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बैकुंठपुर/पटना@उम्मीदों से बना नगर,अव्यवस्था में फंसा प्रशासन…नगरवासियों की चिंता बढ़ी, दोहरे प्रभार में डूबता विकास

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  • उधार के सीएमओ,दोहरा प्रभार, कैसे होगा नवीन नगर पंचायत पटना का उद्धार?
  • दोहरे प्रभार में फंसा नगर विकास, पटना नगर पंचायत के भविष्य पर सवाल
  • नवगठित नगर पंचायत पटना प्रशासनिक संकट में, स्थायी सीएमओ के बिना ठहरता विकास
  • भ्रष्टाचार के बाद अब प्रशासनिक अनदेखी पटना नगर पंचायत फिर सवालों के घेरे में
  • नगर बना, व्यवस्था नहीं बनी दोहरे प्रभार में उलझा पटना नगर पंचायत
  • दो नगर निकाय, एक अधिकारी क्या ऐसे चलेगा सुशासन?
  • आय सक्षम, प्रशासन कमजोर नगर पंचायत पटना क्यों हो रहा उपेक्षित?
  • पूर्णकालिक सीएमओ के बिना नगर पंचायत का विकास सिर्फ कागजों में?


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/पटना,19 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले में नगरीय विकास की तस्वीर आज कई सवालों के घेरे में है, जिले में कुल तीन नगरीय निकाय अस्तित्व में हैं दो पुराने और एक नवगठित नगर पंचायत पटना। जिस नगर पंचायत का गठन नागरिकों को बेहतर शहरी सुविधाएं, तेज विकास और पारदर्शी प्रशासन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था, वही आज प्रशासनिक अस्थिरता, दोहरे प्रभार और अव्यवस्था के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है, नगर पंचायत पटना का भविष्य इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां लिया गया एक गलत निर्णय पूरे नगर के विकास की दिशा को वर्षों पीछे धकेल सकता है, नगर पंचायत पटना आज एक ऐसे प्रशासनिक मोड़ पर खड़ा है जहां लिया गया निर्णय उसके भविष्य की दशा और दिशा तय करेगा, यदि शासन ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो विकास की उम्मीद में बना यह नगर पंचायत दोहरे प्रभार की फाइलों में ही उलझकर रह जाएगा।
नगर पंचायत गठन से जुड़ी बड़ी उम्मीदें- नगर पंचायत पटना के गठन के समय नगरवासियों ने इस निर्णय को विकास की नई शुरुआत माना था, लोगों को उम्मीद थी कि ग्राम पंचायत की सीमाओं से निकलकर नगर क्षेत्र में योजनाओं का विस्तार होगा, सड़क, नाली, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइट और सफाई व्यवस्था सुदृढ़ होगी, शहरी योजनाओं का सीधा लाभ आम नागरिकों को मिलेगा, शासन की योजनाएं कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देंगी, लेकिन गठन के कुछ ही समय बाद यह सपना धुंधला पड़ता नजर आया।
पहला सीएमओ और भ्रष्टाचार के आरोप- नगर पंचायत के गठन के बाद नियुक्त पहले मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) पर विकास कार्यों में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे, नगर में यह चर्चा आम हो गई कि टेंडर प्रक्रिया में मनमानी हुई, भुगतान में गड़बड़ी की गई, विकास कार्यों की गुणवत्ता से समझौता हुआ, स्थिति तब गंभीर हुई जब नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों ने खुले तौर पर शिकायत दर्ज कराई, जांच के बाद संबंधित सीएमओ को निलंबित कर नगर पंचायत से हटाया गया, यह कार्रवाई नगरवासियों के लिए राहत का संकेत थी।
नया प्रशासक नहीं, दोहरा प्रभार- निलंबन के बाद नगरवासियों को उम्मीद जगी कि अब नगर पंचायत को एक ईमानदार, निष्पक्ष और पूर्णकालिक सीएमओ मिलेगा, लेकिन इसके उलट प्रशासन ने अलग अधिकारी नियुक्त करने के बजाय जिला मुख्यालय स्थित नगर पालिका के सीएमओ को ही अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया, यहीं से सवालों की नई श्रृंखला शुरू हो गई।
