाव स्थगन और नियुक्ति की चर्चा- बढ़ते मतभेदों को देखते हुए जिलाध्यक्ष पद का चुनाव फिलहाल स्थगित कर दिया गया है, समाज से जुड़े सूत्रों के अनुसार अब चुनाव के स्थान पर नियुक्ति प्रक्रिया अपनाए जाने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें प्रदेश स्तर से पर्यवेक्षकों की भूमिका तय की जा सकती है, हालांकि यह जानकारी अनौपचारिक चर्चाओं पर आधारित है और समाज संगठन द्वारा इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं की गई है।
निर्वाचन प्रभारी को लेकर भ्रम की स्थिति- विवाद उस समय और गहरा गया जब निर्वाचन प्रक्रिया से संबंधित दो अलग-अलग संदेश सामाजिक समूहों में सामने आए, एक संदेश में निर्वाचन प्रभारी द्वारा दायित्व निभाने में असमर्थता व्यक्त की गई, जबकि बाद में जारी संदेश में पद से इस्तीफा न देने की बात कही गई, इन परस्पर विरोधी बयानों से समाज के सदस्यों के बीच भ्रम की स्थिति बनी, जिस पर अब तक कोई औपचारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
समाज की अपेक्षा: गैर-राजनीतिक नेतृत्व- समाज के प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि जिलाध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता, पारदर्शिता और संगठन विस्तार को प्राथमिकता दे, समाज का मानना है कि नेतृत्व का मुख्य उद्देश्य सामाजिक एकता, शिक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक संरक्षण होना चाहिए।
निर्णायक मोड़ पर समाज- वर्तमान समय में कोरिया जिला साहू समाज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, आने वाले दिनों में लिया गया निर्णय यह तय करेगा कि समाज आपसी सहमति और संवाद के माध्यम से एकजुट रहता है या फिर संगठनात्मक विभाजन की ओर बढ़ता है।
यह समाचार समाज के सदस्यों द्वारा व्यक्त विचारों, चर्चाओं एवं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है, इसमें उल्लिखित सभी मत व्यक्तिगत अथवा सामूहिक अभिव्यक्तियां हैं, जिनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि सामाजिक विषयों को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करना है।
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