जिस नगर पालिका की कार्यप्रणाली खुद चर्चा में- नगर पंचायत पटना के निवासियों का कहना है कि जिस सीएमओ को दोहरा प्रभार सौंपा गया है, उनकी मूल पदस्थली की कार्यप्रणाली पहले से ही सुर्खियों में रही है, ऐसे में एक ओर नगर पंचायत पटना पहले ही भ्रष्टाचार के दौर से गुजर चुका है, दूसरी ओर वही अधिकारी दोहरा प्रभार संभाल रहे हैं जिनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठते रहे हैं यह स्थिति नगरवासियों की चिंता को और गहरा कर रही है।
उधार की व्यवस्था में नगर प्रशासन– वर्तमान में नगर पंचायत पटना बिना स्थायी सीएमओ के चल रहा है, सप्ताह में सीमित समय ही अधिकारी नगर में उपलब्ध रहते हैं, अधिकांश निर्णय जिला मुख्यालय से लिए जाते हैं, इससे स्थानीय समस्याओं का त्वरित समाधान नहीं हो पा रहा है, नगरवासी महसूस कर रहे हैं कि उनका नगर प्रशासनिक दृष्टि से द्वितीय श्रेणी में चला गया है।
आय में सक्षम, लेकिन नेतृत्व से वंचित- विडंबना यह है कि नगर पंचायत पटना राजस्व और विकास निधि की दृष्टि से एक सक्षम निकाय माना जाता है, इसके बावजूद यहां स्थायी प्रशासनिक नेतृत्व नहीं है, योजनाओं की निगरानी कमजोर है, विकास कार्यों की गति सुस्त पड़ गई है, नगरवासियों का कहना है कि जब धन और योजनाएं उपलब्ध हैं, तो केवल प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी क्यों दिखाई दे रही है।
‘जुगाड़ तंत्र’ की चर्चाएं- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि वर्तमान सीएमओ का दोहरा प्रभार प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक कथित जुगाड़ व्यवस्था का परिणाम है हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन इन चर्चाओं ने आम जनता के मन में अविश्वास पैदा कर दिया है, लोग सवाल कर रहे हैं कि यदि व्यवस्था पारदर्शी होती, तो नगर पंचायत पटना को अब तक अलग सीएमओ क्यों नहीं मिला?
सुशासन की अवधारणा पर सीधा प्रहार- यह पूरा मामला केवल एक अधिकारी की नियुक्ति का नहीं, बल्कि सुशासन की मूल भावना से जुड़ा प्रश्न बन गया है, पंचायत राज हो या नगरीय निकाय व्यवस्था दोनों का लक्ष्य एक ही है शासन की योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन और अंतिम व्यक्ति तक लाभ, लेकिन दोहरे प्रभार की व्यवस्था इस लक्ष्य को कमजोर करती नजर आ रही है।
दो नगर निकाय, एक अधिकारी, व्यावहारिक असंभवता- प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि एक नगरीय निकाय ही पूर्णकालिक ध्यान मांगता है, दो निकायों को एक साथ संभालना केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है, किसी एक निकाय को स्वाभाविक रूप से उपेक्षा झेलनी पड़ती है और फिलहाल यह उपेक्षा नगर पंचायत पटना झेल रहा है।
नगरवासियों की आशंका- नगरवासियों को डर है कि कहीं फिर से भ्रष्टाचार को जगह न मिल जाए, योजनाएं कागजों में सिमट न जाएं, और नगर पंचायत अपनी शुरुआती असफलताओं से उबर ही न पाए, लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर बने इस नगर पंचायत का भविष्य आज असमंजस में है।
स्थायी समाधान की मांग- नगर पंचायत पटना के नागरिक और जनप्रतिनिधि मांग कर रहे हैं कि नगर पंचायत को तत्काल पूर्णकालिक सीएमओ दिया जाए, दोहरे प्रभार की व्यवस्था समाप्त हो, योजनाओं की नियमित समीक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि नगर पंचायत अपने गठन के मूल उद्देश्य को पूरा कर सके।


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